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जॉन टर्नस: इंजीनियर के रूप में शुरू की एपल में नौकरी, 25 साल यहीं डटे; कैसे बने सीईओ?
Tue, 01 Sep 2026 08:46 AM IST
निर्मल कांत
एजेंसी, क्यूपर्टिनो।
एजेंसी, क्यूपर्टिनो।
Published by: निर्मल कांत
Updated Tue, 01 Sep 2026 08:46 AM IST
सार
जॉन टर्नस ने 2001 में इंजीनियर के तौर पर एपल से करिअर शुरू किया और करीब 25 साल तक कंपनी में रहते हुए आईफोन, आईपैड, एयरपॉड्स और मैक जैसे उत्पादों पर काम किया। अब लगातार प्रमोशन और नेतृत्व के अनुभव के बाद वे 1 सितंबर 2026 से एपल के सीईओ की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
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जॉन टर्नस
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार
आज के दौर में कॅरिअर सलाह का सबसे लोकप्रिय मंत्र है - आगे बढ़ना है तो कंपनी बदलो। लेकिन एपल के नए सीईओ जॉन टर्नस की कहानी इस धारणा को चुनौती देती है। 2001 में युवा इंजीनियर के रूप में एपल में शामिल हुए टर्नस ने करीब ढाई दशक तक उसी कंपनी में काम किया। अब वे दुनिया की सबसे मूल्यवान टेक कंपनियों में से एक की कमान संभालने जा रहे हैं।
उनका सफर बताता है कि कॅरिअर में सफलता केवल बार-बार नौकरी बदलने से नहीं, बल्कि लगातार सीखने, भरोसा बनाने और संगठन के भीतर खुद को साबित करने से भी मिल सकती है। नए सीईओ का सफर यह साबित करता है कि जीवन में ऊंचाई पाने के लिए केवल तेज दौड़ना जरूरी नहीं, बल्कि लंबे समय तक टिके रहकर लगातार बेहतर बनना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने साबित किया कि मंजिलें शॉर्टकट से नहीं, बल्कि धैर्य, समर्पण और लगातार सीखने से हासिल होती हैं।
आई-पॉड से आईफोन तक
पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद जॉन टर्नस 2001 में एपल से जुड़े। उस समय कंपनी आई-पॉड युग की शुरुआत कर रही थी। स्मार्टफोन क्रांति अभी दूर थी। टर्नस ने शुरुआती वर्षों में उत्पाद डिजाइन और हार्डवेयर इंजीनियरिंग से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम किया। धीरे-धीरे उन्होंने आईफोन, आईपैड, एयरपॉड्स और मैक जैसे एपल के सबसे सफल उत्पादों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कंपनी के भीतर उनकी पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनी, जो तकनीक की गहरी समझ के साथ टीमों को साथ लेकर चल सकता था।
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हर प्रमोशन के पीछे वर्षों की मेहनत
टर्नस का कॅरिअर रातोंरात नहीं बना। उन्होंने एपल के विभिन्न इंजीनियरिंग और प्रोडक्ट डेवलपमेंट विभागों में काम करते हुए खुद को साबित किया। 2021 में उन्हें हार्डवेयर इंजीनियरिंग का सीनियर वाइस प्रेसिडेंट बनाया गया, जहां वे एपल के लगभग सभी प्रमुख डिवाइसों के विकास की जिम्मेदारी संभालने लगे। टिम कुक के बाद सीईओ पद के लिए उनका नाम वर्षों से संभावित उम्मीदवारों में शामिल था। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्हें 25 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा
संघर्ष केवल तकनीकी नहीं, भरोसे का भी था : एपल जैसी कंपनी में सबसे बड़ी चुनौती केवल बेहतर उत्पाद बनाना नहीं, बल्कि लाखों ग्राहकों और हजारों कर्मचारियों के भरोसे को बनाए रखना है। टर्नस ने अपना पूरा कॅरिअर ऐसे माहौल में बिताया, जहां हर उत्पाद लॉन्च वैश्विक सुर्खियां बनता है और छोटी-सी गलती भी अरबों डॉलर का असर डाल सकती है। इस दौरान उन्होंने कई तकनीकी बदलाव, बाजार की चुनौतियां और प्रतिस्पर्धा के दौर देखे। लेकिन उन्होंने कंपनी के भीतर लगातार अपनी विश्वसनीयता और नेतृत्व क्षमता को मजबूत किया।
ये भी पढ़ें: 1 सितंबर 2026: रसोई, हवाई सफर और बैंकिंग से जुड़े 10 बड़े नियम बदल रहे, क्या जेब पर पड़ने वाला है चौतरफा
टेक दुनिया का नया ट्रेंड
