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अमेरिका: लोगों ने सिक्योरिटी कैमरों के खिलाफ क्यों छेड़ दी जंग, देखते ही क्यों तोड़ रहे? जानें क्या है मामला
Wed, 04 Nov 2026 05:39 PM IST
नीतीश कुमार
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नीतीश कुमार
Updated Wed, 04 Nov 2026 05:39 PM IST
सार
- अमेरिका में फ्लॉक कंपनी के सिक्योरिटी कैमरों के खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ रहा है।
- कई राज्यों में इन कैमरों को तोड़ने और हटाने की घटनाएं सामने आई हैं।
- आखिर सड़क पर लगे इन कैमरों से लोगों को क्या खतरा है? जानिए आखिर क्यों लोगों का गुस्सा इन कैमरों पर फूट पड़ा है।
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कैमरों से गलत तरह से निगरानी करने के गंभीर आरोप लगे।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
अमेरिका में इन दिनों सड़कों पर लगे एक खास तरह के कैमरे चर्चा में हैं। ये कैमरे किसी ट्रैफिक नियम को तोड़ने वाले वाहन चालकों का चालान काटने के लिए नहीं, बल्कि गुजरने वाली गाड़ियों की नंबर प्लेट स्कैन करने और उनकी जानकारी रिकॉर्ड करने के लिए लगाए गए हैं। इन्हें फ्लॉक कैमरा (Flock Camera) कहा जाता है।
अमेरिका के कई शहरों में इन कैमरों को लेकर लोगों का विरोध बढ़ रहा है। कुछ जगहों पर इन्हें नुकसान पहुंचाने और तोड़ने की घटनाएं भी सामने आई हैं। विरोध करने वालों का कहना है कि इन कैमरों के जरिए सरकार और पुलिस आम लोगों की गतिविधियों पर नजर रख सकती हैं। वहीं, पुलिस और स्थानीय प्रशासन इन्हें अपराध रोकने और संदिग्ध वाहनों की तलाश में मददगार बताते हैं।
आखिर फ्लॉक कैमरे क्या हैं? ये कैसे काम करते हैं? अमेरिका में लोग इन्हें क्यों तोड़ रहे हैं? क्या इन कैमरों से लोगों की निजी जिंदगी और डेटा को खतरा है? और इस पूरे विवाद में अब तक क्या-क्या हुआ है? आइए समझते हैं।
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फ्लॉक कैमरा क्या है और यह कैसे काम करता है?
फ्लॉक सेफ्टी (Flock Safety) अमेरिका की एक टेक्नोलॉजी कंपनी है, जो पुलिस विभागों, स्थानीय प्रशासन, रिहायशी सोसाइटियों और निजी संस्थानों के लिए सिक्योरिटी कैमरे और निगरानी से जुड़े सिस्टम बनाती है। कंपनी का मुख्यालय अटलांटा, जॉर्जिया में है। इसके सबसे चर्चित प्रोडक्ट में ऑटोमैटिक लाइसेंस प्लेट रीडर (ALPR) कैमरे शामिल हैं। आम भाषा में इन्हें नंबर प्लेट स्कैन करने वाले कैमरे कह सकते हैं।
इन कैमरों को आमतौर पर सड़क के किनारे, चौराहों और शहरों के एंट्री-एग्जिट पॉइंट पर लगाया जाता है। इनका काम सिर्फ गाड़ी की तस्वीर लेना नहीं है। ये गुजरने वाले वाहनों की कई जानकारियां रिकॉर्ड करते हैं। अमेरिका में कंपनी ने करीब 1.2 लाख ऐसे कैमरे लगाए हैं, जो हर महीने लाखों गाड़ियों की नंबर प्लेट और उनकी डिटेल्स स्कैन करते हैं।
फ्लॉक कैमरे मुख्य रूप से गाड़ियों के नंबर प्लेट रिकॉर्ड करते है। इसमें कार का मॉडल, कंपनी, रंग और दूसरी दिखाई देने वाली विशेषताएं रिकॉर्ड की जाती हैं। किस समय और किस जगह से कोई गाड़ी गुजरी, इसका रिकॉर्ड तैयार होता है। रिकॉर्ड को ऑनलाइन डेटाबेस में रखा जाता है, जहां अधिकृत पुलिस अधिकारी जरूरत पड़ने पर उसे सर्च कर सकते हैं।
इसे ऐसे समझें कि अगर किसी शहर में एक कार चोरी हो जाती है तो पुलिस उसके नंबर की मदद से आसपास लगे फ्लॉक कैमरों के रिकॉर्ड में उसे खोज सकती है। इससे पता लगाया जा सकता है कि वह गाड़ी किन रास्तों से गुजरी थी।
