हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: 16 साल की देरी से पुनर्नियुक्ति नहीं, अवैध बर्खास्तगी पर मिलेगा 2.5 लाख मुआवजा
प्रदेश हाईकोर्ट ने सेवा मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय में माना है कि भले ही किसी दैनिक वेतनभोगी की सेवाएं अवैध रूप से समाप्त की गई हों और औद्योगिक विवाद अधिनियम की धाराओं का उल्लंघन हुआ हो।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सेवा मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय में माना है कि भले ही किसी दैनिक वेतनभोगी की सेवाएं अवैध रूप से समाप्त की गई हों और औद्योगिक विवाद अधिनियम की धाराओं का उल्लंघन हुआ हो। लेकिन मामला 16 वर्षों के अत्यधिक विलंब के बाद उठाया गया है, तो कर्मचारी को पुनर्नियुक्ति नहीं दी जा सकती। हालांकि, न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने याचिकाकर्ता की 9 वर्षों से अधिक की सेवाओं को ध्यान में रखते हुए श्रम न्यायालय की ओर से दिए गए 75,000 के मुआवजे को नाकाफी माना और इसे बढ़ाकर 2,50,000 कर दिया है। अदालत ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए बिजली बोर्ड को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को 4 सप्ताह के भीतर 2,50,000 रुपये का भुगतान करे।
यदि तय सीमा में भुगतान नहीं किया जाता है, तो विभाग को देय तिथि से 6 फीसदी वार्षिक दर से ब्याज भी चुकाना होगा।याचिकाकर्ता राज कुमार को मई 1987 में राज्य बिजली बोर्ड में दैनिक वेतनभोगी बेलदार के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्होंने अगस्त 1996 तक कार्य किया। याचिकाकर्ता का आरोप था कि सितंबर 1997 में उन्हें बिना किसी नोटिस के सेवा से हटा दिया गया, जबकि उनसे कनिष्ठ (जूनियर) कर्मचारियों को काम पर बनाए रखा गया। श्रम न्यायालय ने माना कि धारा 25 एफ और 25 जी का उल्लंघन हुआ है, लेकिन 16 साल की देरी से मांगपत्र देने के कारण पुनर्नियुक्ति का दावा खारिज कर दिया और केवल 75,000 का मुआवजा मंजूर किया। याचिकाकर्ता ने श्रम न्यायालय के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए पुनर्नियुक्ति की मांग की थी। अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए श्रम न्यायालय के पुनर्नियुक्ति न देने के फैसले को बरकरार रखा और मुआवजे की राशि में संशोधन किया।
क्लेयरमोंट बिल्डिंग विवाद: हाईकोर्ट में 27 अक्तूबर को होगी अगली सुनवाई
प्रदेश हाईकोर्ट में क्लेयरमोंट बिल्डिंग विवाद मामले में अब 27 अक्तूबर को सुनवाई होगी। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत इस मामले की सुनवाई कर रही है। शिमला स्थित क्लेयरमोंट बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर अधिकार को लेकर हिमाचल और केंद्र सरकार के शहरी विकास मंत्रालय के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है। राज्य का शिक्षा विभाग 6 दशकों (1965 से) से इस परिसर में कार्यरत है। लोक परिसर (अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 की धारा 5(1) के तहत संपदा अधिकारी ने 2 अगस्त 2023 को प्रारंभिक शिक्षा उपनिदेशक कार्यालय को यह परिसर खाली करने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ राज्य की अपील 28 मई 2024 को सीबीआई कोर्ट (अतिरिक्त जिला न्यायाधीश) शिमला की ओर से खारिज होने के बाद केंद्रीय एजेंसियों ने भवन को सील कर दिया था।
इस सीलिंग कार्रवाई को चुनौती देते हुए प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट में 2024 में याचिका दायर की। जनहित और विभागीय कामकाज को देखते हुए अदालत ने अंतरिम आदेश में निर्देश दिया कि सील किए गए परिसर का कब्जा बिना किसी देरी के राज्य सरकार को लौटाया जाए। अदालत ने शहरी विकास मंत्रालय को निर्देश दिए थे कि शिमला स्थित इस ऐतिहासिक भवन के ग्राउंड फ्लोर की सील को तुरंत हटाकर इसका कब्जा राज्य के शिक्षा विभाग को सौंपा जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद को बातचीत के जरिये सुलझाने के लिए उच्चस्तरीय समिति के गठन का भी निर्देश दिया था। सरकार ने अदालत में दलील दी थी कि सीलिंग के कारण शिक्षा विभाग का कार्य पूरी तरह ठप पड़ गया है। दफ्तर सील होने से यहां कार्यरत 31 सरकारी कर्मचारी सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। शिमला जिले के लगभग 155 प्राइमरी, 260 मिडिल और 407 सीनियर सेकेंडरी/हाई स्कूलों के महत्वपूर्ण आधिकारिक दस्तावेज सील परिसर के भीतर बंद हैं।