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Ganesh Chalisa Bnefits: बुधवार को करें गणेश चालीसा का पाठ, दूर होंगी बाधाएं और मिलेंगे मनचाहे शुभ फल

धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: मेघा कुमारी Updated Wed, 24 Jun 2026 06:20 AM IST
सार

Ganesh Chalisa Benefits: बुधवार को गणेश चालीसा का पाठ करना बेहद शुभ माना जाता है। इससे बुद्धि, ज्ञान और निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है और व्यक्ति को मानसिक शांति का अनुभव होता है।

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Ganesh Chalisa Bnefits - फोटो : अमर उजाला

Ganesh Chalisa Bnefits: बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा करने और गणेश चालीसा का पाठ करने से विशेष शुभ फलों की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि सच्चे मन और श्रद्धा के साथ की गई आराधना से गणपति बप्पा शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। उनकी कृपा से जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं, बुद्धि और विवेक में वृद्धि होती है, साथ ही सुख-समृद्धि और सफलता का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। आइए जानते हैं बुधवार के दिन गणेश चालीसा का पाठ करने से मिलने वाले प्रमुख लाभ।

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Ganesh Chalisa Bnefits - फोटो : freepik
गणेश चालीसा पाठ करने के लाभ
  • जो लोग नौकरी या करियर में संघर्ष कर रहे हैं, उनके लिए गणेश चालीसा का पाठ बेहद लाभकारी माना जाता है। इससे सफलता के रास्ते खुलते हैं।
  • व्यापार में लगातार नुकसान होने पर बुधवार को गणेश जी की पूजा और चालीसा का पाठ करना चाहिए। आर्थिक स्थिति बेहतर होने लगती है।
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Ganesh Chalisa Bnefits - फोटो : freepik
  • नियमित रूप से गणेश चालीसा का पाठ करने से शिक्षा में अच्छे परिणाम मिलते हैं।
  • किसी महत्वपूर्ण कार्य में बार-बार अड़चन आ रही है, तो गणेश चालीसा का पाठ करें। इससे प्रभु विघ्न दूर करते हैं।
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Ganesh Chalisa Bnefits - फोटो : freepik
  • जिन लोगों के विवाह में देरी हो रही है या अच्छे रिश्ते नहीं बन पा रहे, उनके लिए बुधवार को गणेश आराधना शुभ मानी जाती है।
  • नियमित रूप से गणेश चालीसा का पाठ करने से परिवार में सकारात्मक ऊर्जा आती है।
  • बुधवार को गणेश चालीसा का पाठ करने से सभी मनोकामनाएं धीरे-धीरे पूर्ण होने लगती हैं।
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Ganesh Chalisa Bnefits - फोटो : freepik
श्री गणेश चालीसा
दोहा
जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

चौपाई
जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥
जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विख्याता॥
ऋद्घि-सिद्घि तव चंवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्घारे॥

कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगलकारी॥
एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा॥
अतिथि जानि कै गौरि सुखारी। बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥

अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण, यहि काला॥
गणनायक, गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम, रुप भगवाना॥
अस कहि अन्तर्धान रुप है। पलना पर बालक स्वरुप है॥

बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं। नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥
शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं। सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आये शनि राजा॥

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक, देखन चाहत नाहीं॥
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो॥
कहन लगे शनि, मन सकुचाई। का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहाऊ॥

पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥
गिरिजा गिरीं विकल हुए धरणी। सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥
हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो। काटि चक्र सो गज शिर लाये॥

बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण, मंत्र पढ़ि शंकर डारयो॥
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥
चले षडानन, भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई॥

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहसमुख सके न गाई॥
मैं मतिहीन मलीन दुखारी। करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥
अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥
श्री गणेश यह चालीसा। पाठ करै कर ध्यान॥
नित नव मंगल गृह बसै। लहे जगत सन्मान॥

दोहा
सम्वत अपन सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥
 

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।


 
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