यहां एक अहम बात समझना जरूरी है कि ये कैमरे सीधे कार में बैठे व्यक्ति की पहचान नहीं करते। इनका मुख्य काम वाहन और उसकी एक्टिविटी पर होता है। लेकिन जब किसी गाड़ी के आने-जाने की जानकारी लगातार रिकॉर्ड होती है, तो उससे उस वाहन का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति की दिनचर्या और आवाजाही का अंदाजा लगाया जा सकता है।
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अमेरिका के कई शहरों में इन कैमरों को लेकर लोगों का विरोध बढ़ रहा है। कुछ जगहों पर इन्हें नुकसान पहुंचाने और तोड़ने की घटनाएं भी सामने आई हैं। विरोध करने वालों का कहना है कि इन कैमरों के जरिए सरकार और पुलिस आम लोगों की गतिविधियों पर नजर रख सकती हैं। वहीं, पुलिस और स्थानीय प्रशासन इन्हें अपराध रोकने और संदिग्ध वाहनों की तलाश में मददगार बताते हैं।
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आखिर फ्लॉक कैमरे क्या हैं? ये कैसे काम करते हैं? अमेरिका में लोग इन्हें क्यों तोड़ रहे हैं? क्या इन कैमरों से लोगों की निजी जिंदगी और डेटा को खतरा है? और इस पूरे विवाद में अब तक क्या-क्या हुआ है? आइए समझते हैं।
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फ्लॉक कैमरा क्या है और यह कैसे काम करता है?
फ्लॉक सेफ्टी (Flock Safety) अमेरिका की एक टेक्नोलॉजी कंपनी है, जो पुलिस विभागों, स्थानीय प्रशासन, रिहायशी सोसाइटियों और निजी संस्थानों के लिए सिक्योरिटी कैमरे और निगरानी से जुड़े सिस्टम बनाती है। कंपनी का मुख्यालय अटलांटा, जॉर्जिया में है। इसके सबसे चर्चित प्रोडक्ट में ऑटोमैटिक लाइसेंस प्लेट रीडर (ALPR) कैमरे शामिल हैं। आम भाषा में इन्हें नंबर प्लेट स्कैन करने वाले कैमरे कह सकते हैं।
इन कैमरों को आमतौर पर सड़क के किनारे, चौराहों और शहरों के एंट्री-एग्जिट पॉइंट पर लगाया जाता है। इनका काम सिर्फ गाड़ी की तस्वीर लेना नहीं है। ये गुजरने वाले वाहनों की कई जानकारियां रिकॉर्ड करते हैं। अमेरिका में कंपनी ने करीब 1.2 लाख ऐसे कैमरे लगाए हैं, जो हर महीने लाखों गाड़ियों की नंबर प्लेट और उनकी डिटेल्स स्कैन करते हैं।
फ्लॉक कैमरे मुख्य रूप से गाड़ियों के नंबर प्लेट रिकॉर्ड करते है। इसमें कार का मॉडल, कंपनी, रंग और दूसरी दिखाई देने वाली विशेषताएं रिकॉर्ड की जाती हैं। किस समय और किस जगह से कोई गाड़ी गुजरी, इसका रिकॉर्ड तैयार होता है। रिकॉर्ड को ऑनलाइन डेटाबेस में रखा जाता है, जहां अधिकृत पुलिस अधिकारी जरूरत पड़ने पर उसे सर्च कर सकते हैं।
इसे ऐसे समझें कि अगर किसी शहर में एक कार चोरी हो जाती है तो पुलिस उसके नंबर की मदद से आसपास लगे फ्लॉक कैमरों के रिकॉर्ड में उसे खोज सकती है। इससे पता लगाया जा सकता है कि वह गाड़ी किन रास्तों से गुजरी थी।
यहां एक अहम बात समझना जरूरी है कि ये कैमरे सीधे कार में बैठे व्यक्ति की पहचान नहीं करते। इनका मुख्य काम वाहन और उसकी एक्टिविटी पर होता है। लेकिन जब किसी गाड़ी के आने-जाने की जानकारी लगातार रिकॉर्ड होती है, तो उससे उस वाहन का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति की दिनचर्या और आवाजाही का अंदाजा लगाया जा सकता है।
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सीसीटीवी कैमरा
- फोटो : ANI
अमेरिका में लोग फ्लॉक कैमरों को क्यों तोड़ रहे हैं?
