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Guru Purnima 2026: महर्षि वेदव्यास को समर्पित ज्ञान और गुरु-परंपरा का महापर्व

Mon, 27 Jul 2026 05:29 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Mon, 27 Jul 2026 05:29 PM IST
सार

Guru Purnima 2026: हिंदू धर्म में गुरु पूर्णिमा के पर्व का विशेष महत्व होता है। यह दिन महर्षि वेदव्यास के जन्मोत्सव के रूप में भी प्रसिद्ध है, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा कहा जाता है।

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Guru Purnima 2026 Date Significance in Hindi Guru Purnima Kab Hai
गुरु पूर्णिमा 2026 - फोटो : AI

विस्तार

Guru Purnima 2026: भारतीय संस्कृति में गुरु को सर्वोच्च स्थान दिया गया है और उनके बिना ज्ञान की प्राप्ति असंभव मानी गई है। वेदों और शास्त्रों में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का स्वरूप बताया गया है। कहा गया है “गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः। गुरु साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः॥” अर्थात गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही भगवान शंकर हैं तथा गुरु ही साक्षात परब्रह्म स्वरूप हैं। ऐसे गुरु को बार-बार प्रणाम है।
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गुरु पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
इसी महान गुरु-परंपरा के सम्मान में प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा केवल शैक्षिक ज्ञान देने वाले शिक्षकों के सम्मान का दिन नहीं है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में मार्गदर्शन करने वाले उन सभी गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है, जो व्यक्ति को अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाते हैं। इस दिन अनेक श्रद्धालु अपने गुरु का पूजन करते हैं, उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं तथा गुरु मंत्र ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि गुरु मंत्र का नियमित जाप व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति और आत्मबल में वृद्धि करता है।
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व्यास पूर्णिमा के रूप में गुरु पूर्णिमा
यह दिन महर्षि वेदव्यास के जन्मोत्सव के रूप में भी प्रसिद्ध है, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा कहा जाता है। महर्षि वेदव्यास को भगवान विष्णु का अंशावतार माना गया है। इन्होंने मनुष्य जाति को चारों वेदों का ज्ञान दिया था, इसीलिए इन्हें जगत का प्रथम गुरु भी माना जाता है।
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कौन थे महर्षि वेदव्यास?
पुराणों के अनुसार महर्षि वेदव्यास का जन्म महर्षि पराशर और माता सत्यवती के पुत्र के रूप में हुआ था। मान्यता है कि उनका जन्म यमुना नदी के मध्य स्थित एक द्वीप पर हुआ था, इसलिए उन्हें द्वैपायन कहा गया। उनका वर्ण श्याम था, इसलिए उनका एक प्रसिद्ध नाम कृष्ण द्वैपायन भी है।

वेदों का विभाजन और महान साहित्यिक योगदान
सनातन परंपरा के अनुसार प्रारंभ में वेद एक ही थे। कलियुग में मनुष्यों की स्मरण शक्ति और अध्ययन क्षमता को ध्यान में रखते हुए महर्षि वेदव्यास ने वेदों को चार भागों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—में विभाजित किया। इसी महान कार्य के कारण उन्हें वेदव्यास की उपाधि प्राप्त हुई। वेदों के इस सुव्यवस्थित विभाजन से वैदिक ज्ञान जनसामान्य तक पहुंच सका। इसके अतिरिक्त भगवान गणेश की सहायता से उन्होंने महाभारत जैसे महान ग्रंथ की रचना कराई तथा अठारह महापुराणों के संकलन और व्यवस्था का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।

गुरु पूर्णिमा क्यों कहलाती है व्यास पूर्णिमा?
धार्मिक परंपराओं के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही महर्षि वेदव्यास का अवतरण हुआ था। उनके अतुलनीय ज्ञान, साहित्यिक योगदान, वेदों के विभाजन, पुराणों के संकलन तथा गुरु-परंपरा को सुदृढ़ आधार प्रदान करने में निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका के कारण यह तिथि व्यास पूर्णिमा के नाम से प्रसिद्ध हुई। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में वेदव्यास को आदर्श गुरु, महान ऋषि और ज्ञान के अमर स्रोत के रूप में स्मरण किया जाता है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
 
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