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नीरू की कहानी खास है: गांव में टिन के डिब्बों पर लगाती थीं निशाना, अब एशिया पर कर रहीं राज; ये सफर दिल छू लेगा
Tue, 29 Sep 2026 12:18 PM IST
स्वप्निल शशांक
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, आइची नागोया
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, आइची नागोया
Published by: स्वप्निल शशांक
Updated Tue, 29 Sep 2026 12:18 PM IST
सार
हरियाणा के जींद की नीरू ढांडा ने कभी खाली टिन के डिब्बों पर निशाना साधकर शूटिंग का अभ्यास शुरू किया था। 2018 में लक्ष्य तय करने वाली नीरू ने 2025 में एशियाई चैंपियनशिप का स्वर्ण जीता और 2026 में विश्व कप में इतिहास रचा। अब आइची-नागोया में 28/30 के स्कोर के साथ उन्होंने भारत को एशियाड का पहला व्यक्तिगत स्वर्ण दिलाया।
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नीरू
- फोटो : PTI
विस्तार
कभी हरियाणा के जींद में एक लड़की घर की डबल बैरल बंदूक से खाली टिन के डिब्बों पर निशाना साधती थी। तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही लड़की एक दिन एशिया के सबसे बड़े खेल मंच पर 30 में से 28 निशाने लगाकर इतिहास रचेगी। नीरू ढांडा ने आइची-नागोया एशियन गेम्स में सिर्फ स्वर्ण पदक नहीं जीता, बल्कि भारतीय शूटिंग के इतिहास में अपना नाम हमेशा के लिए दर्ज करा दिया।
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25 मई 2000 को हरियाणा के जींद जिले में जन्मी नीरू का परिवार खेती से जुड़ा था। शूटिंग ऐसा खेल है जिसमें महंगे उपकरण, कारतूस और अभ्यास के लिए शूटिंग रेंज की जरूरत होती है। ऐसे में शुरुआत से ही इस खेल को अपनाना आसान नहीं था, लेकिन नीरू के लिए मुश्किलों ने रास्ता नहीं रोका। साल 2018 में उन्होंने अपने ममेरे भाई लक्ष्य श्योराण को जकार्ता एशियन गेम्स में पुरुष ट्रैप स्पर्धा का रजत पदक जीतते देखा। उसी पल नीरू के मन में भी इसी खेल में आगे बढ़ने का सपना पैदा हुआ।
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प्रोफेशनल शूटिंग रेंज तक तुरंत पहुंच नहीं थी, इसलिए शुरुआती अभ्यास का तरीका भी बिल्कुल अलग था। नीरू गांव के माहौल में परिवार की डबल बैरल बंदूक से खाली टिन के डिब्बों पर निशाना साधकर अपनी आंख और हाथ का तालमेल बेहतर करती थीं। उनकी प्रतिभा और एकाग्रता को भाई लक्ष और लक्ष्य श्योराण ने पहचाना। दोनों ने नीरू का साथ दिया और उन्हें प्रतिस्पर्धी शूटिंग की बारीकियां सीखने में मदद की।
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नीरू ढांडा
- फोटो : IANS
जींद से भोपाल तक, फिर सेना में मिली नई पहचान
शूटिंग की शुरुआती नींव मजबूत होने के बाद नीरू भोपाल पहुंचीं। उन्होंने मध्य प्रदेश राज्य शूटिंग अकादमी के कठिन ओपन चयन ट्रायल को पार किया और करीब पांच साल तक वहां अपनी तकनीक को निखारा। इसके बाद उनके करियर में एक बड़ा मोड़ आया। भारतीय सेना में महिलाओं के लिए सैनिक स्तर पर भर्ती के अवसर खुले तो नीरू ने इसे भी अपने सफर का हिस्सा बनाया। वह कोर ऑफ मिलिट्री पुलिस में शामिल हुईं और बाद में नायब सूबेदार के पद तक पहुंचीं। सेना में आने के बाद उन्हें मध्य प्रदेश के महू स्थित आर्मी मार्क्समैनशिप यूनिट में प्रशिक्षण का मौका मिला। शूटिंग की तकनीक के साथ सैन्य अनुशासन ने उनके खेल को और मजबूत किया।
