निकाय चुनाव में थर्ड फ्रंट की आहट: आरएलपी नागौर से बाहर 14 जिलों में पहुंची, आप-सीपीएम ने भी दिखाई ताकत
क्या निर्दलीयों के उभार, आरएलपी के 63 वार्ड, बारां में आप और नोखा में सीपीएम की सफलता ने राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस के बीच तीसरे राजनीतिक विकल्प की जमीन तैयार कर दी है? क्या राजस्थान में तीसरा मोर्चा बनने की ओर है? निकाय चुनाव में हुए इस परिवर्तन पर कई कयास लगाए जा रहे हैं। जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ...
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राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव के नतीजों ने भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमटे राजनीतिक मुकाबले से अलग तीसरी राजनीतिक ताकत की संभावनाओं को भी सामने ला दिया है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी, आम आदमी पार्टी और सीपीआई(एम) ने अलग-अलग इलाकों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। इन दलों की जीत भले ही प्रदेशव्यापी तस्वीर बदलने जितनी बड़ी नहीं हो, लेकिन कई जगह इनके प्रदर्शन ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या 2028 से पहले राजस्थान की राजनीति में भाजपा-कांग्रेस के अलावा कोई नया विकल्प मजबूत हो सकता है।
आरएलपी की ताकत नागौर में, 14 जिलों तक पहुंच
हनुमान बेनीवाल की आरएलपी ने 63 वार्ड जीतकर अपनी क्षेत्रीय पकड़ बरकरार रखी है। पार्टी का सबसे मजबूत प्रदर्शन नागौर में रहा, जहां उसके खाते में 28 सीटें आईं। इसके अलावा ब्यावर में आठ, डीडवाना-कुचामन और जयपुर में पांच-पांच, जोधपुर और बीकानेर में तीन-तीन तथा अजमेर, चूरू और सीकर में दो-दो सीटें मिलीं।
आरएलपी ने अलवर, भरतपुर, भीलवाड़ा, पाली और सिरोही में भी एक-एक वार्ड जीता। यानी पार्टी ने 14 जिलों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि आरएलपी का मुख्य आधार अभी नागौर और आसपास के क्षेत्र हैं। चुनौती यह है कि बेनीवाल इस प्रभाव को दूसरे जिलों तक कितना बढ़ा पाते हैं।
निकाय चुनाव में RLP का प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी पहले से ही राजस्थान की चुनावी राजनीति में भाजपा और कांग्रेस से अलग क्षेत्रीय विकल्प के तौर पर अपनी जगह बनाने की कोशिश करती रही है।
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बारां में आप की बड़ी जीत
तीसरे राजनीतिक विकल्प की चर्चा में आम आदमी पार्टी का बारां नगर परिषद में प्रदर्शन सबसे बड़ा उदाहरण है। आप ने यहां 60 में से 31 वार्ड जीतकर बहुमत हासिल किया। कांग्रेस को 18 और भाजपा को नौ सीटें मिलीं।
आप के लिए यह सिर्फ सीटों की संख्या का मामला नहीं है। पार्टी ने सीधे बोर्ड बनाने की स्थिति हासिल कर यह संकेत दिया है कि वह राजस्थान में कम से कम कुछ इलाकों में भाजपा और कांग्रेस के अलावा अपना आधार बना सकती है।
बारां का नतीजा कांग्रेस के लिए भी अहम है, क्योंकि यहां आप ने सीधे तौर पर मुख्य विपक्षी दल से ज्यादा सीटें हासिल की हैं। हालांकि इसे पूरे प्रदेश में AAP के विस्तार का संकेत मानने से पहले दूसरे निकायों में पार्टी के प्रदर्शन को देखना होगा।
नोखा में सीपीएम का मजबूत प्रदर्शन
सीपीआई(एम) ने बीकानेर जिले के नोखा में 45 में से 29 वार्ड जीतकर अपनी ताकत दिखाई। भाजपा को 13 और निर्दलीयों को तीन सीटें मिलीं। नोखा में सीपीएम का प्रदर्शन बताता है कि मजबूत स्थानीय संगठन और क्षेत्र विशेष में राजनीतिक पकड़ के दम पर छोटा दल भी बड़े दलों को पीछे छोड़ सकता है।
सीपीएम की यह सफलता फिलहाल क्षेत्रीय है, लेकिन निकाय चुनाव में इसका संदेश साफ है कि राजस्थान में भाजपा-कांग्रेस के अलावा दूसरे राजनीतिक दलों के लिए भी स्थानीय स्तर पर जगह मौजूद है।
क्या सीपीएम, सीपीएम और सीपीएम साथ आ सकते हैं?
