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Khelo India: शीतल देवी ने संशोधित खेलो इंडिया योजना की सराहना की, कहा- पैरा खेलों में ला सकती है बड़ा बदलाव
Fri, 07 Aug 2026 10:31 PM IST
मयंक त्रिपाठी
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: मयंक त्रिपाठी
Updated Fri, 07 Aug 2026 10:31 PM IST
सार
पैरालंपिक पदक विजेता शीतल देवी ने संशोधित खेलो इंडिया योजना की सराहना करते हुए कहा कि यह देश में पैरा खेलों के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है। उन्होंने दिव्यांग बच्चों की कम उम्र में प्रतिभा पहचानने, स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण सुविधाएं और विशेषज्ञ कोच उपलब्ध कराने पर जोर दिया।
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शीतल देवी
- फोटो : Instagram
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विस्तार
पैरालंपिक पदक विजेता और विश्व चैंपियन पैरा-कंपाउंड तीरंदाज शीतल देवी ने संशोधित खेलो इंडिया योजना (केआईएस) की सराहना करते हुए कहा है कि यह भारत में पैरा खेलों के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है। उन्होंने कहा कि योजना के जरिए दिव्यांग बच्चों की प्रतिभा को कम उम्र में पहचानकर उन्हें जरूरी प्रशिक्षण और सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ के एक दूरदराज गांव से निकलकर विश्व स्तर पर पहचान बनाने वाली 18 वर्षीय शीतल ने कहा कि प्रतिभा की कमी के बजाय अवसरों की कमी अक्सर पैरा खिलाड़ियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है।
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'मेरी कहानी अपवाद नहीं होनी चाहिए'
शीतल ने अपने सफर को याद करते हुए कहा कि आज उन्हें जो पहचान और सम्मान मिल रहा है, उसके पीछे वर्षों की मेहनत के साथ अच्छे कोच और सहयोग भी रहे हैं। उन्होंने कहा कि किश्तवाड़ में रहते हुए वह खुद भी एक ऐसी बच्ची थीं, जिसकी प्रतिभा दुनिया से अनजान थी। उन्होंने कहा, मेरी कहानी सफलता की है, लेकिन किसी दूरदराज गांव में मेरे जैसी क्षमता रखने वाला बच्चा शायद यह भी नहीं जानता हो कि पैरा खेल होते हैं। हमारे बीच अंतर अक्सर अवसर का होता है।'
शीतल ने कहा कि उन्हें कोच, भारतीय खेल प्राधिकरण (साइ) और सरकार सहित कई स्तरों से सहयोग मिला, जिसने उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करने का आत्मविश्वास दिया। हालांकि, उन्होंने कहा कि उनकी कहानी अपवाद नहीं होनी चाहिए।
शीतल ने अपने सफर को याद करते हुए कहा कि आज उन्हें जो पहचान और सम्मान मिल रहा है, उसके पीछे वर्षों की मेहनत के साथ अच्छे कोच और सहयोग भी रहे हैं। उन्होंने कहा कि किश्तवाड़ में रहते हुए वह खुद भी एक ऐसी बच्ची थीं, जिसकी प्रतिभा दुनिया से अनजान थी। उन्होंने कहा, मेरी कहानी सफलता की है, लेकिन किसी दूरदराज गांव में मेरे जैसी क्षमता रखने वाला बच्चा शायद यह भी नहीं जानता हो कि पैरा खेल होते हैं। हमारे बीच अंतर अक्सर अवसर का होता है।'
शीतल ने कहा कि उन्हें कोच, भारतीय खेल प्राधिकरण (साइ) और सरकार सहित कई स्तरों से सहयोग मिला, जिसने उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करने का आत्मविश्वास दिया। हालांकि, उन्होंने कहा कि उनकी कहानी अपवाद नहीं होनी चाहिए।
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पांच साल में 29,054 करोड़ रुपये का प्रावधान