मेहनत रंग लाई, एक के बाद एक पदक आने लगे
नीरू ने घरेलू स्तर पर लगातार शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स, नेशनल गेम्स और राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीते। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी पहचान तेजी से बनी। 2025 में कजाकिस्तान के शिमकेंट में आयोजित एशियन शूटिंग चैंपियनशिप में नीरू ने व्यक्तिगत और टीम दोनों स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीता। यह उनके करियर में एक बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन नीरू अभी रुकने वाली नहीं थीं।
शूटिंग की शुरुआती नींव मजबूत होने के बाद नीरू भोपाल पहुंचीं। उन्होंने मध्य प्रदेश राज्य शूटिंग अकादमी के कठिन ओपन चयन ट्रायल को पार किया और करीब पांच साल तक वहां अपनी तकनीक को निखारा। इसके बाद उनके करियर में एक बड़ा मोड़ आया। भारतीय सेना में महिलाओं के लिए सैनिक स्तर पर भर्ती के अवसर खुले तो नीरू ने इसे भी अपने सफर का हिस्सा बनाया। वह कोर ऑफ मिलिट्री पुलिस में शामिल हुईं और बाद में नायब सूबेदार के पद तक पहुंचीं। सेना में आने के बाद उन्हें मध्य प्रदेश के महू स्थित आर्मी मार्क्समैनशिप यूनिट में प्रशिक्षण का मौका मिला। शूटिंग की तकनीक के साथ सैन्य अनुशासन ने उनके खेल को और मजबूत किया।
मेहनत रंग लाई, एक के बाद एक पदक आने लगे
नीरू ने घरेलू स्तर पर लगातार शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स, नेशनल गेम्स और राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीते। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी पहचान तेजी से बनी। 2025 में कजाकिस्तान के शिमकेंट में आयोजित एशियन शूटिंग चैंपियनशिप में नीरू ने व्यक्तिगत और टीम दोनों स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीता। यह उनके करियर में एक बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन नीरू अभी रुकने वाली नहीं थीं।
नीरू ढांडा
- फोटो : IANS
लोनाटो में रचा इतिहास, बनीं विश्व कप चैंपियन
जुलाई 2026 में इटली के लोनाटो में नीरू ने अपने करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक हासिल की। आईएसएसएफ विश्व कप की महिला ट्रैप स्पर्धा के क्वालिफिकेशन में उन्होंने 125 में से 121 निशाने साधे। फाइनल में भी उन्होंने दबाव के बीच शानदार प्रदर्शन किया और स्वर्ण पदक जीत लिया। इस जीत के साथ नीरू व्यक्तिगत ट्रैप स्पर्धा में आईएसएसएफ शॉटगन विश्व कप स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। अब उनकी नजर आइची-नागोया एशियन गेम्स पर थी।
जुलाई 2026 में इटली के लोनाटो में नीरू ने अपने करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक हासिल की। आईएसएसएफ विश्व कप की महिला ट्रैप स्पर्धा के क्वालिफिकेशन में उन्होंने 125 में से 121 निशाने साधे। फाइनल में भी उन्होंने दबाव के बीच शानदार प्रदर्शन किया और स्वर्ण पदक जीत लिया। इस जीत के साथ नीरू व्यक्तिगत ट्रैप स्पर्धा में आईएसएसएफ शॉटगन विश्व कप स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। अब उनकी नजर आइची-नागोया एशियन गेम्स पर थी।
