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Heavy Rainfall: क्यों होती है भीषण बारिश? क्या बताया गया है धर्म और पुराणों में अतिवृष्टि और अनावृष्टि का कारण

धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: Jyoti Mehra Updated Fri, 05 Jun 2026 01:26 PM IST
सार

Ativrushti Aur Anavrishti Kya Hai: धर्म ग्रंथों और पुराणों में प्राकृतिक घटनाओं को केवल विज्ञान से नहीं, बल्कि कर्म, धर्म और दैवी शक्तियों के संतुलन से जोड़ा गया है। अतिवृष्टि यानी जरूरत से ज्यादा बारिश, तूफान और बाढ़ को भी एक संकेत माना गया है, जो प्रकृति और मानव के बीच बिगड़ते संतुलन की ओर इशारा करता है। 

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Ativrushti Aur Anavrishti Reasons for excessive rainfall Storms and drought in religion and hindu mythology
धर्म और पुराणों में अत्यधिक वर्षा का कारण - फोटो : AI

Heavy Rainfall Reason In Hindu Mythology: धर्म ग्रंथों और पुराणों में प्राकृतिक घटनाओं को केवल विज्ञान से नहीं, बल्कि कर्म, धर्म और दैवी शक्तियों के संतुलन से जोड़ा गया है। अतिवृष्टि यानी जरूरत से ज्यादा बारिश को भी एक संकेत माना गया है, जो प्रकृति और मानव के बीच बिगड़ते संतुलन की ओर इशारा करता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार वर्षा के देवता इंद्र देव हैं। जब इंद्र प्रसन्न होते हैं तो समय पर और संतुलित वर्षा होती है, जिससे खेती, जीवन और समृद्धि बढ़ती है। लेकिन जब वे क्रोधित होते हैं, तो अत्यधिक वर्षा, आंधी-तूफान और बाढ़ जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। इसका उल्लेख गोवर्धन पर्वत कथा में मिलता है, जहां इंद्र के क्रोध के कारण भारी वर्षा हुई थी।

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ईरान इस्राइल युद्ध - फोटो : अमर उजाला

अधर्म और पाप का बढ़ना
श्रीमद्भागवत पुराण और मत्स्य पुराण जैसे ग्रंथ बताते हैं कि जब पृथ्वी पर अधर्म, अन्याय और पाप बढ़ते हैं, तो प्रकृति भी असंतुलित हो जाती है। अतिवृष्टि को इसी असंतुलन का परिणाम माना गया है। यह संकेत होता है कि समाज को धर्म के मार्ग पर लौटने की आवश्यकता है। 
श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय (कर्मयोग) के 14वें श्लोक में उल्लेख मिलता है- अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। 
जिसका अर्थ है, प्रत्योक प्राणी अन्न से जन्म लेता है, अन्न वर्षा (पर्जन्य) से उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञ का परिणाम होती है और यज्ञ नियत कर्मों से होता है।
 

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विवाह के वास्तु उपाय - फोटो : Adobe Stock

यज्ञ और कर्म का महत्व
वैदिक ग्रंथ ऋग्वेद में वर्षा को यज्ञ, तप और अच्छे कर्मों से जोड़ा गया है। माना जाता है कि जब यज्ञ और धार्मिक कृत्य सही तरीके से होते हैं, तो वातावरण शुद्ध रहता है और वर्षा संतुलित होती है। लेकिन इन कृत्यों की कमी से प्राकृतिक चक्र प्रभावित होता है, जिससे कहीं अत्यधिक वर्षा तो कहीं सूखा पड़ सकता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से अतिवृष्टि को एक चेतावनी भी माना गया है। यह दर्शाती है कि मनुष्य प्रकृति के नियमों के विपरीत चल रहा है। पेड़ों की कटाई, पर्यावरण प्रदूषण और संसाधनों का अत्यधिक दोहन भी इस असंतुलन को बढ़ाते हैं, जिसका प्रभाव मौसम में दिखाई देता है।

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शासन और समाज का प्रभाव - फोटो : adobe stock

शासन और समाज का प्रभाव
अग्नि पुराण के अनुसार यदि शासक धर्म के अनुसार कार्य नहीं करते, प्रजा पर अत्याचार होता है या समाज में नैतिकता कमजोर पड़ती है, तो प्रकृति असामान्य रूप धारण कर लेती है। अत्यधिक वर्षा, सूखा या अन्य प्राकृतिक आपदाएं इसी असंतुलन के संकेत माने जाते हैं।

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अनावृष्टि के बारे में क्या कहते हैं शास्त्र - फोटो : AI

अनावृष्टि के बारे में क्या कहते हैं शास्त्र
जहां अत्यधिक वर्षा को असंतुलन का संकेत माना गया है, वहीं अनावृष्टि यानी कम बारिश को भी शास्त्रों में चिंताजनक स्थिति बताया गया है। पुराणों के अनुसार जब धर्म-कर्म, यज्ञ और सत्कर्मों में कमी आती है, तब इंद्र देव प्रसन्न नहीं होते और वर्षा कम हो जाती है। इसके अलावा, समाज में बढ़ता अधर्म, स्वार्थ और प्रकृति के प्रति अनादर भी अनावृष्टि का कारण माना गया है। यह स्थिति सूखा, अकाल और कठिन जीवन परिस्थितियों को जन्म देती है। इसलिए शास्त्र संतुलित जीवन, धर्म पालन और प्रकृति के सम्मान पर जोर देते हैं, ताकि वर्षा का चक्र संतुलित बना रहे।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 

 

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