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चंद्रप्रभा सैकियानी: असम से पर्दा प्रथा हटाने में अहम भूमिका निभाने वाली महिला

Mon, 31 Aug 2020 10:54 AM IST
अपराजिता शुक्ला लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अपराजिता शुक्ला Updated Mon, 31 Aug 2020 10:54 AM IST
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chandra prabha saikni who tend parda pratha in assam
chandraprabha saikiani - फोटो : social media

साल 1925 था। असम के नौगांव में असम साहित्य सभा की बैठक हो रही थी। इस बैठक में महिलाओं में शिक्षा को बढ़ावा देने पर चर्चा की जा रही थी और लड़कियों में शिक्षा के विस्तार पर जोर दिया जा रहा था। इस बैठक में पुरुष और महिलाएं दोनों मौजूद थे। लेकिन महिलाएं पुरुषों से अलग बांस से बने पर्दे के पीछे बैठी हुई थीं। चंद्रप्रभा सैकियानी मंच पर चढ़ीं और माइक पर शेर सी गरजती आवाज में कहा -''तुम पर्दे के पीछे क्यों बैठी हो ''और महिलाओं को आगे आने को कहा। उनकी इस बात से इस सभा में शामिल महिलाएं इतनी प्रेरित हुईं कि वे पुरुषों को अलग करने वाली उस बांस की दीवार को तोड़कर उनके साथ आकर बैठ गईं। चंद्रप्रभा की इस पहल को असम के समाज में उस समय प्रचलन में रही पर्दा प्रथा को हटाने के लिए अहम माना जाता है।

chandra prabha saikni who tend parda pratha in assam
chandraprabha saikiani - फोटो : facebook
13 साल की उम्र में खोला था स्कूल

असम की रहने वाली इस तेजतर्रार महिला का जन्म 16 मार्च वर्ष 1901 में कामरूप जिले के दोइसिंगारी गांव में हुआ। उनके पिता रतिराम मजुमदार गांव के मुखिया थे और उन्होंने अपनी बेटी की पढ़ाई पर काफ़ी जोर दिया। चंद्रप्रभा ने न केवल अपनी पढ़ाई की बल्कि अपने गांव में पढ़ने वाली लड़कियों पर भी ध्यान दिया। उनके पोते अंतनु सैकिया जो एक पत्रकार भी हैं, कहते हैं, "जब वे 13 साल की थीं तो उन्होंने अपने गांव की लड़कियों के लिए प्राइमरी स्कूल खोला। वहां इस 13 साल की शिक्षिका को देखकर स्कूल इंस्पेक्टर प्रभावित हुए और उन्होंने चंद्रप्रभा सैकियानी को नौगांव मिशन स्कूल का वजीफा दिलवाया। लड़कियों के साथ शिक्षा के स्तर पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ भी उन्होंने अपनी आवाज को नौगांव मिशन स्कूल में जोर शोर से रखा और वो ऐसा करने वाली पहली लड़की मानी जाती हैं।'' उन्होंने 1920-21 में किरोनमॉयी अग्रवाल की मदद से तेजपुर में महिला समिति का गठन किया।

chandra prabha saikni who tend parda pratha in assam
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : self

चंद्रप्रभा पर उपन्यास लिखने वाली निरुपमा बॉरगोहाई बताती हैं कि चंद्रप्रभा और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने 'बस्त्र यजना' यानि विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करने को लेकर मुहिम चलाई और वस्त्रों को जलाया जिसमें बड़े पैमाने पर महिलाओं ने भी भाग लिया। इस समय महात्मा गांधी तेजपुर आए हुए थे। निरुपमा बॉरगोहाई के उपन्यास 'अभिजात्री' को साहित्य अकादमी पुरस्कार भी दिया गया था। वे बताती हैं कि पिछड़ी जाति से आने वाली चंद्रप्रभा सैकियानी की शादी बहुत ही कम उम्र में एक उम्रदराज आदमी के साथ कर दी गई थी और उन्होंने इस शादी से इनकार कर दिया था।

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chandra prabha saikni who tend parda pratha in assam
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media

लेखिका निरुपमा बॉरगोहाई कहती हैं कि वे काफी हिम्मत वाली महिला थीं। वे जब शिक्षिका थीं तभी वे एक अलग रिश्ते में रहते हुए बिनब्याही मां बनीं। लेकिन ये रिश्ता सफल नहीं रहा और उन्होंने इस रिश्ते से पैदा हुए बेटे को अपने पास ही रखने का फैसला लिया और उसे खुद पाला। चंद्रप्रभा सैकियानी ने न केवल लड़कियों की शिक्षा के लिए काम किया बल्कि उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने और स्वतंत्रता आंदोलन को उन तक पहुंचाने के लिए पूरे राज्यभर में साइकल से यात्रा की और वो ऐसा करने वालीं राज्य की पहली महिला मानी जाती हैं।

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chandra prabha saikni who tend parda pratha in assam
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : PTI

उनके पोते अंतनु बताते हैं, ''गांव में अनुसूचित जाति के लोगों को तालाब से पानी लेने की अनुमति नहीं दी जाती थी लेकिन चंद्रप्रभा सैकियानी ने इसके खिलाफ़ अपनी आवाज उठाई , लड़ाई लड़ी और लोगों को उनका हक दिलवाया। उन्हीं की कोशिश से लोगों को तालाब से पानी लेने का अधिकार मिल पाया। उन्होंने मंदिर में पिछड़ी जातियों के प्रवेश को लेकर भी आंदोलन किया लेकिन वे इसमें सफल नहीं हो पाई।'' सन् 1930 में उन्होंने असहयोग आंदोलन में भी भाग लिया और जेल भी गईं और सन् 1947 तक वे कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता के तौर पर काम करती रहीं। उन्हें अपने काम के लिए सन् 1972 में पद्मश्री से नवाजा गया।

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