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जयपुर बम धमाका केस में सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: दो आतंकियों की रिहाई याचिका खारिज, बोला- मामला बेहद गंभीर

Tue, 08 Sep 2026 02:15 PM IST
प्रिया वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: प्रिया वर्मा Updated Tue, 08 Sep 2026 02:15 PM IST
सार

जयपुर सीरियल ब्लास्ट के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद की सजा काट रहे दो दोषियों की रिहाई की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने मामले को बेहद गंभीर बताते हुए राष्ट्रीय और जनसुरक्षा से जुड़ा माना। दोनों दोषी नौवें बम की साजिश में सजा काट रहे हैं।

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Jaipur Bomb Blast Case: Supreme Court Rejects Plea to Release Two Terrorists, Says Matter Is Extremely Serious
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2008 के जयपुर सिलसिलेवार बम धमाका मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे आतंकवादी मोहम्मद सरवर आजमी उर्फ ढिल्ला पप्पू और शाहबाज अहमद की रिहाई की याचिका खारिज कर दी है। न्यायालय ने दो टूक कहा कि यह अत्यंत गंभीर मामला है, जिसे सामान्य जमानत अर्जी की तरह नहीं देखा जा सकता। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसुरक्षा को खतरे का गंभीर विषय शामिल है।

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न्यायाधीश एमएम सुंदरेश और न्यायाधीश प्रसन्ना वी वराले की पीठ ने दोनों दोषियों की अपील निरस्त करते हुए यह आदेश दिया। इस फैसले के बाद उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगाने से इंकार हो गया है, जिसके तहत अपील लंबित रहने के दौरान रिहाई से मना किया गया था। 
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बता दें कि यह मामला 13 मई, 2008 को चांदपोल बाजार में मिले एक जिंदा बम से संबंधित है। उस खौफनाक शाम गुलाबी नगर में नौ अलग-अलग स्थानों पर बम रखे गए थे, जिनमें से आठ में एक के बाद एक धमाके हुए थे। इन विस्फोटों में 70 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी और 186 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
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अदालत में अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि इसी आपराधिक साजिश से जुड़े अन्य आठ मामलों में राजस्थान उच्च न्यायालय आजमी को पहले ही बरी कर चुका है। याचिकाकर्ता के अनुसार जब आठ मामलों में उसे निर्दोष माना जा चुका है, तो नौवें मामले में हिरासत जारी रखना अनुचित है। बचाव पक्ष ने पुलिस कार्रवाई में 12 वर्ष की देरी पर सवाल उठाते हुए कहा कि आरोपी पूर्व में ही 15 वर्ष से अधिक समय जेल में बिता चुका है। 

इसके जवाब में राज्य सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और अतिरिक्त महाधिवक्ता शिवमंगल शर्मा ने बताया कि नौवें बम का मामला साक्ष्यों और बरामद जिंदा बम के कारण अन्य आठ मामलों से भिन्न है। एक दुकानदार ने आजमी की पहचान उस व्यक्ति के रूप में की है, जिसने बम ले जाने के लिए प्रयोग की गई साइकिल बेची थी।


राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय के बरी करने के फैसलों के खिलाफ राज्य की अपीलें सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं, इसलिए उनका लाभ आरोपी को नहीं मिल सकता। विलंब से हुई गिरफ्तारी का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि मामला झूठा है। 

चांदपोल में सीतारामजी मंदिर के सामने रखे गए इस नौवें बम को बम निरोधक दस्ते के सदस्य सुनील भाटिया और उनकी टीम ने सूझबूझ से निष्प्रभावी कर बड़ी तबाही रोक दी थी। यदि वह बम फट जाता तो कम से कम 20 से 25 और बेगुनाह लोगों की जान चली जाती। वर्ष 2025 में विशेष अदालत ने नौवां बम लगाने की साजिश में दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे चुनौती देने वाली उच्च न्यायालय की याचिका खारिज होने पर वे सर्वोच्च न्यायालय पहुंचे थे। पीड़ित परिवारों ने सर्वोच्च न्यायालय के रुख को न्याय की दिशा में बड़ा कदम माना है।

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