UPI Kill Switch: क्या एक 'किल स्विच' बचा पाएगा आपकी मेहनत की कमाई? जानिए साइबर ठगी रोकने के नए प्रस्ताव का सच
भारत में साइबर ठगी और 'डिजिटल अरेस्ट' जैसे मामलों में तेज बढ़ोतरी को देखते हुए सरकार की एक उच्च-स्तरीय समिति ने बैंकिंग और यूपीआई एप्स में 'किल स्विच' फीचर जोड़ने का प्रस्ताव रखा है। आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में 23,800 से अधिक फ्रॉड केस दर्ज हुए, जिनमें 34,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम शामिल थी। किल स्विच को इमरजेंसी बटन की तरह माना जा रहा है, जिसे ऑन करते ही बैंक ट्रांसफर, कार्ड पेमेंट और यूपीआई लेन-देन तुरंत बंद हो जाएंगे ताकि ठगी की स्थिति में पैसा आगे न निकले।
विस्तार
भारत में साइबर ठगी और 'डिजिटल अरेस्ट' के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में 23,800 से ज्यादा धोखाधड़ी के मामले दर्ज हुए। इनमें 34,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम शामिल थी। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ठग अब ज्यादा हाई-टेक तरीके अपना रहे हैं, इसलिए बैंकिंग के पुराने सुरक्षा उपाय कई बार कम पड़ जाते हैं। इसी वजह से सरकार की एक उच्च-स्तरीय समिति ने बैंकिंग और यूपीआई एप्स में 'किल स्विच' जोड़ने का प्रस्ताव रखा है।
क्या है 'डिजिटल अरेस्ट'?
डिजिटल अरेस्ट एक ऑनलाइन धोखाधड़ी है, जिसमें धोखेबाज खुद को पुलिस, सीबीआई, या किसी सरकारी अधिकारी बताकर वीडियो कॉल या मैसेज के जरिए लोगों को डराते हैं, फर्जी वारंट दिखाते हैं और उन्हें किसी अवैध गतिविधि (जैसे ड्रग्स तस्करी, मनी लॉन्ड्रिंग) में फंसा बताते हैं। इसके बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए पैसे की मांग करते हैं, जिससे लोग डरकर या तो पैसे दे देते हैं या अपनी निजी जानकारी साझा करते हैं। यह एक साइबर क्राइम है जिसमें लोगों को मानसिक दबाव डालकर ठगा जाता है।
क्या है 'किल स्विच'?
सरकार की एक खास समिति ने इस आइडिया पर चर्चा की है। इस समिति में आरबीआई, सीबीआई, एनआईए, दिल्ली पुलिस और आईटी मंत्रालय (MeitY) जैसे बड़े संस्थान शामिल हैं। किल स्विच को आप बैंकिंग या यूपीआई एप में लगे इमरजेंसी बटन की तरह समझिए। जैसे ही कोई यूजर इसे ऑन करेगा, उसके खाते से जुड़े सभी तरह के पैसे के लेन-देन तुरंत बंद हो जाएंगे, जैसे: बैंक ट्रांसफर, डेबिट/क्रेडिट कार्ड से पेमेंट और यूपीआई भुगतान। मतलब अगर किसी को लगे कि उसके साथ ठगी हो रही है तो वह एक क्लिक में अपना अकाउंट 'फ्रीज' कर सकता है ताकि आगे पैसा न निकले। समिति ने गूगल, वाट्सएप, टेलीग्राम और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी टेक कंपनियों से भी बात की है, ताकि ऑनलाइन फ्रॉड को रोकने के उपाय मजबूत किए जा सकें।
क्या यह सच में काम करेगा?
1) जमीन पर आने वाली दिक्कतें
किल स्विच तभी मदद करेगा जब पीड़ित को समय रहते समझ आ जाए कि उसके साथ ठगी हो रही है। लेकिन 'डिजिटल अरेस्ट' जैसे मामलों में लोग डर और दबाव में आकर खुद ही पैसा भेज देते हैं। जब तक उन्हें सच्चाई समझ आती है, तब तक नुकसान हो चुका होता है। इसके अलावा ठग नए तरीके निकाल सकते हैं, जैसे लोगों को 'सुरक्षा के नाम पर' ही गलत कदम उठाने को मजबूर करना। कई बार ठगी का पैसा कुछ मिनटों में ही कई डमी खातों में बांट दिया जाता है, जिससे रोकना मुश्किल हो जाता है। ठग ओटीपी या दूसरे बहानों से लोगों को फंसाते रहेंगे।
2) डिजिटल इंश्योरेंस की जरूरत
विशेषज्ञ कहते हैं कि साइबर फ्रॉड को एक तरह की 'डिजिटल दुर्घटना' माना जाना चाहिए। जैसे सड़क हादसे में बीमा मदद करता है, वैसे ही साइबर ठगी में भी पीड़ित को सुरक्षा मिलनी चाहिए। अभी समस्या यह है कि कई बार प्राइवेट साइबर इंश्योरेंस कंपनियां यह कहकर क्लेम खारिज कर देती हैं कि ग्राहक ने लापरवाही की (जैसे ओटीपी शेयर करना)। इसलिए सुझाव है कि बैंक, बीमा कंपनियां और रेगुलेटर मिलकर 'डिजिटल पेमेंट प्रोटेक्शन फंड' जैसा सिस्टम बनाएं, ताकि पीड़ित को राहत मिल सके।
आगे क्या करना होगा?
डिजिटल फ्रॉड अब सिर्फ टेक्नोलॉजी की समस्या नहीं रह गया है, यह एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक संकट बन चुका है। 'किल स्विच' एक अच्छा कदम हो सकता है लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सिर्फ एक टूल से काम नहीं चलेगा। इसके लिए साथ-साथ यूजर के हाथ में ज्यादा कंट्रोल देने वाले फीचर्स, बैंकों की ज्यादा जवाबदेही, संदिग्ध खातों की सख्त निगरानी और साफ और मजबूत कानून/नियम जरूरी है