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Rajasthan: न मोदी मैजिक, न हिंदुत्व का भरोसा! राजस्थान बचाने के लिए जातीय समीकरणों की शरण में बीजेपी?

Sourabh Bhatt Sourabh Bhatt
Updated Fri, 05 Jun 2026 10:09 AM IST
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सार

राजस्थान में राज्यसभा चुनाव के लिए बीजेपी द्वारा सतीश पूनियां और अल्का गुर्जर को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद पार्टी की नई राजनीतिक रणनीति को लेकर चर्चा तेज हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी अब केवल मोदी फैक्टर और हिंदुत्व की राजनीति पर निर्भर रहने के बजाय सामाजिक और जातीय समीकरणों को भी साधने में जुटी है।

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बीजेपी ने चला बड़ा दांव - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

बिहार और यूपी से सबक लेकर बीजेपी क्या राजस्थान की राजनीति में फिर जातिगत समीकरणों पर लौट रही है? राजस्थान से राज्यसभा जाने वाले प्रत्याशियों में केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू का टिकट काटने से यह संकेत मिल रहे हैं कि बीजेपी को पंजाब भय नहीं है बल्की उसे चिंता है कि राजस्थान में सरकार को कैसे रिपीट किया जाए।  



यही वजह है कि राजस्थान में राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन ने एक बार फिर बीजेपी की राजनीतिक रणनीति पर बहस छेड़ दी है। पार्टी ने जिन सामाजिक व जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखते हुए यहां टिकट वितरण किया है, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अब राजस्थान में बीजेपी केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, हिंदुत्व की राजनीति और भजनलाल सरकार के प्रदर्शन के भरोसे चुनावी मैदान में उतरने को लेकर आश्वस्त नहीं है? जबकि राजस्थान में विधानसभा व लोकसभा चुनावों के दौरान बीजेपी ने मोदी फैक्टर और हिंदुत्व कार्ड का जमकर इस्तेमाल किया था। 
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जाट और गुर्जर समाज को प्रतिनिधित्व देकर दिया बड़ा संदेश
राजस्थान में पिछले कुछ वर्षों के दौरान जाट और गुर्जर दोनों समुदायों में राजनीतिक असंतोष की चर्चा समय-समय पर सामने आती रही है। किसान आंदोलन, आरक्षण के मुद्दे और स्थानीय नेतृत्व की अनदेखी जैसे विषयों ने इन वर्गों में राजनीतिक विकल्पों की तलाश की जमीन भी तैयार की है। ऐसे में बीजेपी का राज्यसभा टिकट वितरण सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

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रवनीत सिंह बिट्टू को प्राथमिकता नहीं, राजस्थान पर फोकस

दिलचस्प बात यह है कि पार्टी ने पंजाब की राजनीति में सक्रिय और केंद्र में मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के बजाय राजस्थान के प्रभावशाली जातिगत समूहों से आने वाले नेताओं को प्राथमिकता दी। हालांकि जातिगत फैक्टर बलेंस करने का काम लोकसभा, विधानसभा और पंचायत-निकाय चुनावों में देखने को मिलता रहा है लेकिन राज्यसभा में इस तरह के प्रयोग बीजेपी में आने वाले दिनों में बड़े बदलावों का संकेत भी दे रहे हैं।


क्या केवल मोदी फैक्टर अब पर्याप्त नहीं?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि लोकसभा चुनाव में राजस्थान में शानदार प्रदर्शन के बावजूद बीजेपी संगठन यह मानकर चल रहा है कि हर चुनाव केवल मोदी फैक्टर के सहारे नहीं जीता जा सकता।
विश्लेषकों का मानना है कि राज्य स्तर पर मजबूत स्थानीय नेतृत्व, सामाजिक प्रतिनिधित्व और जातीय संतुलन बनाए बिना आगामी चुनावी चुनौतियों का सामना करना आसान नहीं होगा। यही वजह है कि पार्टी अब विभिन्न सामाजिक वर्गों को संतुष्ट रखने की रणनीति पर काम कर रही है।

विपक्ष के मुद्दों पर भी नजर

विपक्षी दल लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि राज्य सरकार के डेढ़ साल के कार्यकाल में रोजगार, महंगाई, कानून-व्यवस्था और कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों पर असंतोष बढ़ा है। ऐसे में बीजेपी किसी भी बड़े सामाजिक वर्ग को नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहती। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा उम्मीदवारों के चयन के जरिए पार्टी ने आने वाले चुनावों के लिए सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।

आने वाले चुनावों की तैयारी का संकेत

राजस्थान में राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों का चयन केवल एक संसदीय प्रक्रिया नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भविष्य की चुनावी रणनीति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। जाट और गुर्जर समाज को प्रतिनिधित्व देकर बीजेपी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह प्रदेश के सामाजिक समीकरणों को लेकर पूरी तरह सतर्क है और आगामी चुनावों के लिए अभी से तैयारी शुरू कर चुकी है।

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