Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि का पर्व केवल श्रद्धा का ही नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक और खगोलीय गणनाओं का संगम है। शास्त्रों में इस विशेष रात्रि पर 'प्रदोष काल' और 'निशीथ काल' की पूजा को सर्वाधिक फलदायी बताया गया है। आइए जानते हैं इसके पीछे का धार्मिक और वैज्ञानिक आधार।
Mahashivratri: महाशिवरात्रि पर प्रदोष काल और निशीथ काल में ही क्यों करते हैं पूजा? जानें इसका रहस्य एवं महत्व
Mahashivratri 2026: शास्त्रों में महाशिवरात्रि पर 'प्रदोष काल' और 'निशीथ काल' की पूजा को सर्वाधिक फलदायी बताया गया है। आइए जानते हैं इसके पीछे का धार्मिक और वैज्ञानिक आधार।
महादेव का भ्रमण: ऐसी मान्यता है कि सूर्यास्त के समय भगवान शिव अपने नंदी और गणों के साथ तीनों लोकों का भ्रमण करते हैं। उस समय वे अपने तीसरे नेत्र से संपूर्ण सृष्टि को देख रहे होते हैं।
सावधानी और मर्यादा: चूंकि इस काल में राक्षसी प्रवृत्तियां और प्रेत आत्माएं भी सक्रिय रहती हैं, इसलिए इस समय भोजन, निद्रा, संभोग, यात्रा या विवाद की सख्त मनाही है। जो लोग इस समय पिशाच जैसा आचरण करते हैं, वे कष्ट भोगते हैं।
शिव का तांडव: प्रलय काल में इसी प्रदोष समय पर महादेव तांडव करते हुए अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से ब्रह्मांड को भस्म कर देते हैं। यही कारण है कि शिवरात्रि पर इस समय शिव की आराधना कर उन्हें शांत और प्रसन्न किया जाता है।
ज्योतिषीय महत्व: चंद्रमा और सूर्य का मिलन
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को चंद्रमा, सूर्य के सबसे निकट होता है। यह जीव रूपी 'चंद्रमा' का शिव रूपी 'सूर्य' के साथ मिलन का प्रतीक है। चूंकि चंद्रमा मन का कारक है, इसलिए इस दिन शिव की पूजा करने से मन पर विजय और आत्मिक शांति प्राप्त होती है। इसे 'जलरात्रि' भी कहा गया है, क्योंकि इसी दिन शिव का विवाह हुआ था और उनकी बारात निकाली जाती है।
महानिशीथ काल
(शिवलिंग के प्राकट्य का समय)
ईशान संहिता के एक प्रसिद्ध श्लोक के अनुसार
फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि।
शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:॥
इसका अर्थ है कि फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी की महानिशा (अर्धरात्रि) में आदिदेव भगवान शिव करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले 'शिवलिंग' के रूप में प्रकट हुए थे। शिव पुराण और लिंग पुराण में भी वर्णन है कि ब्रह्मा और विष्णु के विवाद को शांत करने के लिए शिव इसी समय 'अग्नि स्तंभ' के रूप में प्रकट हुए थे। इसी दिव्य घटना की स्मृति में महाशिवरात्रि मनाई जाती है।
निशीथ काल: सिद्धि और साधना की घड़ी
रात्रि का 8वां मुहूर्त: निशीथ काल रात का आठवां मुहूर्त होता है, जिसे मध्य-रात्रि या अर्धरात्रि का समय कहा जाता है। घड़ी के अनुसार यह समय रात 12 बजे के आसपास प्रारंभ होता है।
त्वरित सिद्धि का काल: रुद्रयामल और तंत्र सार जैसे ग्रंथों के अनुसार, यह काल भैरव, महाकाल और माता काली की साधना के लिए अचूक माना जाता है।
महानिशीथ का प्रभाव: सामान्य दिनों में निशीथ काल को कुछ कार्यों के लिए दूषित माना जा सकता है, लेकिन महाशिवरात्रि, दीपावली, नवरात्रि और जन्माष्टमी जैसी विशेष रात्रियों में यही समय 'महानिशीथ' बन जाता है, जो अत्यंत शुभ और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर होता है।