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Mohali: फर्जी बिल घोटाले में पूर्व एक्सईएन को पांच साल की सजा, 15 साल पहले किया था 1.62 करोड़ का घपला

Wed, 29 Jul 2026 08:50 AM IST
चंडीगढ़ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, मोहाली
संवाद न्यूज एजेंसी, मोहाली Published by: चंडीगढ़ ब्यूरो Updated Wed, 29 Jul 2026 08:50 AM IST
सार

यह घोटाला मई 2011 में हुआ। जोगिंदर सिंह को बठिंडा विकास प्राधिकरण (बीडीए) के मानसा स्थित विकास कार्यों की अतिरिक्त जिम्मेदारी मिली थी। उन्होंने सड़क निर्माण कार्य का एक फर्जी रनिंग बिल तैयार कराया।

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Former Executive Engineer Joginder Singh sentenced to five years in Rs 1.62 crore fake bill scam
सीबीआई - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

सीबीआई की विशेष अदालत ने 15 साल पुराने 1.62 करोड़ रुपये के फर्जी रनिंग बिल घोटाले में पंजाब लोक निर्माण विभाग के पूर्व एक्सईएन जोगिंदर सिंह को पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। 
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अदालत ने उन्हें दोषी ठहराकर जुर्माना भी लगाया है। सभी सजाएं एक साथ चलेंगी। विशेष सीबीआई न्यायाधीश बलजिंदर सिंह सरा ने जोगिंदर सिंह को भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया।
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उन्हें धारा 420 और 467 के तहत पांच-पांच वर्ष का कठोर कारावास मिला। अन्य धाराओं के तहत तीन-तीन वर्ष की सजा सुनाई गई। 

यह घोटाला मई 2011 में हुआ। जोगिंदर सिंह को बठिंडा विकास प्राधिकरण (बीडीए) के मानसा स्थित विकास कार्यों की अतिरिक्त जिम्मेदारी मिली थी। उन्होंने सड़क निर्माण कार्य का एक फर्जी रनिंग बिल तैयार कराया। इस पर सब-डिवीजनल इंजीनियर (एसडीई) व जूनियर इंजीनियर (जेई) के जाली हस्ताक्षर किए गए। इसके बाद बीडीए से 1.62 करोड़ रुपये की राशि जारी करवा ली गई। अदालत ने कहा कि फर्जी बिलों पर सरकारी धन जारी करना धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार का स्पष्ट प्रमाण है।
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गवाहों और दस्तावेजी साक्ष्यों से साबित हुआ मामला
मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने 18 गवाह पेश किए। इनमें एसडीई, जेई और लेखा अधिकारी प्रमुख थे। एसडीई विनोद कुमार और जेई प्रमोद कुमार ने अदालत को बताया कि विवादित बिल उन्होंने तैयार नहीं किए थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन पर किए गए हस्ताक्षर भी उनके नहीं थे। जेई ने बताया कि वास्तविक बिल 73.10 लाख रुपये का था, जबकि प्रस्तुत बिल फर्जी था।


बचाव पक्ष की दलील खारिज
अदालत ने बचाव पक्ष की दलील खारिज की कि बाद में राशि के समायोजन से सरकार को नुकसान नहीं हुआ। अदालत ने कहा कि फर्जी बिलों पर सरकारी धन जारी करने का अपराध उसी समय पूरा हो गया था। इसलिए बाद में राशि समायोजित होने से आरोपी को कानूनी राहत नहीं मिल सकती। दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त थे।
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