अमेरिका में फ्लॉक कैमरों से जुड़ा विवाद इनके गलत इस्तेमाल को लेकर है। इसके पीछे प्राइवेसी, पुलिस की शक्तियों, डेटा शेयरिंग और सरकारी निगरानी से जुड़ी कई चिंताएं हैं। फ्लॉक कैमरों को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह है कि ये किसी एक अपराध या संदिग्ध वाहन पर नजर रखने तक सीमित नहीं रहते। इनके सामने से गुजरने वाली सामान्य गाड़ियों का डेटा भी रिकॉर्ड होता है।
प्राइवेसी की वकालत करने वाले संगठनों का आरोप है कि अलग-अलग जगह लगे कैमरों के रिकॉर्ड को जोड़कर लोगों की आवाजाही का पैटर्न तैयार किया जा सकता है। इससे लोगों की निजी जिंदगी के बारे में ऐसी जानकारियां सामने आ सकती हैं, जिन्हें वे सार्वजनिक नहीं करना चाहते।
उनका सवाल है कि अगर किसी व्यक्ति ने कोई अपराध नहीं किया है तो उसकी रोजमर्रा की गतिविधियों का रिकॉर्ड रखने की जरूरत क्यों है।
पुलिस अधिकारियों पर लगे कैमरों के गलत इस्तेमाल के आरोप
फ्लॉक कैमरों के विरोध की एक बड़ी वजह पुलिस अधिकारियों द्वारा इनके कथित गलत इस्तेमाल के मामले हैं। अगस्त 2026 में द वॉशिंगटन पोस्ट की एक जांच में सामने आया कि अमेरिका में कम से कम 50 पुलिस अधिकारियों पर लाइसेंस प्लेट रीडर सिस्टम का इस्तेमाल निजी कारणों से करने के आरोप लगे थे। इनमें पूर्व पार्टनर, रिश्तेदार और जान-पहचान के लोगों की गतिविधियों पर नजर रखने के मामले भी शामिल थे।
एक और रिपोर्ट में बताया गया कि केंटकी में एक पुलिस अधिकारी पर अपनी पूर्व गर्लफ्रेंड की गाड़ी को फ्लॉक कैमरों के जरिए 2,000 से ज्यादा बार ट्रैक किया। वहीं, जॉर्जिया के सवाना में कथित दुरुपयोग के मामलों के बाद पुलिस विभाग के छह कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया।
इन घटनाओं ने लोगों की चिंता बढ़ा दी कि अगर कैमरों और उनके डेटाबेस तक पुलिस अधिकारियों की पहुंच है, तो कोई अधिकारी निजी दुश्मनी या व्यक्तिगत फायदे के लिए भी इसका इस्तेमाल कर सकता है।
सोशल मीडिया पर भी चल रहा विरोध
मिनेसोटा से लेकर फ्लोरिडा और कैलिफोर्निया तक लोग इन कैमरों को तोड़ रहे हैं या उन्हें ढक कर अपना विरोध जता रहे हैं। सोशल मीडिया पर फ्लॉक कैमरों के विरोध में कई ग्रुप्स बन गए हैं। इन ग्रुप्स में लोग इन कैमरों की लोकेशन शेयर कर रहे हैं, ताकि दूसरे इनसे बच सकें।
अक्टूबर 2026 में इस विरोध ने एक नया रूप लिया। सोशल मीडिया पर हैलोवीन यानी 31 अक्टूबर के मौके पर देशभर में फ्लॉक कैमरों के खिलाफ अभियान चलाने की अपील की गई। इसमें कैमरों को ढकने, निष्क्रिय करने या नुकसान पहुंचाने की बातें सामने आईं।
पुलिस और प्रशासन का फ्लॉक कैमरों को समर्थन
इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू भी है। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि फ्लॉक कैमरे अपराध की जांच में काफी मददगार साबित हो रहे हैं। पुलिस के मुताबिक, अगर किसी इलाके में गोलीबारी होती है और प्रत्यक्षदर्शी सिर्फ इतना बता पाते हैं कि संदिग्ध एक लाल रंग की कार में आया था, तो पुलिस आसपास के कैमरों की मदद से उस रंग और मॉडल की गाड़ियों को खोज सकती है।
इसी तरह चोरी की गाड़ियों, अपहरण, लापता बच्चों और संदिग्ध वाहनों की तलाश में भी यह तकनीक मदद कर सकती है।
फ्लॉक सेफ्टी का दावा है कि उसके कैमरों और सिस्टम की मदद से 2025 में करीब 10,000 लापता लोगों को खोजने में सहायता मिली। कंपनी ने करीब 10 लाख आपराधिक जांच में मदद का भी दावा किया है।
फ्लॉक सेफ्टी ने विवाद के बाद क्या बदलाव किए?
इस भारी विरोध और छवि खराब होने के बाद, फ्लॉक सेफ्टी ने डैमेज कंट्रोल करते हुए अपनी सुरक्षा नीतियों में कुछ बड़े बदलाव करने का एलान किया है। कंपनी का कहना है कि अब पुलिस अधिकारियों को सिस्टम में कोई भी गाड़ी या नंबर प्लेट सर्च करने से पहले एक क्रिमिनल केस नंबर दर्ज करना होगा।
अगर कोई अधिकारी असामान्य तरीके से सिस्टम का इस्तेमाल करता है, तो उसका अकाउंट तुरंत लॉक कर दिया जाएगा और उस एक्टिविटी की ऑटोमैटिक जांच होगी। वहीं, अब सर्वर पर गाड़ियों का डेटा केवल 7 दिन तक के लिए रहेगा, जो पहले 30 दिनों तक रहता था। अब शहर खुद यह तय कर सकेंगे कि उनके कैमरे का डेटा दूसरी एजेंसियों के साथ किस तरह के अपराधों के लिए शेयर किया जाए।
कई शहरों ने हटाए फ्लॉक कैमरे
विवाद शुरू होने के बाद कई शहरों और स्थानीय प्रशासन ने इन कैमरों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, 50 से ज्यादा स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों ने फ्लॉक के साथ अपने कॉन्ट्रैक्ट रद्द किए, रोक दिए या नए कॉन्ट्रैक्ट को मंजूरी नहीं दी। वहीं, वॉशिंगटन स्टेट के रेंटन शहर में 1.70 लाख डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने पर उसे दोबारा मंजूरी नहीं दी गई।
तकनीक और प्राइवेसी के बीच चल रही यह जंग तकनीक की दुनिया के लिए एक बड़ा सबक है। सुरक्षा तकनीक तभी तक कारगर है, जब तक वह आम इंसान की निजता का सम्मान करे।
अमेरिका में फ्लॉक कैमरों से जुड़ा विवाद इनके गलत इस्तेमाल को लेकर है। इसके पीछे प्राइवेसी, पुलिस की शक्तियों, डेटा शेयरिंग और सरकारी निगरानी से जुड़ी कई चिंताएं हैं। फ्लॉक कैमरों को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह है कि ये किसी एक अपराध या संदिग्ध वाहन पर नजर रखने तक सीमित नहीं रहते। इनके सामने से गुजरने वाली सामान्य गाड़ियों का डेटा भी रिकॉर्ड होता है।
प्राइवेसी की वकालत करने वाले संगठनों का आरोप है कि अलग-अलग जगह लगे कैमरों के रिकॉर्ड को जोड़कर लोगों की आवाजाही का पैटर्न तैयार किया जा सकता है। इससे लोगों की निजी जिंदगी के बारे में ऐसी जानकारियां सामने आ सकती हैं, जिन्हें वे सार्वजनिक नहीं करना चाहते।