शीतल ने केंद्र सरकार की संशोधित खेलो इंडिया योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके तहत पांच साल के लिए 29,054 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। योजना में प्रतिभा की खोज, कोच और सपोर्ट स्टाफ का विकास, बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और हाई-परफॉर्मेंस ट्रेनिंग वातावरण तैयार करना जैसे प्रमुख पहलू शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि इस योजना को सफल बनाने में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सक्रिय भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण होगी। उनके मुताबिक, केंद्र की योजनाओं को जमीनी स्तर पर वास्तविक नतीजों में बदलने के लिए राज्यों को पूरी तरह इसमें शामिल होना होगा।
घर के पास सुविधाएं मिलने से बढ़ेगा भरोसा
शीतल ने पैरा खेलों के लिए अकादमियों और प्रशिक्षण केंद्रों को खिलाड़ियों के घर के करीब विकसित करने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि दिव्यांग बच्चों के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर कोच या प्रशिक्षण केंद्र तलाशना आसान नहीं होता।
उन्होंने कहा, 'कई प्रतिभाशाली बच्चे गांवों में इसलिए रह जाते हैं क्योंकि सुविधाएं उनके आसपास नहीं होतीं। अगर बच्चों के रहने की जगह के पास गुणवत्तापूर्ण पैरा खेल अकादमियां और प्रशिक्षित कोच उपलब्ध हों, तो परिवार भी उन्हें खेलों में भेजने के लिए अधिक आश्वस्त महसूस करेंगे।'
शीतल ने केंद्र सरकार की संशोधित खेलो इंडिया योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके तहत पांच साल के लिए 29,054 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। योजना में प्रतिभा की खोज, कोच और सपोर्ट स्टाफ का विकास, बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और हाई-परफॉर्मेंस ट्रेनिंग वातावरण तैयार करना जैसे प्रमुख पहलू शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि इस योजना को सफल बनाने में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सक्रिय भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण होगी। उनके मुताबिक, केंद्र की योजनाओं को जमीनी स्तर पर वास्तविक नतीजों में बदलने के लिए राज्यों को पूरी तरह इसमें शामिल होना होगा।
घर के पास सुविधाएं मिलने से बढ़ेगा भरोसा
शीतल ने पैरा खेलों के लिए अकादमियों और प्रशिक्षण केंद्रों को खिलाड़ियों के घर के करीब विकसित करने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि दिव्यांग बच्चों के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर कोच या प्रशिक्षण केंद्र तलाशना आसान नहीं होता।
उन्होंने कहा, 'कई प्रतिभाशाली बच्चे गांवों में इसलिए रह जाते हैं क्योंकि सुविधाएं उनके आसपास नहीं होतीं। अगर बच्चों के रहने की जगह के पास गुणवत्तापूर्ण पैरा खेल अकादमियां और प्रशिक्षित कोच उपलब्ध हों, तो परिवार भी उन्हें खेलों में भेजने के लिए अधिक आश्वस्त महसूस करेंगे।'
कम उम्र में प्रतिभा पहचानने पर जोर
शीतल ने कहा कि बड़ी संख्या में पैरा खेलो इंडिया एथलीट्स तैयार करने और इमर्जिंग खेलो इंडिया एथलीट्स की शुरुआत से प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को शुरुआती स्तर पर ही पहचानने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि पैरा खिलाड़ियों के लिए प्रतिभा की शुरुआती पहचान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। कई दिव्यांग बच्चे प्रतिभा की कमी के कारण नहीं, बल्कि जागरूकता, कोचिंग और अवसर के अभाव में खेलों से देर से जुड़ते हैं। शीतल ने कहा, 'अगर हम उन्हें कम उम्र में पहचानकर लगातार सहयोग दें, तो उनके खेल करियर की दिशा बदल सकते हैं, इससे पहले कि वे खुद पर संदेह करना शुरू करें।'
पैरा खेलों के लिए विशेषज्ञ कोचिंग जरूरी