टर्नस अकेले सीईओ नहीं हैं जिन्होंने अपना अधिकांश समय एक ही कंपनी में बिताया हो। माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला ने 1992 में जॉइन किया और 22 साल बाद शीर्ष पद पर पहुंचे। अमेजन के सीईओ एंडी जैसी को भी दो दशक लगे। ये उदाहरण बताते हैं कि बड़ी कंपनियां शीर्ष पद के लिए भरोसेमंद लोगों पर दांव लगाती हैं।
कॅरिअर का बड़ा सबक
जॉन टर्नस की कहानी युवा पेशेवरों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। बेहतर अवसरों के लिए नौकरी बदलना गलत नहीं है, लेकिन हर सफलता का रास्ता बार-बार कंपनी बदलकर नहीं गुजरता। कई बार सबसे बड़ी छलांग उसी संगठन के भीतर मिलती है, जहां वर्षों की मेहनत, भरोसा व अनुभव एक साथ जमा होते हैं।
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उनका सफर बताता है कि कॅरिअर में सफलता केवल बार-बार नौकरी बदलने से नहीं, बल्कि लगातार सीखने, भरोसा बनाने और संगठन के भीतर खुद को साबित करने से भी मिल सकती है। नए सीईओ का सफर यह साबित करता है कि जीवन में ऊंचाई पाने के लिए केवल तेज दौड़ना जरूरी नहीं, बल्कि लंबे समय तक टिके रहकर लगातार बेहतर बनना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने साबित किया कि मंजिलें शॉर्टकट से नहीं, बल्कि धैर्य, समर्पण और लगातार सीखने से हासिल होती हैं।
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आई-पॉड से आईफोन तक
पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद जॉन टर्नस 2001 में एपल से जुड़े। उस समय कंपनी आई-पॉड युग की शुरुआत कर रही थी। स्मार्टफोन क्रांति अभी दूर थी। टर्नस ने शुरुआती वर्षों में उत्पाद डिजाइन और हार्डवेयर इंजीनियरिंग से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम किया। धीरे-धीरे उन्होंने आईफोन, आईपैड, एयरपॉड्स और मैक जैसे एपल के सबसे सफल उत्पादों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कंपनी के भीतर उनकी पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनी, जो तकनीक की गहरी समझ के साथ टीमों को साथ लेकर चल सकता था।
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हर प्रमोशन के पीछे वर्षों की मेहनत
टर्नस का कॅरिअर रातोंरात नहीं बना। उन्होंने एपल के विभिन्न इंजीनियरिंग और प्रोडक्ट डेवलपमेंट विभागों में काम करते हुए खुद को साबित किया। 2021 में उन्हें हार्डवेयर इंजीनियरिंग का सीनियर वाइस प्रेसिडेंट बनाया गया, जहां वे एपल के लगभग सभी प्रमुख डिवाइसों के विकास की जिम्मेदारी संभालने लगे। टिम कुक के बाद सीईओ पद के लिए उनका नाम वर्षों से संभावित उम्मीदवारों में शामिल था। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्हें 25 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा
संघर्ष केवल तकनीकी नहीं, भरोसे का भी था : एपल जैसी कंपनी में सबसे बड़ी चुनौती केवल बेहतर उत्पाद बनाना नहीं, बल्कि लाखों ग्राहकों और हजारों कर्मचारियों के भरोसे को बनाए रखना है। टर्नस ने अपना पूरा कॅरिअर ऐसे माहौल में बिताया, जहां हर उत्पाद लॉन्च वैश्विक सुर्खियां बनता है और छोटी-सी गलती भी अरबों डॉलर का असर डाल सकती है। इस दौरान उन्होंने कई तकनीकी बदलाव, बाजार की चुनौतियां और प्रतिस्पर्धा के दौर देखे। लेकिन उन्होंने कंपनी के भीतर लगातार अपनी विश्वसनीयता और नेतृत्व क्षमता को मजबूत किया।
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टर्नस अकेले सीईओ नहीं हैं जिन्होंने अपना अधिकांश समय एक ही कंपनी में बिताया हो। माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला ने 1992 में जॉइन किया और 22 साल बाद शीर्ष पद पर पहुंचे। अमेजन के सीईओ एंडी जैसी को भी दो दशक लगे। ये उदाहरण बताते हैं कि बड़ी कंपनियां शीर्ष पद के लिए भरोसेमंद लोगों पर दांव लगाती हैं।
कॅरिअर का बड़ा सबक
जॉन टर्नस की कहानी युवा पेशेवरों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। बेहतर अवसरों के लिए नौकरी बदलना गलत नहीं है, लेकिन हर सफलता का रास्ता बार-बार कंपनी बदलकर नहीं गुजरता। कई बार सबसे बड़ी छलांग उसी संगठन के भीतर मिलती है, जहां वर्षों की मेहनत, भरोसा व अनुभव एक साथ जमा होते हैं।