साल 2022 पद्म पुरस्कारों की सूची में महिलाओं को भी स्थाम मिला। इन महिलाओं ने अलग अलग क्षेत्रों में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया है। कई महिलाएं तो ऐसी है, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन देश और देश की संस्कृति, पर्यावरण व लोगों के लिए समर्पित कर दिया। एक तरह दोनों पैरों से न चल पाने वाली राबिया हैं, जो व्हील चेयर से लंबी दूरी का सफर तय कर लोगों को कभी न हार मानने की प्रेरणा दे रही हैं, तो दूसरी तरफ 102 साल की शकुंतला चौधरी हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन गांधी के आदर्शों, सिद्धांतों को लोगों तक पहुंचाने में लगा दिया। उत्कृष्ट कार्यों के जरिए पहचान बनाने वाली देश की इन्हीं नायिकाओं में एक नाम बसंती देवी का है। बसंती देवी को साल 2022 पद्मश्री पुरस्कार के लिए नामित किया गया है। बसंती देवी उत्तराखंड से ताल्लुख रखती हैं। पर्यावरण को बचाने के लिए उनका प्रयास अतुलनीय है। इसके पहले भी बसंती देवी को देश का सर्वोच्च नारी शक्ति पुरस्कार मिल चुका है। जानिए पद्मश्री बसंती देवी के बारे में।
नारी शक्ति की मिसाल: बसंती देवी ने महिलाओं को किया संगठित, इन उत्कृष्ट कार्यों के लिए मिलेगा पद्मश्री सम्मान
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बसंती देवी कौन हैं?
बसंती देवी उत्तराखंड की प्रसिद्ध समाजसेविका हैं। उन्होंने उत्तराखंड के पर्यावरण संरक्षण, पेड़ो व नदी को बचाने के लिए अपना योगदान दिया है। बसंती देवी कौसानी स्थित लक्ष्मी आश्रम में रहती हैं। बसंती देवी ने पर्यावरण से लेकर समाज की कई कुरीतियों को दूर करने के लिए महिला समूहों का आह्वाहन किया। एक तरफ तो उन्होंने कोसी नदी का अस्तित्व बचाने के लिए महिला समूहों के माध्यम से जंगल को बचाने की मुहिम शुरु की तो दूसरी ओर घरेलू हिंसा और महिलाओं पर होने वाले प्रताड़नाओं को रोकने के लिए जनजागरण किए। यह बसंती देवी के प्रयास का ही फल है कि पंचायतों के सशक्तिकरण में उनके प्रयास का असर दिखा।
बसंती देवी का जीवन परिचय
बसंती देवी मूल रूप से पिथौरागढ़ की रहने वाली हैं। बसंती देवी की शिक्षा की बात करें तो शादी से पहले तक वह मात्र साक्षर थीं। 12 साल की उम्र में उनका विवाह कर दिया गया था लेकिन कुछ समय बाद उनके पति का निधन हो गया। उसके बाद बसंती देवी ने दूसरा विवाह नहीं किया। बाद में पिता का साथ मिला तो वापस मायके आईं और पढ़ाई में जुट गईं। उन्होंने इंटर पास किया। 12वीं करने के बाद बसंती गांधीवादी समाजसेविका राधा के संपर्क में आईं और उनसे प्रभावित होकर कौसानी के लक्ष्मी आश्रम में ही आकर बस गईं।
बसंती देवी ने बनाएं महिलाओं के संगठन
यहां से उन्हें समाज सेवा के पथ पर चलने की दिशा मिली। बसंती देवी ने अल्मोड़ा जिले के धौला देवी ब्लाक में आयोजित बालबाड़ी कार्यक्रमों में शामिल होकर समाज सेवा शुरू की। बसंती देवी ने इस काम में महिलाओं को आगे लाते हुए महिला संगठन बनाएं। साल 2003 में बसंती देवी ने कोसी घाटी के गांवों में महिलाओं को संगठित करने का काम शुरु किया था।
महिला सशक्तिकरण पर दिया बल
बसंती देवी ने कौसानी से लोद तक पूरी घाटी में करीब 200 गांवों की महिलाओं का समूह बनाया। उन्होंने महिला सशक्तिकरण पर बल देते हुए साल 2008 में महिलाओं की पंचायतों में स्थिति मजबूत करने पर काम किया। पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण मिला तो उन्होंने घरेलू हिंसा और पुरुषों की प्रताड़ना झेल रही महिलाओं की मुक्ति के लिए मुहिम शुरू की। 2014 में उन्होंने 51 गांवों की 150 महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में मदद की।
बसंती देवी और कोसी नदी
उन दिनों कोसी नदी सूखती जा रही थी और अपना अस्तिस्व खो रही थी। बसंती देवी ने कोसी नदी को बचाने का संकल्प लिया। उन्होंने महिलाओं को संगठित कर वनों के दोहन को रोकने के लिए कार्य किया। इस काम में उन्हें काफी मशक्कत करना पड़ी। निराशा भी हाथ लगी लेकिन संकल्प से पीछे न हटीं और आखिरकार वह महिलाओं को समझाने में कामयाब हुईं कि अगर जंगल और पानी नहीं बचा तो कोसी घाटी की संपन्न खेती भी बर्बादी की कगार पर आ जाएगी। इसके बाद पूरी घाटी में पेड़ों के कटान पर रोक लगा दी गई, इस अभियान की अगुवाई खुद महिलाएं कर रही हैं।

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