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Holi 2021: बरसाने की होली होती है बेहद खास, ये बाते नहीं जानते होंगे आप
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: Shashi Shashi
Updated Mon, 01 Mar 2021 09:35 PM IST
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ब्रज में होली
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हिंदू कैलेंडर के अनुसार हर वर्ष होली का उत्सव चैत्र मास की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। इस बार रंग वाली होली 29 मार्च को मनाई जाएगी। होली का उत्सव पूरे भारतवर्ष में बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, लेकिन सबसे ज्यादा होली की धूम भगवान कृष्ण के पावन धाम ब्रजमंडल के बरसाने में देखने की मिलती है। बसंत पंचमी की तिथि से ही यहां पर होली के उत्सव की धूम शुरू हो जाती है। यहां की होली विश्वविख्यात है। लोग देश के अलग-अलग हिस्सों से होली का उत्सव देखने और उसमें शामिल होने आते हैं। फूलों और गुलाल से पूरा वातावरण रंगमय हो जाता है। तो चलिए जानते हैं आखिर क्यों खास होती है ब्रज की होली।
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भोर से सखियों की राह तकते रहे ग्वाले
- फोटो : अमर उजाला
ब्रज में होली के उत्सव की धूम बसंत पंचमी से हो जाती है। बसंत पंचमी के दिन से ही होली का डांडा रोपा जाता है, उसके बाद महाशिवरात्रि पर श्रीजी मंदिर में राधारानी को 56 भोग लगाएं जाते हैं। अष्टमी के दिन नंदगांव में होली का निमंत्रण दिया जाता है। इसके बाद नवमी तिथि को होली की हुड़दंग शुरू हो जाती हैं हर तरफ वातावरण रंगो से सराबोर हो जाता है। नंदगांव के पुरूष नाचते गाते हुए बरसाने पंहुचते हैं। सबसे पहले ये लोगो पीली पोखर पहुंचते हैं। यह इनका पहला पड़ाव होता है। इसके बाद सभी लोग राधारानी के मंदिर पर दर्शन करते हैं और रंगीली चौक पर लट्ठमार होली प्रारंभ होती है। दशमी तिथि पर इसी तरह से नंदगावन में होली खेली जाती है।
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होली का पर्व
- फोटो : अमर उजाला
फूलैरा दूज पर यहां राधा कृष्ण के मंदिरों को फूलो से सजाया जाता है। फूलों की होली खेली जाती है। इस बार फुलैरा दूज 15 मार्च को पड़ रही है। इसके बाद फाल्गुन मास नवमी तिथि से ही पूरे ब्रज में हर तरफ रंग ही रंग दिखाई देता है। बरसाने की लट्ठमार होली को होरी कहा जाता है। इस दिन होरी गीत भी गाया जाता है जो राधा-कृष्ण के वार्तालाप पर आधारित है। यहां पर होली की परंपरा की शुरूआत 16वीं शताब्दी से मानी जाती है।
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बरसाना की लठामार होली
- फोटो : Amar Ujala
इस दिन नंदगांव के पुरूष बरसाने आकर राधा रानी के मंदिर पर झंडा फहराने की कोशिश करते हैं, तभी बरसाने की महिलाएं एकजुट होकर उन्हें लट्ठ से खदेड़ने का प्रयास करती हैं। परंतु इस समय पुरूष किसी भी तरह का प्रतिरोध नहीं करते हैं, वे केवल महिलाओं पर गुलाल छिड़ककर उनका ध्यान बंटाते हुए मंदिर पर झंडा फहराने का प्रयास करते हैं। इस दौरान एक अलग ही रौनक देखने को मिलती है। जो पुरूष पकड़े जाते हैं, उनकी पिटाई की जाती है। इस दौरान वे लोग ढाल से अपने आपको बचाने का प्रयास करते हैं। पुरूषों को महिलाओं के कपड़े पहनाने के साथ श्रंगार किया जाता है।
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