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मथुरा नाव हादसा: ऋषभ शर्मा का शेरपुरा रोड पर अंतिम संस्कार, छोटे भाई ने दी अंतिम विदाई; जगरांव में पसरा मातम
Mon, 13 Apr 2026 10:30 AM IST
Nivedita
संवाद न्यूज एजेंसी, जगरांव (पंजाब)
संवाद न्यूज एजेंसी, जगरांव (पंजाब)
Published by: Nivedita
Updated Mon, 13 Apr 2026 10:30 AM IST
सार
मथुरा में नाव हादसे में जगरांव के 6 लोगों की मौत हुई है। जगरांव से वृंदावन की ओर निकली भक्ति यात्रा किसी ने सोचा भी नहीं था कि इतनी दर्दनाक याद बन जाएगी ।
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ऋषभ शर्मा का अंतिम संस्कार
- फोटो : संवाद
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विस्तार
वृंदावन में हुए दर्दनाक नाव हादसे में जान गंवाने वाले ऋषभ शर्मा का आज शेरपुरा रोड पर अंतिम संस्कार किया गया। छोटे भाई ने बड़े भाई को अंतिम विदाई दी।
मंदिरों के संकीर्तन से शुरू हुई कहानी जगरांव के रहने वाले यशु बजाज और लवी बहल ने करीब 16-17 साल की उम्र में मंदिरों में संकीर्तन करना शुरू किया था। उस समय उनके पास न कोई बड़ा मंच था और न ही कोई संस्था, सिर्फ भक्ति का जज़्बा था।
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धीरे-धीरे उनके साथ लवी बहल का भाई मधुर बहल भी जुड़ गया। तीनों ने मिलकर मंदिरों के साथ-साथ लोगों के घरों में भी संकीर्तन करना शुरू कर दिया। यशु और लवी भजन गाते थे, जबकि उनके साथ 5-6 साथी वाद्य यंत्र बजाकर मंडली को पूरा करते थे। भक्ति की इस छोटी-सी शुरुआत ने धीरे-धीरे पूरे इलाके में पहचान बना ली।
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जगरांव में पसरा मातम
मथुरा में नाव हादसे में जगरांव के 6 लोगों की मौत हुई है। जगरांव से वृंदावन की ओर निकली भक्ति यात्रा किसी ने सोचा भी नहीं था कि इतनी दर्दनाक याद बन जाएगी । जिन श्रद्धालुओं के होंठों पर “राधे-राधे” का नाम था, जिनकी आंखों में बांके बिहारी के दर्शन की आस थी, वही श्रद्धालु कुछ ही घंटों में मौत की लहरों में समा गए। वृंदावन में यमुना नदी में हुए नाव हादसे ने पंजाब के जगरांव शहर को गहरे सदमे में डाल दिया। इस हादसे में 13 श्रद्धालुओं की मौत हो गई, जिनमें उस क्लब के संस्थापकों में से एक भाई भी शामिल था, जिसने लोगों को भक्ति के रास्ते से जोड़ने का सपना देखा था।
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बांके बिहारी क्लब से जुड़ी कहानी
यह पूरी कहानी जगरांव के बांके बिहारी क्लब से जुड़ी है, जो करीब 9 साल पहले तीन युवकों ने मिलकर बनाया था।मंदिरों के संकीर्तन से शुरू हुई कहानी जगरांव के रहने वाले यशु बजाज और लवी बहल ने करीब 16-17 साल की उम्र में मंदिरों में संकीर्तन करना शुरू किया था। उस समय उनके पास न कोई बड़ा मंच था और न ही कोई संस्था, सिर्फ भक्ति का जज़्बा था।
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धीरे-धीरे उनके साथ लवी बहल का भाई मधुर बहल भी जुड़ गया। तीनों ने मिलकर मंदिरों के साथ-साथ लोगों के घरों में भी संकीर्तन करना शुरू कर दिया। यशु और लवी भजन गाते थे, जबकि उनके साथ 5-6 साथी वाद्य यंत्र बजाकर मंडली को पूरा करते थे। भक्ति की इस छोटी-सी शुरुआत ने धीरे-धीरे पूरे इलाके में पहचान बना ली।