कोविड-19 मरीजों का इलाज और देखभाल कर रहे डॉक्टरों और नर्सों को किस तरह की इमोशनल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है? उनके परिवार कैसी परिस्थितियों में रह रहे हैं? खासतौर पर इन डॉक्टरों और नर्सों के बच्चों पर क्या गुजर रही है? इसे जानने के लिए एक नर्स का अनुभव जानिए। इन्हें एक कोरोना वार्ड और अपने बेटे की देखभाल करनी पड़ रही है।
कोरोना वार्ड में ड्यूटी करती एक नर्स की कहानी जो एक 'मां' भी है
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उस दिन हमें हमारे हॉस्पिटल में एक आकस्मिक मीटिंग के लिए बुलाया गया था। मीटिंग में हमें बताया गया कि हमारा हॉस्पिटल कोविड के मरीजों को भर्ती करेगा और हमें खुद को इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार करना होगा।
हमने जरूरत के हिसाब से वार्ड्स को तैयार करना शुरू कर दिया। कुछ मरीज हमारे यहां कस्तूरबा हॉस्पिटल से आने थे और हम इन जरूरतों के लिए खुद को तैयार करने में जुट गए। बाद में मुझे पता चला कि मेरे डिपार्टमेंट को कोविड वार्ड के तौर पर चुना गया है। 20 तारीख से हमने कस्तूरबा हॉस्पिटल के मरीजों को अपने यहां भर्ती करना शुरू कर दिया। इससे पहले मैं इसी तरह के मामलों के लिए दूसरे विभागों में मदद कर चुकी थी, ऐसे में मुझे ज्यादा डर नहीं लग रहा था। हम पढ़ते रहे थे कि क्या चीज जरूरी है और किस तरह के इंतजाम किए जाने हैं। हमें यही सब काम अपने वार्ड में करने थे, लेकिन हमने यह महसूस किया कि हमें खुद को अपने परिवारों से दूर रखना है।
मेरे बेटे ने अभी ही 10वीं की परीक्षा दी थी और 24 मार्च को उसका जन्मदिन था। मैं कई दिन पहले ही अपने बेटे के जन्मदिन के लिए छुट्टी का आवेदन कर चुकी थी और इसे मनाने के लिए काफी सारी तैयारियां पहले ही की जा चुकी थीं। चूंकि मेरे पति एक जर्नलिस्ट हैं, ऐसे में हम दोनों ही नियमित रूप से काम पर जा रहे थे। लेकिन, मेरे बेटे के जन्मदिन के कुछ दिन पहले से कोविड मरीज हमारे वार्ड में आने लगे। ऐसे में मैंने अपने पति के साथ इस बारे में बात की और अपने बेटे को उसकी नानी के यहां भेज दिया। जब 24 मार्च आई तो मैंने अपनी छुट्टी कैंसिल करा दी और काम पर चली गई। मैं उस दिन रात 8 बजे तक हॉस्पिटल में रही। इस व्यस्तता में मैं यह पूरी तरह से भूल गई कि आज मेरे बेटे का जन्मदिन है। बाकी सेलिब्रेशन तो छोड़ दीजिए, मैं उसे विश तक नहीं कर पाई।
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वह मेरी मां के यहां था। उसकी मौसी और नानी ने जन्मदिन के रीति-रिवाज पूरे किए। लेकिन, हम खुद को रोक नहीं पाए और रात के 11 बजे उससे मिलने पहुंच गए। आधी रात को हम भगवान के सामने खड़े हुए और उन्हें धन्यवाद दिया। भले ही यह उसका जन्मदिन था, लेकिन उसकी मां उसके लिए कुछ भी खास नहीं कर पाई थी। हालांकि, मेरे बेटे ने न तो कोई शिकायत की न ही वह बिलकुल भी गुस्सा हुआ। इसकी बजाय उसने मुझे दिलासा दिया। उसने कहा, 'इट्स ओके ममा, जब यह सब ख़त्म हो जाएगा तब हम जन्मदिन सेलिब्रेट कर लेंगे। मुझे उससे वादा करना चाहिए था, लेकिन, इसकी बजाय वह मुझसे वादा कर रहा था।

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