{"_id":"6a927612075e76698b02768d","slug":"social-media-ban-kids-bypass-age-checks-with-fake-beards-2026-08-29","type":"story","status":"publish","title_hn":"सोशल मीडिया: बैन के बाद भी बच्चे एक्टिव, नकली मूंछ-दाढ़ी से उम्र जांच को दे रहे चकमा; क्याें बेअसर हुआ कानून?","category":{"title":"Tech Diary","title_hn":"टेक डायरी","slug":"tech-diary"}}
सोशल मीडिया: बैन के बाद भी बच्चे एक्टिव, नकली मूंछ-दाढ़ी से उम्र जांच को दे रहे चकमा; क्याें बेअसर हुआ कानून?
Sat, 29 Aug 2026 11:33 AM IST
जागृति शुक्ला
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: जागृति शुक्ला
Updated Sat, 29 Aug 2026 11:33 AM IST
सार
बच्चों को डिजिटल दुनिया के खतरों से दूर रखने के लिए ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर सख्त पाबंदी लागू की गई है। हालांकि, शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक इस प्रतिबंध का असर अभी भी बेहद सीमित नजर आ रहा है। कई बच्चे अब भी अलग-अलग तरीकों से एज वेरिफिकेशन को चकमा देकर इन प्लेटफॉर्म्स का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं। आइए जानते हैं कि वे पाबंदी से बचने के लिए कौन-से पैंतरे अपना रहे हैं और क्या बच्चों को रोकने के लिए आने वाले समय में कोई नई सख्ती लागू की जाएगी। जानिए सब कुछ विस्तार से।
विज्ञापन
सोशल मीडिया बैन
- फोटो : एआई जनरेटेड
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
ऑस्ट्रेलिया के सरकारी ई-सेफ्टी आयोग के शुरुआती आकंड़ों के अनुसार, दस से 15 साल के बच्चों में सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों की संख्या 85.9 फीसदी से घटकर 81.5 फीसदी हुई है। यानी प्रतिबंध के बाद भी करीब पांच में से चार बच्चे सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं।
बच्चे किन पैंतरों का कर रहे इस्तेमाल?
नकली मूंछ-दाढ़ी लगाकर उम्र जांच को चकमा
टिकटॉक पर भी बच्चों की पहुंच बरकरार
कब से लागू हुआ यह कानून?
छिपकर सोशल मीडिया इस्तेमाल करना भी बन सकता है खतरा
क्या सिर्फ बैन से समस्या का समाधान होगा?
ऑस्ट्रेलिया के शुरुआती आंकड़े एक अहम सवाल खड़ा करते हैं, क्या बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए सिर्फ उम्र की पाबंदी पर्याप्त है? 85.9 फीसदी से 81.5 फीसदी तक इस्तेमाल में कमी जरूर आई है, लेकिन बड़ी संख्या में बच्चे अब भी सोशल मीडिया पर मौजूद हैं। गलत जन्मतिथि, दूसरे की पहचान, वीपीएन और यहां तक कि नकली मूंछ-दाढ़ी जैसे तरीकों से उम्र जांच को चकमा देने की कोशिश बताती है कि तकनीकी उम्र सत्यापन के साथ-साथ पैरेंटल कंट्रोल, डिजिटल जागरूकता और बच्चों के साथ खुली बातचीत भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
विज्ञापन
बच्चे किन पैंतरों का कर रहे इस्तेमाल?