पैरालंपिक पदक विजेता ने पैरा खेलों के लिए विशेष प्रशिक्षण व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित कोच उपलब्ध कराने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि किसी बच्चे को सिर्फ ऐसा कोच खोजने के लिए अपना घर छोड़ने की जरूरत नहीं होनी चाहिए, जो पैरा खेलों को समझता हो। उन्होंने संशोधित योजना में पैरा खेलों के लिए विशेष अकादमियों और केंद्रों पर ध्यान दिए जाने को महत्वपूर्ण बताया।
ज्यादा प्रतियोगिताओं से बढ़ेगा आत्मविश्वास
शीतल ने खेलो इंडिया पैरा गेम्स के विस्तार का भी स्वागत किया। उन्होंने खुद इन खेलों में तीरंदाजी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया है। उनका कहना है कि नियमित प्रतियोगिताएं खिलाड़ियों के विकास के लिए बेहद जरूरी हैं, क्योंकि हर प्रतियोगिता ऐसा अनुभव देती है जो केवल प्रशिक्षण से हासिल नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि खेलो इंडिया पैरा गेम्स के विस्तार से युवा खिलाड़ियों को ज्यादा प्रतिस्पर्धात्मक अनुभव मिलेगा और वे अपने प्रदर्शन के साथ आत्मविश्वास भी बढ़ा सकेंगे।
अंत में शीतल ने कहा कि संशोधित खेलो इंडिया योजना की सफलता का आकलन केवल भारत द्वारा जीते गए पदकों की संख्या से नहीं किया जाना चाहिए। इसके असली प्रभाव का पता तब चलेगा, जब देश के गांवों और जिलों में रहने वाले दिव्यांग बच्चे यह विश्वास करने लगें कि खेलों में उनके लिए भी जगह और आगे बढ़ने का रास्ता मौजूद है।
शीतल ने कहा कि बड़ी संख्या में पैरा खेलो इंडिया एथलीट्स तैयार करने और इमर्जिंग खेलो इंडिया एथलीट्स की शुरुआत से प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को शुरुआती स्तर पर ही पहचानने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि पैरा खिलाड़ियों के लिए प्रतिभा की शुरुआती पहचान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। कई दिव्यांग बच्चे प्रतिभा की कमी के कारण नहीं, बल्कि जागरूकता, कोचिंग और अवसर के अभाव में खेलों से देर से जुड़ते हैं। शीतल ने कहा, 'अगर हम उन्हें कम उम्र में पहचानकर लगातार सहयोग दें, तो उनके खेल करियर की दिशा बदल सकते हैं, इससे पहले कि वे खुद पर संदेह करना शुरू करें।'
पैरा खेलों के लिए विशेषज्ञ कोचिंग जरूरी
पैरालंपिक पदक विजेता ने पैरा खेलों के लिए विशेष प्रशिक्षण व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित कोच उपलब्ध कराने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि किसी बच्चे को सिर्फ ऐसा कोच खोजने के लिए अपना घर छोड़ने की जरूरत नहीं होनी चाहिए, जो पैरा खेलों को समझता हो। उन्होंने संशोधित योजना में पैरा खेलों के लिए विशेष अकादमियों और केंद्रों पर ध्यान दिए जाने को महत्वपूर्ण बताया।
ज्यादा प्रतियोगिताओं से बढ़ेगा आत्मविश्वास
शीतल ने खेलो इंडिया पैरा गेम्स के विस्तार का भी स्वागत किया। उन्होंने खुद इन खेलों में तीरंदाजी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया है। उनका कहना है कि नियमित प्रतियोगिताएं खिलाड़ियों के विकास के लिए बेहद जरूरी हैं, क्योंकि हर प्रतियोगिता ऐसा अनुभव देती है जो केवल प्रशिक्षण से हासिल नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि खेलो इंडिया पैरा गेम्स के विस्तार से युवा खिलाड़ियों को ज्यादा प्रतिस्पर्धात्मक अनुभव मिलेगा और वे अपने प्रदर्शन के साथ आत्मविश्वास भी बढ़ा सकेंगे।
अंत में शीतल ने कहा कि संशोधित खेलो इंडिया योजना की सफलता का आकलन केवल भारत द्वारा जीते गए पदकों की संख्या से नहीं किया जाना चाहिए। इसके असली प्रभाव का पता तब चलेगा, जब देश के गांवों और जिलों में रहने वाले दिव्यांग बच्चे यह विश्वास करने लगें कि खेलों में उनके लिए भी जगह और आगे बढ़ने का रास्ता मौजूद है।