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सोमनाथ ज्योतिर्लिंग: आस्था, इतिहास और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Sun, 11 Jan 2026 05:08 PM IST
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सार
सभी 12 ज्योतिर्लिंगों में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को प्रथम माना गया है। मान्यता है कि यहां पर विधि-विधान से रुद्राभिषेक करने से मानसिक शांति, रोगों से मुक्ति और जीवन की बाधाओं का नाश होता है।
धार्मिक ग्रंथों में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का विशेष महत्व बताया गया है।
- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
भारत की पावन भूमि पर स्थित बारह ज्योतिर्लिंगों में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को प्रथम स्थान प्राप्त है। यह गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में प्रभास पाटन के समीप, अरब सागर के तट पर स्थित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जहां स्वयं भगवान शिव ज्योति स्वरूप में प्रकट हुए हों, वही स्थान ज्योतिर्लिंग कहलाता है। सोमनाथ न केवल भगवान शिव की असीम कृपा का प्रतीक है, बल्कि यह सनातन धर्म की अखंड आस्था और पुनर्जन्म की भावना को भी दर्शाता है।
सोमनाथ की पौराणिक कथा
शास्त्रों के अनुसार “सोमनाथ” शब्द का अर्थ है—सोम के स्वामी। पौराणिक मान्यता के अनुसार चंद्रदेव (सोम) को दक्ष प्रजापति के श्राप के कारण क्षय रोग हो गया था। इस रोग से मुक्ति पाने के लिए चंद्रदेव ने प्रभास क्षेत्र में भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें रोगमुक्त किया और इसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग रूप में स्थापित हुए। तभी से भगवान शिव यहां “सोमनाथ” के नाम से पूजित हैं। यह कथा शिव की करुणा और भक्तवत्सलता को दर्शाती है।
धार्मिक महत्व और मान्यताएं
धार्मिक ग्रंथों में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का विशेष महत्व बताया गया है। शिवपुराण के अनुसार सोमनाथ के दर्शन मात्र से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। मान्यता है कि यहां विधिपूर्वक रुद्राभिषेक करने से मानसिक शांति, रोगों से मुक्ति और जीवन की बाधाओं का नाश होता है। विशेष रूप से सोमवार, महाशिवरात्रि और सावन मास में यहां पूजा-अर्चना का अत्यंत फलदायी महत्व माना गया है।
सोमनाथ मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि यह त्रिवेणी संगम क्षेत्र के समीप स्थित है, जहां हिरण, कपिला और सरस्वती नदियों का संगम माना जाता है। समुद्र की लहरों के बीच स्थित यह मंदिर साधक को आत्मचिंतन और वैराग्य की अनुभूति कराता है। मान्यता है कि यहां शिवलिंग के दर्शन से मन की चंचलता शांत होती है और साधक शिवत्व की अनुभूति करता है।
संघर्ष और पुनर्निर्माण का प्रतीक
सोमनाथ मंदिर का इतिहास अनेक विध्वंसों और पुनर्निर्माणों का साक्षी रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह मंदिर जितनी बार ध्वस्त हुआ, उतनी ही बार पुनः भव्य रूप में स्थापित हुआ। यह तथ्य सनातन धर्म की अविनाशी शक्ति और आस्था की दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है। सोमनाथ यह संदेश देता है कि सत्य और श्रद्धा को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता।
आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र
आज भी श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग में अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा विद्यमान है। यहां किया गया जप, तप और दान कई गुना फल देता है। सोमनाथ न केवल एक तीर्थ स्थल है, बल्कि यह भगवान शिव की अनुकंपा, करुणा और संरक्षण का जीवंत प्रतीक है। इसलिए सोमनाथ ज्योतिर्लिंग हर शिवभक्त के लिए आस्था का सर्वोच्च केंद्र माना जाता है।
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सोमनाथ की पौराणिक कथा
शास्त्रों के अनुसार “सोमनाथ” शब्द का अर्थ है—सोम के स्वामी। पौराणिक मान्यता के अनुसार चंद्रदेव (सोम) को दक्ष प्रजापति के श्राप के कारण क्षय रोग हो गया था। इस रोग से मुक्ति पाने के लिए चंद्रदेव ने प्रभास क्षेत्र में भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें रोगमुक्त किया और इसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग रूप में स्थापित हुए। तभी से भगवान शिव यहां “सोमनाथ” के नाम से पूजित हैं। यह कथा शिव की करुणा और भक्तवत्सलता को दर्शाती है।
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धार्मिक महत्व और मान्यताएं
धार्मिक ग्रंथों में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का विशेष महत्व बताया गया है। शिवपुराण के अनुसार सोमनाथ के दर्शन मात्र से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। मान्यता है कि यहां विधिपूर्वक रुद्राभिषेक करने से मानसिक शांति, रोगों से मुक्ति और जीवन की बाधाओं का नाश होता है। विशेष रूप से सोमवार, महाशिवरात्रि और सावन मास में यहां पूजा-अर्चना का अत्यंत फलदायी महत्व माना गया है।
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समुद्र तट पर स्थित दिव्य स्थलसोमनाथ मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि यह त्रिवेणी संगम क्षेत्र के समीप स्थित है, जहां हिरण, कपिला और सरस्वती नदियों का संगम माना जाता है। समुद्र की लहरों के बीच स्थित यह मंदिर साधक को आत्मचिंतन और वैराग्य की अनुभूति कराता है। मान्यता है कि यहां शिवलिंग के दर्शन से मन की चंचलता शांत होती है और साधक शिवत्व की अनुभूति करता है।
संघर्ष और पुनर्निर्माण का प्रतीक
सोमनाथ मंदिर का इतिहास अनेक विध्वंसों और पुनर्निर्माणों का साक्षी रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह मंदिर जितनी बार ध्वस्त हुआ, उतनी ही बार पुनः भव्य रूप में स्थापित हुआ। यह तथ्य सनातन धर्म की अविनाशी शक्ति और आस्था की दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है। सोमनाथ यह संदेश देता है कि सत्य और श्रद्धा को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता।
आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र
आज भी श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग में अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा विद्यमान है। यहां किया गया जप, तप और दान कई गुना फल देता है। सोमनाथ न केवल एक तीर्थ स्थल है, बल्कि यह भगवान शिव की अनुकंपा, करुणा और संरक्षण का जीवंत प्रतीक है। इसलिए सोमनाथ ज्योतिर्लिंग हर शिवभक्त के लिए आस्था का सर्वोच्च केंद्र माना जाता है।