Living Will Harish Rana Case: गाजियाबाद के हरीश राणा मामले को शायद ही किसी को बताने की जरूरत हो। हरीश ने चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में जुलाई 2010 में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था। साल 2013 में वो अंतिम वर्ष का छात्र था और इसी दौरान अगस्त 2013 में रक्षाबंधन के दिन जब वो अपनी बहन से मोबाइल फोन पर बात कर रहा था। तभी वो अचानक पीजी की चौथी मंजिल से नीचे गिर गया था।
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What Is Living Will: क्या है हरीश राणा मामले से चर्चा में आई लिविंग विल? आसान शब्दों में यहां जानें
यूटिलिटी डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Prakash Chand Joshi
Updated Wed, 18 Mar 2026 12:54 PM IST
सार
Harish Rana Case Living Will News: हरीश राणा मामले से एक चीज जो सबसे अधिक चर्चा में है वो है लिविंग विल। क्या आप जानते हैं लिविंग विल होती क्या है?
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हरीश राणा केस: लिविंग विल क्या होती है?
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हरीश राणा केस: लिविंग विल क्या होती है?
- फोटो : Adobe Stock
क्या है लिविंग विल?
- दरअसल, लिविंग विल एक तरह का लिखित डॉक्यूमेंट होता है
- इस दस्तावेज में कोई भी व्यक्ति पहले ही अपनी इच्छा जाहिर कर देता है कि उसे गंभीर बीमार के समय किस तरह का इलाज मिले या दिया जाए
- हालांकि, ये नियम तब लागू होता है जब कोई व्यक्ति कोई फैसला लेने में सक्षम न हो या वो कोमा में हो
- व्यक्ति विल में ये लिखकर दे सकता है कि उसे वेंटिलेटर (जीवन रक्षक उपकरणों) पर रखा जाए या नहीं
- ये विल पैसिव यूथनेसिया की अनुमति देता है यानी इससे कोई भी व्यक्ति गरिमा के साथ मर सके
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हरीश राणा केस: लिविंग विल क्या होती है?
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कौन बनवा सकता है लिविंग विल?
- भारत में कोई भी व्यस्क व्यक्ति जो मानसिक रूप से स्वस्थ हो
- व्यक्ति की उम्र 18 साल से ऊपर होना भी जरूरी है
हरीश राणा केस: लिविंग विल क्या होती है?
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कैसे बनती है लिविंग विल?
- कोई भी व्यक्ति दो गवाहों की मौजूदगी में लिविंग विल को बना सकता है
- फिर आपको इसमें गजेटेड ऑफिसर के हस्ताक्षर करवाने होते हैं या आप इसकी नोटरी भी करवा सकते हैं
- इसके बाद इसे अपने या परिवार के पास सुरक्षित रखा जा सकता है या कोर्ट में जमा करवाया जा सकता है
- सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2023 में लिविंग विल बनाने की प्रक्रिया को आसान किया था
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कब मिली थी लिविंग विल को मान्यता?
- लिविंग विल और पैसिव यूथेनेसिया को सुप्रीम कोर्ट ने 9 मार्च 2018 को कॉमल कॉज यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में मान्यता दी थी
- उस वक्त 5 जजों की बेंच ने इसे गरिमा के साथ मरने का अधिकार जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का हिस्सा माना