UN Women Report: क्या महिलाओं के लिए इंटरनेट सेफ नहीं? संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में हुआ चौंकाने वाला खुलासा
UN Women Report: एआई और डीपफेक जैसी नई तकनीकों के गलत इस्तेमाल ने महिलाओं के लिए ऑनलाइन दुनिया को बेहद असुरक्षित बना दिया है। 'UN Women' की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, इंटरनेट पर बढ़ते उत्पीड़न, फर्जी तस्वीरों और गालियों के डर से महिलाएं सोशल मीडिया और पब्लिक लाइफ से दूरी बना रही हैं। यह डिजिटल हिंसा न सिर्फ उनकी मानसिक शांति छीन रही है, बल्कि उन्हें अपनी आवाज दबाने पर भी मजबूर कर रही है। पढ़ें, कैसे तकनीक का यह खतरनाक पहलू और कानून की नाकामी समाज में महिलाओं की आजादी के लिए एक बड़ा खतरा बन गई है।
विस्तार
तकनीक ने हमारी जिंदगी को आसान तो बनाया है, लेकिन अब इसके बड़े नुकसान भी सामने आ रहे हैं। एक नई रिपोर्ट में बताया गया है कि इंटरनेट पर एआई और डीपफेक (यानी फर्जी वीडियो और फोटो) के जरिए महिलाओं को इतना परेशान किया जा रहा है कि वे अब सार्वजनिक मंचों से दूर हो रही हैं। यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र (यूएन वूमेन) और लंदन की एक यूनिवर्सिटी ने मिलकर तैयार की है। इसमें बताया गया है कि इंटरनेट पर महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा अब पहले से कहीं ज्यादा एडवांस और खतरनाक हो गई है।
रिपोर्ट में क्या सामने आया?
साल 2025 के आखिर में 119 देशों की 641 महिलाओं पर एक सर्वे किया गया। इनमें मुख्य रूप से महिला पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता शामिल थीं। रिपोर्ट के आंकड़े काफी डराने वाले हैं। सर्वे में पता चला कि 27 प्रतिशत महिलाओं को इंटरनेट पर भद्दे मैसेज और अश्लील तस्वीरें भेजी गईं। इसके अलावा, 12 प्रतिशत महिलाओं की प्राइवेट तस्वीरें बिना उनकी मर्जी के इंटरनेट पर डाल दी गईं, जबकि 6 प्रतिशत महिलाएं एआई से बनाई गई फर्जी तस्वीरों और वीडियो (डीपफेक) का शिकार हुईं।
एआई से बढ़ रहा है खतरा
इस रिसर्च से जुड़ीं प्रमुख रिसर्चर जूली पोसेटी का कहना है कि एआई की वजह से अब अपराधी आसानी से महिलाओं को अपना शिकार बना रहे हैं। यह महिलाओं के लिए ऑनलाइन दुनिया को और भी असुरक्षित बना रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि कई टेक कंपनियां सिर्फ अपना मुनाफा कमाने के लिए इंटरनेट को ऐसा बनाती हैं जिससे नफरत और गालियों को बढ़ावा मिलता है। इसका सीधा और सबसे बुरा असर महिलाओं के अधिकारों पर पड़ रहा है।
मेंटल हेल्थ पर पड़ रहा है बुरा असर
इंटरनेट पर होने वाली इस बदसलूकी का मकसद सिर्फ महिलाओं की आवाज दबाना नहीं है, बल्कि यह उनकी मानसिक शांति भी छीन रहा है। रिपोर्ट बताती है कि इस ऑनलाइन उत्पीड़न की वजह से लगभग 24 प्रतिशत महिलाएं डिप्रेशन (उदासी) और घबराहट का शिकार हो गई हैं, जबकि 13 प्रतिशत को गहरा मानसिक सदमा (PTSD) लगा है।
माहौल इतना डरावना हो गया है कि 41 प्रतिशत महिलाओं ने गालियों और ट्रोलिंग से बचने के लिए सोशल मीडिया पर कुछ भी लिखना या अपनी राय देना ही बंद कर दिया है। इस डर का असर उनके करियर पर भी पड़ा है, जहां 19 प्रतिशत महिलाओं ने अपने काम की जगह पर भी खुद को समेट लिया है।
पुलिस और कानून से भी नहीं मिलती पूरी मदद
अगर महिलाएं इस जुल्म के खिलाफ आवाज उठाती हैं, तो वहां से भी निराशा ही हाथ लगती है। सर्वे में शामिल 25 प्रतिशत महिलाओं ने पुलिस में शिकायत की और 15 प्रतिशत ने कानूनी मदद भी ली, लेकिन उन्हें अब तक इंसाफ नहीं मिल पाया है।
रिपोर्ट की को-ऑथर लिया हेलम्यूलर बताती हैं कि पुलिस अक्सर अपराधियों को पकड़ने के बजाय पीड़ित महिलाओं को ही पीछे हटने की सलाह देती है। पुलिस उनसे कहती है कि वे सोशल मीडिया छोड़ दें, विवादित मुद्दों पर चुप रहें या अपने काम से कुछ दिन की छुट्टी ले लें।
धीरे-धीरे सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों से गायब हो रही महिलाएं
इंटरनेट पर सुरक्षा न होने और एआई जैसे खतरनाक टूल्स के बढ़ते इस्तेमाल के कारण महिलाएं धीरे-धीरे सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों से गायब हो रही हैं। महिलाओं का इस तरह डर कर पीछे हटना सिर्फ उनके हक छिनने जैसा नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज और बराबरी वाले भविष्य के लिए भी एक बहुत बड़ा खतरा है।
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