- प्रतिबंध से बचने के लिए बच्चे कई तरीके अपना रहे हैं। इनमें सोशल मीडिया अकाउंट बनाते समय गलत जन्मतिथि दर्ज करना, किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल करना और वीपीएन के जरिए प्रतिबंध से बचने की कोशिश करना शामिल है।
- उम्र सत्यापन के लिए इस्तेमाल की जा रही चेहरे की पहचान तकनीक भी चुनौती का सामना कर रही है। अलग-अलग देशों में सामने आए मामलों से पता चलता है कि बच्चे उम्र जांच सिस्टम को मात देने के नए तरीके तलाश रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
नकली मूंछ-दाढ़ी लगाकर उम्र जांच को चकमा
- इसके अलावा ब्रिटेन में उम्र सत्यापन प्रणाली को चकमा देने का एक अलग तरीका भी सामने आया है। वहां कुछ किशोरों की ओर से चेहरे पर नकली मूंछ और दाढ़ी लगाकर उम्र जांच प्रणाली को भ्रमित करने के मामले सामने आए हैं।
- यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि सोशल मीडिया कंपनियां कम उम्र के यूजर्स की पहचान के लिए तेजी से चेहरे की पहचान और दूसरे डिजिटल एज-वेरिफिकेशन तरीकों का इस्तेमाल कर रही हैं।
टिकटॉक पर भी बच्चों की पहुंच बरकरार
- पैरेंटल-कंट्रोल कंपनी क्वेस्टोडियो के आंकड़ों के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया में जुलाई के दौरान 13 से 15 साल के 25.9 फीसदी बच्चे टिकटॉक का इस्तेमाल कर रहे थे।
- प्रतिबंध लागू होने से पहले यह आंकड़ा करीब 27 फीसदी था। यानी गिरावट जरूर आई, लेकिन बच्चों की टिकटॉक तक पहुंच पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
- कुछ आयु वर्गों में दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल में बढ़ोतरी की बात भी सामने आई है। इससे संकेत मिलता है कि प्रतिबंध के बाद बच्चे एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म की ओर भी जा सकते हैं।
कब से लागू हुआ यह कानून?
- ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर यह कानून 10 दिसंबर 2025 से लागू हुआ था। इसका उद्देश्य बच्चों को सोशल मीडिया के संभावित नुकसान से बचाना और कम उम्र में सोशल मीडिया इस्तेमाल को नियंत्रित करना है। हालांकि शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ प्रतिबंध लगाने से बच्चों की ऑनलाइन मौजूदगी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इसके लिए सरकार और भी कई सख्ती लागू करने पर विचार कर रही है।
छिपकर सोशल मीडिया इस्तेमाल करना भी बन सकता है खतरा
- एक्सपर्ट्स का मानना है कि बच्चों का लंबे समय तक सोशल मीडिया इस्तेमाल उनके लिए नुकसानदेह हो सकता है। खासतौर पर दिन में करीब 12 घंटे लगातार रील्स देखने जैसी आदत बच्चों के मानसिक विकास के लिए नुकसानदेह मानी जाती है।
- दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर पूरी तरह पाबंदी लगाने से एक अलग समस्या भी पैदा हो सकती है। बच्चे अगर छिपकर सोशल मीडिया इस्तेमाल करने लगते हैं, तो ऑनलाइन किसी खतरे, साइबर बुलिंग या दूसरी परेशानी का सामना करने पर वे माता-पिता से मदद मांगने से डर सकते हैं।
क्या सिर्फ बैन से समस्या का समाधान होगा?
ऑस्ट्रेलिया के शुरुआती आंकड़े एक अहम सवाल खड़ा करते हैं, क्या बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए सिर्फ उम्र की पाबंदी पर्याप्त है? 85.9 फीसदी से 81.5 फीसदी तक इस्तेमाल में कमी जरूर आई है, लेकिन बड़ी संख्या में बच्चे अब भी सोशल मीडिया पर मौजूद हैं। गलत जन्मतिथि, दूसरे की पहचान, वीपीएन और यहां तक कि नकली मूंछ-दाढ़ी जैसे तरीकों से उम्र जांच को चकमा देने की कोशिश बताती है कि तकनीकी उम्र सत्यापन के साथ-साथ पैरेंटल कंट्रोल, डिजिटल जागरूकता और बच्चों के साथ खुली बातचीत भी महत्वपूर्ण हो सकती है।