नीरू
- फोटो : PTI
एक ही दिन दो पदक, पहले टीम में रजत
एशियन गेम्स 2026 में नीरू ने एक ही दिन भारत के लिए दो बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं। महिला ट्रैप टीम स्पर्धा में नीरू ने आशिमा अहलावत और मनीषा कीर के साथ मिलकर भारत को रजत पदक दिलाया। भारत चीन के बाद दूसरे स्थान पर रहा, लेकिन नीरू के दिन की सबसे बड़ी कहानी अभी बाकी थी।
118 निशाने, शूट-ऑफ में जीत और फिर इतिहास
महिला ट्रैप की व्यक्तिगत क्वालिफिकेशन में नीरू ने 125 में से 118 निशाने साधे। वह कतर की रे बासिल के साथ संयुक्त रूप से शीर्ष पर रहीं। फाइनल में जगह बनाने के लिए शूट-ऑफ हुआ। यहां नीरू ने दबाव के बीच शानदार प्रदर्शन किया और आठ निशानेबाजों वाले फाइनल में नंबर एक स्थान के साथ प्रवेश किया। अब उनके सामने सिर्फ 30 निशाने थे और इतिहास उनके इंतजार में था।
एशियन गेम्स 2026 में नीरू ने एक ही दिन भारत के लिए दो बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं। महिला ट्रैप टीम स्पर्धा में नीरू ने आशिमा अहलावत और मनीषा कीर के साथ मिलकर भारत को रजत पदक दिलाया। भारत चीन के बाद दूसरे स्थान पर रहा, लेकिन नीरू के दिन की सबसे बड़ी कहानी अभी बाकी थी।
118 निशाने, शूट-ऑफ में जीत और फिर इतिहास
महिला ट्रैप की व्यक्तिगत क्वालिफिकेशन में नीरू ने 125 में से 118 निशाने साधे। वह कतर की रे बासिल के साथ संयुक्त रूप से शीर्ष पर रहीं। फाइनल में जगह बनाने के लिए शूट-ऑफ हुआ। यहां नीरू ने दबाव के बीच शानदार प्रदर्शन किया और आठ निशानेबाजों वाले फाइनल में नंबर एक स्थान के साथ प्रवेश किया। अब उनके सामने सिर्फ 30 निशाने थे और इतिहास उनके इंतजार में था।
30 में 28 निशाने, भारत के नाम पहला व्यक्तिगत स्वर्ण
फाइनल में नीरू ने सिर्फ दो निशाने गंवाए। उन्होंने 30 में से 28 निशाने साधे और स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। चीन की सुन युनोंग ने 26 निशाने साधकर रजत पदक जीता। नीरू का 28 का स्कोर एशियाई रिकॉर्ड भी बन गया। इससे पहले यह रिकॉर्ड 24 का था। यानी जिस लड़की ने कभी गांव में खाली टिन के डिब्बों पर निशाना साधकर अपने हाथ को साधा था, उसी नीरू ने अब एशिया के सबसे बड़े खेल मंच पर 30 में से 28 निशाने साधकर इतिहास लिख दिया। नीरू का यह इस एशियाड में दूसरा पदक रहा। व्यक्तिगत स्पर्धा से पहले उन्होंने महिला ट्रैप टीम इवेंट में आशिमा और मनीषा के साथ रजत जीता था।
36 साल का इंतजार खत्म, पहली बार मिला व्यक्तिगत स्वर्ण
नीरू का स्वर्ण सिर्फ उनका व्यक्तिगत पदक नहीं था। यह भारतीय शूटिंग के लिए भी ऐतिहासिक उपलब्धि है। एशियन गेम्स में महिला ट्रैप स्पर्धा 1990 से खेली जा रही है, लेकिन भारत इस स्पर्धा में अब तक पदक नहीं जीत सका था। 2026 में 36 साल का इंतजार खत्म हुआ और भारत को पहली बार इस स्पर्धा में पदक मिला। और जब पदक आया तो वह कांस्य या रजत नहीं, बल्कि स्वर्ण था। नीरू आइची-नागोया एशियन गेम्स में भारत के लिए व्यक्तिगत स्वर्ण जीतने वाली पहली खिलाड़ी भी बनीं। भारत के पिछले स्वर्ण पदक टीम स्पर्धाओं में आए थे, महिला क्रिकेट, पुरुष कबड्डी, महिला कबड्डी और मिश्रित 10 मीटर एयर पिस्टल टीम। नीरू ने व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत का स्वर्ण खाता खोला।
