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भरतपुर: जाट आरक्षण आंदोलन के नेताओं में रार, पूर्व मंत्री विश्वेंद्र और नेम सिंह फौजदार में जुबानी जंग तेज

Thu, 24 Sep 2026 04:17 PM IST
प्रिया वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भरतपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भरतपुर Published by: प्रिया वर्मा Updated Thu, 24 Sep 2026 04:17 PM IST
सार

जाट आरक्षण आंदोलन के नेता पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह और आरक्षण संघर्ष समिति संयोजक नेम सिंह फौजदार के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। दोनों ने आंदोलन में अपनी भूमिका, पुराने राजनीतिक संबंधों और आरक्षण के मुद्दे को लेकर एक-दूसरे पर सवाल उठाए।

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Bharatpur: Vishvendra Singh and Nem Singh Faujdar Clash Over Jat Reservation, Old Ties and Agitation
जाट आरक्षण मुद्दे पर आमने-सामने विश्वेंद्र सिंह और नेम सिंह फौजदार - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भरतपुर-धौलपुर क्षेत्र के जाट आरक्षण आंदोलन को लेकर पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह और आरक्षण संघर्ष समिति के संयोजक नेम सिंह फौजदार के बीच मतभेद अब सार्वजनिक हो गए हैं। दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के बयानों और आंदोलन में अपनी-अपनी भूमिका को लेकर खुलकर जवाब दिया है। ताजा विवाद नेम सिंह के गांव में हुए एक खेलकूद कार्यक्रम और उसके बाद सामने आए बयानों से जुड़ा है। जाट आरक्षण का मुद्दा भरतपुर, धौलपुर और डीग क्षेत्र में लंबे समय से आंदोलन का विषय रहा है।

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विश्वेंद्र सिंह ने वीडियो जारी कर दिया जवाब
पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने वीडियो जारी कर नेम सिंह फौजदार के बयानों पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उन्हें नेम सिंह की माताजी के निधन की जानकारी एक कार्यक्रम का वीडियो देखने के बाद मिली। उनका कहना था कि यदि उन्हें पहले सूचना मिलती तो वे निश्चित रूप से घर जाकर संवेदना व्यक्त करते।
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विश्वेंद्र सिंह ने अपने पुराने राजनीतिक संबंधों और आरक्षण आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि वर्ष 1990 में उन्होंने आरक्षण के मुद्दे पर लोकसभा से इस्तीफा दिया था। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने नेम सिंह को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाया और आंदोलन की जिम्मेदारी सौंपी थी। उन्होंने यह भी कहा कि विधायक रहते हुए उन्होंने आंदोलन से जुड़े कई मुकदमों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली थी। विश्वेंद्र सिंह ने पुराने चुनावों का जिक्र करते हुए नेम सिंह और उनके परिवार के उनसे संपर्क करने की बात भी कही।
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पंचायत बुलाने की पेशकश
विश्वेंद्र सिंह ने कहा कि वे किसी की धमकी से डरने वाले नहीं हैं। उन्होंने नेम सिंह से कहा कि यदि वे चाहें तो पंचायत बुला सकते हैं और उसका पूरा खर्च वे खुद उठाने को तैयार हैं। सांसद संजना जाटव से जुड़े मुद्दे पर विश्वेंद्र सिंह ने कहा कि उनके भाषण में किसी का नाम नहीं लिया गया था। उन्होंने लोगों से इस मामले में भ्रम नहीं फैलाने की बात कही।

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नेम सिंह बोले- आरक्षण दिलाना जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी
विश्वेंद्र सिंह के बयान पर नेम सिंह फौजदार ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके परिवार में माताजी के निधन के दुखद समय में इस तरह की टिप्पणी की गई है। उन्होंने कहा कि आरक्षण दिलाना किसी एक व्यक्ति के व्यक्तिगत स्तर पर लड़ने का विषय नहीं है, बल्कि यह उन जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है, जो चुनाव जीतकर सदन में पहुंचते हैं। नेम सिंह ने कहा कि सड़क बनवाने से लेकर आरक्षण दिलाने तक की जिम्मेदारी जनप्रतिनिधियों की होती है। उन्होंने कहा कि अन्याय नौजवानों और बच्चों के साथ हो रहा है और इसी वजह से वे आरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने हनुमान बेनीवाल और सांसद संजना जाटव का जिक्र किया और कहा कि दोनों ने इस मुद्दे को उठाया है। नेम सिंह ने सवाल किया कि विश्वेंद्र सिंह लंबे समय तक सांसद और विधायक रहे, ऐसे में उन्होंने सदन में इस मुद्दे को कितनी बार उठाया।


2015 के आंदोलन का किया जिक्र
नेम सिंह ने वर्ष 2015 के आरक्षण आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय उन्हें नई जिम्मेदारी मिली थी और उन्होंने गांव-गांव जाकर चावल बांटने का काम किया था। उनके अनुसार उस आंदोलन के दौरान उनके खिलाफ 156 मुकदमे दर्ज हुए थे। नेम सिंह ने कहा कि आंदोलन का झंडा विश्वेंद्र सिंह ने ही उन्हें दिया था और इसके लिए वे उनका श्रेय स्वीकार करते हैं। उन्होंने कहा कि विश्वेंद्र सिंह उनके लिए सम्माननीय हैं और उनका सम्मान आगे भी बना रहेगा। हालांकि नेम सिंह ने यह भी कहा कि सम्मान करने का अर्थ यह नहीं है कि वे हर बात को चुपचाप स्वीकार करते रहेंगे। उन्होंने संकेत दिया कि यदि उन्होंने अपनी ओर से पुरानी बातें सार्वजनिक करनी शुरू कीं तो कई तथ्य सामने आ सकते हैं।

गौरतलब है कि भरतपुर-धौलपुर के जाटों के केंद्रीय नौकरियों में ओबीसी आरक्षण का मुद्दा पहले भी आंदोलन और वार्ता का विषय रहा है। 2024 में विश्वेंद्र सिंह और नेम सिंह फौजदार ने संयुक्त रूप से आंदोलन को लेकर सार्वजनिक रूप से एकजुटता की बात कही थी। अब दोनों नेताओं के ताजा बयानों से आरक्षण आंदोलन के नेतृत्व और उनकी पुरानी राजनीतिक भूमिका को लेकर सार्वजनिक बहस तेज हो गई है।

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