इन तीनों दलों के प्रदर्शन को फिलहाल एक संगठित 'थर्ड फ्रंट' कहना जल्दबाजी होगी। आरएलपी का आधार मुख्य रूप से नागौर और पश्चिमी राजस्थान के कुछ हिस्सों में है। आप ने बारां में बड़ी सफलता हासिल की है, जबकि सीपीएम का मजबूत आधार नोखा में सामने आया है।
तीनों दलों के राजनीतिक आधार, संगठन और वोट बैंक अलग-अलग हैं। ऐसे में असली सवाल यह है कि क्या ये दल भविष्य में किसी साझा राजनीतिक मंच या रणनीति पर साथ आ सकते हैं।
2028 से पहले भाजपा-कांग्रेस के लिए संदेश
निकाय चुनावों ने कम से कम इतना संकेत जरूर दिया है कि राजस्थान की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बाहर जगह पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आरएलपी की 63 सीटें, बारां में आप की बहुमत वाली जीत और नोखा में सीपीएम का प्रदर्शन अपने-अपने क्षेत्रों में तीसरे विकल्प की संभावनाएं दिखाते हैं।
हालांकि विधानसभा चुनाव का मैदान निकाय चुनाव से अलग होता है। 2028 में इन दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय जीत को व्यापक जनाधार में बदलने की होगी। खासकर आरएलपी के लिए सवाल यह रहेगा कि क्या हनुमान बेनीवाल नागौर से बाहर पार्टी का प्रभाव बढ़ा पाएंगे? यानी अभी थर्ड फ्रंट तैयार नहीं हुआ है, लेकिन निकाय चुनाव ने उसकी संभावित जमीन जरूर दिखा दी है।
निकाय चुनाव के दौरान क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने अपनी शक्ति दिखाई है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के टिकट पर चुनाव में उतरे प्रत्याशियों में से कुल 63 प्रत्याशी विजयी घोषित किए गए हैं। इस जीत ने आरएलपी को चुनाव में सबसे अधिक सीटें जीतने वाले क्षेत्रीय दल के रूप में स्थापित किया है। आम आदमी पार्टी (आप) ने बारां निकाय में अपना बोर्ड बनाने में सफलता प्राप्त की है। वहीं, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी माकपा ने नोखा नगर निकाय में अपना बोर्ड बनाएगी।
इनका कहना है
वरिष्ठ पत्रकार मनीष गोधा के मुताबिक, निकाय चुनाव के नतीजों में भाजपा और कांग्रेस के अलावा तीसरी ताकत के लिए जगह बनती दिख रही है। आरएलपी ने 14 जिलों में 63 वार्ड जीते हैं, जबकि आप और सीपीएम ने भी अपने मजबूत इलाकों में असर दिखाया है। हालांकि इसे अभी तीसरे मोर्चे की शुरुआत कहना जल्दबाजी होगी। आपएलपी का मजबूत आधार अभी नागौर और आसपास के इलाकों में है। अगर बेनीवाल इस आधार को दूसरे जिलों तक बढ़ा पाते हैं और छोटे दलों के साथ कोई व्यापक राजनीतिक विकल्प खड़ा कर पाते हैं, तो 2028 में भाजपा-कांग्रेस के सामने नई चुनौती हो सकती है।
क्या कहते हैं कांग्रेस नेता
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व प्रवक्ता सर्णिम चतुर्वेदी का कहना है कि राजस्थान में थर्ड फ्रंट की ज्यादा जगह नहीं है। कांग्रेस ने रणनीतिक रूप से कई जगहों पर सिंबल नहीं दिए। खास तौर पर पूर्वी राजस्थान में कांग्रेस का मजबूत आधार है, इसलिए वहां पार्टी ने सिंबल नहीं दिए। उनका कहना है कि छोटे दलों की जीत को प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलाव के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
नतीजों को लेकर भाजपा का क्या मत है?
भाजपा की प्रदेश सचिव एकता अग्रवाल के मुताबिक, निकाय चुनाव के नतीजों को थर्ड फ्रंट के रूप में देखना सही नहीं होगा। छोटे दलों को मिली सीटें स्थानीय समीकरणों का नतीजा हैं। भाजपा का संगठन प्रदेशभर में मजबूत है और जनता ने पार्टी पर भरोसा जताया है। आरएलपी का प्रभाव भी कुछ खास इलाकों तक सीमित है। निकाय चुनाव और विधानसभा चुनाव के मुद्दे अलग होते हैं, इसलिए इन नतीजों के आधार पर 2028 के लिए बड़े राजनीतिक बदलाव का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी।
स्थानीय निकाय चुनाव में क्षेत्रीय दलों में से राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) ने सबसे अधिक सफलता हासिल करते हुए 63 सीटों पर विजय दर्ज की है। इसके अतिरिक्त, आम आदमी पार्टी (आप) ने बारां स्थानीय निकाय में सफलता प्राप्त करते हुए बोर्ड बना लिया है। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी माकपा ने नोखा निकाय में जीत हासिल कर बोर्ड बनाने में सफलता पाई है।
बाप ने भंग की बांसवाड़ा की पूरी कार्यकारिणी
भारत आदिवासी पार्टी (बाप) ने बांसवाड़ा में चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद संगठनात्मक स्तर पर बड़ा फैसला किया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष मोहनलाल रोत ने बांसवाड़ा जिले की पूरी कार्यकारिणी को भंग कर दिया। आदेश के मुताबिक, जिले के सभी जिम्मेदार पदाधिकारियों को उनके पदों से पदमुक्त किया गया है। आदेश में चुनाव के दौरान नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच आपसी खींचतान और संगठनात्मक स्तर पर मतभेद को चुनावी प्रदर्शन प्रभावित होने की वजहों में बताया गया है।