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After Death Rituals: मृत्यु के बाद क्यों बदल जाता है घर का खान-पान? जानें 13 दिन तक हल्दी से परहेज का रहस्य
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: Jyoti Mehra
Updated Thu, 02 Apr 2026 02:56 PM IST
सार
After Death Rituals: सनातन धर्म में किसी की मृत्यू होने पर कुछ समय तक शोक और संयम का पालन करने का परंपरा है। 13 दिन के इस समय काल में परिवार के लोगों को हल्दी का सेवन न करने और सादा जीवन जीने की सलाह दी जाती है। आइए इसके पीछे की वजह जानते हैं।
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मृत्यु के बाद 13 दिन तक हल्दी से दूरी क्यों जरूरी?
- फोटो : Amar Ujala
After Death Rituals In Hindu: जन्म और मृत्यु दोनों को ही जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। सनातन धर्म में जन्म को उत्सव की तरह मनाया जाता है, वहीं मृत्यु के बाद कुछ समय तक शोक और संयम का पालन किया जाता है। इसी शोक काल को आमतौर पर 13 दिन का समय माना जाता है, जिसमें खान-पान से लेकर व्यवहार तक कई नियमों का पालन किया जाता है। इसे अंतिम संस्कार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, जिसका पालन करने से मृतक की आत्मा को शांति प्राप्त होती है। इन्हीं में से एक है हल्दी वाले भोजन से परहेज करना। लेकिन आखिर ऐसा क्यों किया जाता है? आइए सरल भाषा में समझते हैं इसके पीछे के धार्मिक और पारंपरिक कारण।
गरुड़ पुराण के अनुसार नियम
गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद के समय को बहुत महत्वपूर्ण बताया गया है। इसमें वर्णन मिलता है कि व्यक्ति की आत्मा 13 दिनों तक अपने घर और परिवार के आसपास रहती है। इस दौरान परिवार को संयम, सादगी और नियमों का पालन करना चाहिए।
तामसिक और तले-भुने भोजन से बचना चाहिए
सादा और सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए
अधिक मसाले, हल्दी, प्याज-लहसुन का प्रयोग कम या बंद करना चाहिए
13 दिनों तक कैसा हो खान-पान?
शोक काल में भोजन बहुत ही साधारण और हल्का रखा जाता है:
बिना हल्दी और कम मसाले का भोजन
दाल, चावल, रोटी, सब्जी (हल्की)
अधिकतर उबला या सादा भोजन
प्याज, लहसुन, मांसाहार से परहेज
इसका उद्देश्य शरीर और मन दोनों को शांत रखना होता है।
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हिंदू धर्म में हल्दी का महत्व
- फोटो : Adobe stock
हिंदू धर्म में हल्दी का महत्व
हल्दी को हिंदू धर्म में बहुत शुभ और पवित्र माना जाता है। इसका उपयोग पूजा-पाठ, शादी-विवाह, मंगल कार्यों और धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है। हल्दी को सौभाग्य, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि इसे “मंगलकारी” चीजों में गिना जाता है। वहीं दूसरी ओर मृत्यु जैसी शोकपूर्ण स्थिति में हल्दी जैसे शुभ तत्व का प्रयोग वर्जित होता है।
मृत्यु के बाद हल्दी का सेवन क्यों नहीं किया जाता?
मृत्यु के बाद घर में शोक का माहौल होता है, जिसे अशुभ समय माना जाता है। चूंकि हल्दी शुभता और उत्सव का प्रतीक है, इसलिए इस दौरान इसका उपयोग नहीं किया जाता। यह एक तरह से जीवन के इस दुखद क्षण में सादगी और विरक्ति को दर्शाने का एक तरीका भी है।
इसके अलावा, मान्यता है कि इस समय आत्मा की शांति के लिए परिवार को सात्विक और साधारण जीवन जीना चाहिए, जिससे वातावरण में शांति और स्थिरता बनी रहे।
अंतिम संस्कार तक किन बातों का रखें ध्यान
घर में साफ-सफाई और शांति बनाए रखें
धार्मिक मंत्रों या पाठ का सहारा लें
हंसी-मजाक और उत्सव जैसे कार्यों से दूरी रखें
घर के सदस्य संयमित व्यवहार करें
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चूल्हा क्यों नहीं जलाया जाता?
- फोटो : Adobe stock
चूल्हा क्यों नहीं जलाया जाता?
कई परंपराओं में मृत्यु के तुरंत बाद घर का चूल्हा नहीं जलाया जाता। इसकी वजह यह मानी जाती है कि उस समय घर शोक में होता है और कोई भी नया कार्य शुरू करना उचित नहीं माना जाता। ऐसे समय में अक्सर पड़ोसी या रिश्तेदार भोजन की व्यवस्था करते हैं। यह सामाजिक सहयोग और संवेदना का प्रतीक भी माना जाता है।
चूल्हे से जुड़े नियम
मृत्यु के बाद कुछ समय तक घर में खाना नहीं बनाया जाता
बाहर से या रिश्तेदारों द्वारा भोजन आता है
शुद्धिकरण के बाद ही चूल्हा दोबारा जलाया जाता है
ये नियम किन लोगों के लिए होते हैं?
ये नियम मुख्य रूप से मृत व्यक्ति के करीबी परिवार, जैसे माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी और संतान पर लागू होते हैं। दूर के रिश्तेदारों के लिए नियम थोड़े हल्के हो सकते हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता और संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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