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Financial Crisis: श्रीलंका की तरह ये देश भी कंगाली की तरफ बढ़े, इनमें कई भारत के पड़ोसी, जानें कैसे हैं यहां के हालात?

Mon, 18 Jul 2022 10:31 AM IST
हिमांशु मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Mon, 18 Jul 2022 10:31 AM IST
सार

श्रीलंका इकलौता देश नहीं है, जो इस तरह के आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। दुनिया में अभी ऐसे कई देशों में इस तरह के हालात बन चुके हैं। इनमें कई भारत के पड़ोसी मुल्क हैं।

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Finincial Crisis in world : many countries also move towards poverty, many of them are neighbors of India, know the situation?
श्रीलंका में प्रदर्शन - फोटो : Social media
श्रीलंका में आर्थिक संकट के चलते हालात काफी खराब हो चुके हैं। राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे देश छोड़कर भाग चुके हैं। श्रीलंका की जनता सड़कों पर उतर आई है। महंगाई के चलते खाने-पीने के दाम काफी बढ़ चुके हैं। गरीब भूखे सोने को मजबूर हो चुके हैं। 


पेट्रोल-डीजल के लिए लोगों की लंबी लाइनें लग रहीं हैं। श्रीलंका भारी विदेशी कर्ज में डूबा था। कई बार विदेशी कर्ज चुकाने के लिए समय मिला, लेकिन श्रीलंका नहीं कर पाया। अंत में श्रीलंका ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया। 

श्रीलंका इकलौता देश नहीं है, जो इस तरह के आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। दुनिया में अभी ऐसे कई देशों में इस तरह के हालात बन चुके हैं। इनमें कई भारत के पड़ोसी मुल्क हैं। आइए जानते हैं आर्थिक संकट से घिरे कौन-कौन से देश हैं? इन देशों में क्या स्थिति है?
 
Finincial Crisis in world : many countries also move towards poverty, many of them are neighbors of India, know the situation?
म्यांमार पर भी आर्थिक संकट मंडराने लगा है। - फोटो : अमर उजाला
ये देश भी हो चुके हैं दिवालिया 
श्रीलंका से पहले अमेरिकी देश अर्जेंटीना साल 2000 से 2020 के बीच दो बार दिवालिया हो चुका है। 2012 में ग्रीस, 1998 में रूस, 2003 में उरुग्वे, 2005 में डोमिनिकन रिपब्लिक और 2001 में इक्वाडोर भी दिवालिया हो चुका है। इसके अलावा जर्मनी, जापान, यूके जैसे 83 देश अलग-अलग समय पर दिवालिया घोषित हो चुके हैं। 

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस साल श्रीलंका के अलावा लेबनान, रूस, सूरीनाम और जाम्बिया भी समय से कर्ज नहीं चुका पाए और दिवालिया घोषित हो गए। बेलारूस, म्यांमार, पाकिस्तान, अर्जेंटीना, ट्यूनीशिया, यूक्रेन जैसे देश भी इसी कगार पर हैं। 
 
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श्रीलंका संकट - फोटो : अमर उजाला
पहले जानिए श्रीलंका में कैसे शुरू हुआ आर्थिक संकट?
यह समझने के लिए आपको एक दशक पहले चलना होगा। बात साल 2009 की है। श्रीलंका 26 साल से जारी गृहयुद्ध से निकला था। युद्ध के बाद की उसकी जीडीपी वृद्धि वर्ष 2012 तक प्रति वर्ष 8-9% के उपयुक्त उच्च स्तर पर बनी रही, लेकिन वैश्विक कमोडिटी मूल्यों में गिरावट, निर्यात की मंदी और आयात में वृद्धि के साथ वर्ष 2013 के बाद उसकी औसत जीडीपी विकास दर घटकर लगभग आधी रह गई।

2008 में गृहयुद्ध के दौरान श्रीलंका का बजट घाटा बहुत ज्यादा था। ऊपर से वैश्विक मंदी का भी दौर था। इसके चलते श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग समाप्त होता गया, जिसके कारण देश को वर्ष 2009 में IMF से 2.6 बिलियन डॉलर का कर्ज लेना पड़ा। इस कर्ज का असर 2013 के बाद देखने को मिला। जीडीपी तेजी से घट रही थी और कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा था। 2016 में श्रीलंका एक बार फिर 1.5 बिलियन डॉलर कर्ज के लिए आईएमएफ के पास पहुंचा, लेकिन आईएमएफ की शर्तों ने श्रीलंका की आर्थिक स्थिति को और बदतर कर दिया।

खैर, श्रीलंका की कमाई का मुख्य जरिया पर्यटन और खेती है। 2019 में इसे भी जोरदार झटका लगा। अप्रैल 2019 के बाद कोलंबो के विभिन्न गिरिजाघरों पर कई हमले हुए। पर्यटन अचानक से 80 फीसदी तक घट गया और इसका असर विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ा। 2019 में सत्ता में आई गोतबाया राजपक्षे की सरकार ने अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए टैक्स घटा दिया। किसानों को भी कई तरह की रियायत दे दीं, जिससे अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान हुआ। वहीं, श्रीलंका ने आईएमएफ से भी ज्यादा कर्ज चीन से ले लिया, जिसने देश को पूरी तरह तोड़ दिया। 