फाइनल में नीरू ने सिर्फ दो निशाने गंवाए। उन्होंने 30 में से 28 निशाने साधे और स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। चीन की सुन युनोंग ने 26 निशाने साधकर रजत पदक जीता। नीरू का 28 का स्कोर एशियाई रिकॉर्ड भी बन गया। इससे पहले यह रिकॉर्ड 24 का था। यानी जिस लड़की ने कभी गांव में खाली टिन के डिब्बों पर निशाना साधकर अपने हाथ को साधा था, उसी नीरू ने अब एशिया के सबसे बड़े खेल मंच पर 30 में से 28 निशाने साधकर इतिहास लिख दिया। नीरू का यह इस एशियाड में दूसरा पदक रहा। व्यक्तिगत स्पर्धा से पहले उन्होंने महिला ट्रैप टीम इवेंट में आशिमा और मनीषा के साथ रजत जीता था।
36 साल का इंतजार खत्म, पहली बार मिला व्यक्तिगत स्वर्ण
नीरू का स्वर्ण सिर्फ उनका व्यक्तिगत पदक नहीं था। यह भारतीय शूटिंग के लिए भी ऐतिहासिक उपलब्धि है। एशियन गेम्स में महिला ट्रैप स्पर्धा 1990 से खेली जा रही है, लेकिन भारत इस स्पर्धा में अब तक पदक नहीं जीत सका था। 2026 में 36 साल का इंतजार खत्म हुआ और भारत को पहली बार इस स्पर्धा में पदक मिला। और जब पदक आया तो वह कांस्य या रजत नहीं, बल्कि स्वर्ण था। नीरू आइची-नागोया एशियन गेम्स में भारत के लिए व्यक्तिगत स्वर्ण जीतने वाली पहली खिलाड़ी भी बनीं। भारत के पिछले स्वर्ण पदक टीम स्पर्धाओं में आए थे, महिला क्रिकेट, पुरुष कबड्डी, महिला कबड्डी और मिश्रित 10 मीटर एयर पिस्टल टीम। नीरू ने व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत का स्वर्ण खाता खोला।
मनीषा, नीरू, आशमिा
- फोटो : Twitter
टिन के डिब्बों से एशिया के सबसे बड़े मंच तक
नीरू की कहानी सिर्फ एक पदक की कहानी नहीं है। यह उस लड़की की कहानी है जिसने महंगे शूटिंग उपकरणों और आधुनिक रेंज के बिना अपने सफर की शुरुआत की। जिसने गांव में खाली टिन के डिब्बों को अपना पहला निशाना बनाया। जिसने परिवार के सहयोग से आगे कदम बढ़ाया, भोपाल की अकादमी में वर्षों मेहनत की, सेना में शामिल हुई और फिर दुनिया की बेहतरीन निशानेबाजों के बीच अपनी पहचान बनाई। 2018 में लक्ष्य श्योराण को एशियन गेम्स में पदक जीतते देखकर जिस नीरू ने अपने लिए सपना देखा था, 2026 में उसी मंच पर उन्होंने खुद इतिहास रच दिया। टिन के डिब्बे बदल गए, निशाना वही रहा। फर्क सिर्फ इतना है कि अब निशाने के सामने एशिया का स्वर्ण था।
नीरू की कहानी सिर्फ एक पदक की कहानी नहीं है। यह उस लड़की की कहानी है जिसने महंगे शूटिंग उपकरणों और आधुनिक रेंज के बिना अपने सफर की शुरुआत की। जिसने गांव में खाली टिन के डिब्बों को अपना पहला निशाना बनाया। जिसने परिवार के सहयोग से आगे कदम बढ़ाया, भोपाल की अकादमी में वर्षों मेहनत की, सेना में शामिल हुई और फिर दुनिया की बेहतरीन निशानेबाजों के बीच अपनी पहचान बनाई। 2018 में लक्ष्य श्योराण को एशियन गेम्स में पदक जीतते देखकर जिस नीरू ने अपने लिए सपना देखा था, 2026 में उसी मंच पर उन्होंने खुद इतिहास रच दिया। टिन के डिब्बे बदल गए, निशाना वही रहा। फर्क सिर्फ इतना है कि अब निशाने के सामने एशिया का स्वर्ण था।