अभी श्रीलंका पुराने नुकसान से जूझ ही रहा था कि साल 2020 में कोरोना महामारी ने हालात पूरी तरह से खराब कर दिए। कोरोना के चलते चाय, रबर, मसालों और कपड़ों के एक्सपोर्ट पर असर पड़ा। पर्यटक आए नहीं, जिससे श्रीलंका के राजस्व और विदेशी मुद्रा की कमाई में जबरदस्त गिरावट आ गई। सरकार के व्यय में वृद्धि के कारण वर्ष 2020-21 में राजकोषीय घाटा 10 फीसदी से अधिक हो गया और ‘ऋण-जीडीपी अनुपात’ वर्ष 2019 में 94% के स्तर से बढ़कर वर्ष 2021 में 119% हो गया। उधर, सरकार ने खेती में केमिकल के प्रयोग पर पूरी तरह से रोक लगा दी। इसके चलते कृषि उत्पादन पर बुरी तरह से असर पड़ा और कृषि से होने वाली आय भी घट गई।   

कोरोना के इन दो साल में श्रीलंका पूरी तरह डूब गया। एक तरफ कर्ज का ब्याज चुकाना पड़ रहा था और दूसरी तरफ देश के लिए ईंधन व अन्य जरूरी सामान आयात करना था। धीरे-धीरे श्रीलंका के पास मौजूद विदेशी मुद्रा पूरी तरह से खत्म हो गई, जिसके बाद अप्रैल 2022 में श्रीलंका ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया।  
 
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श्रीलंका की तरह ये पड़ोसी देश भी दिवालिया होने के कगार पर

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पाकिस्तान के आर्थिक हालात भी बिगड़ चुके हैं। - फोटो : अमर उजाला
1. पाकिस्तान : विदेशी मुद्रा में भारी कमी, आईएफएम से फिर लेगा कर्ज

पाकिस्तान में भी श्रीलंका की तरह विदेशी मुद्रा खत्म हो रहे हैं। पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार 9.8 अरब डॉलर तक गिर गया है। 

इसी हफ्ते अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के साथ पाकिस्तान ने एक सौदा किया है। आईएमएफ फिर से पाकिस्तान को कर्ज देने के लिए तैयार हो गया है लेकिन वैश्विक बाजार में तेल की बढ़ती कीमतों के चलते पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव है जो उसे संकट की कगार पर धकेल रहा है। 

अभी जो पाकिस्तान के पास विदेशी मुद्रा बची है, वो पांच हफ्ते के आयात के लिए भी नाकाफी है। पाकिस्तानी रुपया कमजोर होकर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। एक डॉलर के मुकाबले पाकिस्तान रुपया करीब 210 पर पहुंच गया है। पाकिस्तान की सरकार ने लोगों से खर्च में कटौती करने को कहा है। 

पाकिस्तान में आज की तारीख में 263 रुपये लीटर पेट्रोल और 276 रुपये लीटर डीजल मिल रहा है। पाकिस्तान के कई राज्यों में पेट्रोल और डीजल के संकट के चलते पंप भी बंद होने लगे हैं। ईंधन महंगा होने के चलते खाद्य पदार्थ, फल-सब्जियों, दवा और अन्य जरूरी उत्पादों के दामों में भी इजाफा देखने को मिला है। नंबों की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस वक्त पाकिस्तान में एक लीटर दूध की कीमत 129 रुपये है। ब्रेड का एक पैकेट 90 रुपये तक का मिल रहा है। एक किलो चावल का दाम 167 रुपये है। टमाटर 98, आलू 56, प्याज 56, सेब 194 रुपये किलो मिल रहा है। वहीं, एक दर्जन केले के लिए लोगों को 111 रुपये देने पड़ रहे हैं। 
 
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म्यांमार - फोटो : अमर उजाला
2. म्यांमार में विदेशी कर्ज देरी से चुकाने को कहा गया
म्यांमार में भी आर्थिक संकट का खतरा आ चुका है। यहां विदेशी मुद्रा भंडार को नियंत्रण में लाने के लिए म्यांमार के केंद्रीय बैंक ने स्थानीय कंपनियों और बैंकों के लिए आदेश जारी किया है। इस आदेश में विदेशी कर्ज के भुगतान को स्थगित करने और देर से भुगतान करने के लिए कहा गया है। केंद्रीय बैंक ने 13 जुलाई को ये आदेश जारी किया है। 

केंद्रीय बैंक के बयान में कहा गया है, 'विदेशी मुद्रा कानून और विदेशी मुद्रा प्रबंधन नियमों के अनुसार, मूल रकम और ब्याज की रकम सहित विदेशी कर्ज के भुगतान को निलंबित कर दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही लाइसेंस प्राप्त बैंकों को अपने ग्राहकों के साथ भुगतान को लेकर फिर से व्यवस्था करनी चाहिए।' 

डॉलर के मुकाबले म्यांमार की मुद्रा क्यात की गिरावट ने देश में पहले से गहराए संकट को और बढ़ा दिया है। तेल और खाने पीने की कीमतों में भारी उछाल आया है। पिछले साल सेना ने म्यांमार में तख्तापलट कर सत्ता पर कब्जा कर लिया था। इसके चलते यहां कई तरह के संकट बढ़ गए। 

म्यांमार केंद्रीय बैंक ने एक दिन के अंदर स्थानीय बैंकों में विदेशी मुद्रा जमा करने और उसे बदलने को लेकर कई आदेश जारी किए हैं। मंत्रालयों और स्थानीय सरकार को भी घरेलू लेन-देन के लिए विदेशी मुद्रा का इस्तेमाल नहीं करने का आदेश दिया है। 

म्यांमार की मुद्रा क्यात के लिए आधिकारिक एक्सचेंज रेट, 1850 क्यात प्रति डॉलर पर निर्धारित किया गया है, लेकिन ये अनौपचारिक ब्लैक मार्केट से काफी नीचे है। 
 
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