उनका सवाल है कि अगर किसी व्यक्ति ने कोई अपराध नहीं किया है तो उसकी रोजमर्रा की गतिविधियों का रिकॉर्ड रखने की जरूरत क्यों है।
पुलिस अधिकारियों पर लगे कैमरों के गलत इस्तेमाल के आरोप
फ्लॉक कैमरों के विरोध की एक बड़ी वजह पुलिस अधिकारियों द्वारा इनके कथित गलत इस्तेमाल के मामले हैं। अगस्त 2026 में द वॉशिंगटन पोस्ट की एक जांच में सामने आया कि अमेरिका में कम से कम 50 पुलिस अधिकारियों पर लाइसेंस प्लेट रीडर सिस्टम का इस्तेमाल निजी कारणों से करने के आरोप लगे थे। इनमें पूर्व पार्टनर, रिश्तेदार और जान-पहचान के लोगों की गतिविधियों पर नजर रखने के मामले भी शामिल थे।
एक और रिपोर्ट में बताया गया कि केंटकी में एक पुलिस अधिकारी पर अपनी पूर्व गर्लफ्रेंड की गाड़ी को फ्लॉक कैमरों के जरिए 2,000 से ज्यादा बार ट्रैक किया। वहीं, जॉर्जिया के सवाना में कथित दुरुपयोग के मामलों के बाद पुलिस विभाग के छह कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया।
इन घटनाओं ने लोगों की चिंता बढ़ा दी कि अगर कैमरों और उनके डेटाबेस तक पुलिस अधिकारियों की पहुंच है, तो कोई अधिकारी निजी दुश्मनी या व्यक्तिगत फायदे के लिए भी इसका इस्तेमाल कर सकता है।
सोशल मीडिया पर भी चल रहा विरोध
मिनेसोटा से लेकर फ्लोरिडा और कैलिफोर्निया तक लोग इन कैमरों को तोड़ रहे हैं या उन्हें ढक कर अपना विरोध जता रहे हैं। सोशल मीडिया पर फ्लॉक कैमरों के विरोध में कई ग्रुप्स बन गए हैं। इन ग्रुप्स में लोग इन कैमरों की लोकेशन शेयर कर रहे हैं, ताकि दूसरे इनसे बच सकें।
अक्टूबर 2026 में इस विरोध ने एक नया रूप लिया। सोशल मीडिया पर हैलोवीन यानी 31 अक्टूबर के मौके पर देशभर में फ्लॉक कैमरों के खिलाफ अभियान चलाने की अपील की गई। इसमें कैमरों को ढकने, निष्क्रिय करने या नुकसान पहुंचाने की बातें सामने आईं।
पुलिस और प्रशासन का फ्लॉक कैमरों को समर्थन
इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू भी है। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि फ्लॉक कैमरे अपराध की जांच में काफी मददगार साबित हो रहे हैं। पुलिस के मुताबिक, अगर किसी इलाके में गोलीबारी होती है और प्रत्यक्षदर्शी सिर्फ इतना बता पाते हैं कि संदिग्ध एक लाल रंग की कार में आया था, तो पुलिस आसपास के कैमरों की मदद से उस रंग और मॉडल की गाड़ियों को खोज सकती है।
इसी तरह चोरी की गाड़ियों, अपहरण, लापता बच्चों और संदिग्ध वाहनों की तलाश में भी यह तकनीक मदद कर सकती है।
फ्लॉक सेफ्टी का दावा है कि उसके कैमरों और सिस्टम की मदद से 2025 में करीब 10,000 लापता लोगों को खोजने में सहायता मिली। कंपनी ने करीब 10 लाख आपराधिक जांच में मदद का भी दावा किया है।
फ्लॉक सेफ्टी ने विवाद के बाद क्या बदलाव किए?
इस भारी विरोध और छवि खराब होने के बाद, फ्लॉक सेफ्टी ने डैमेज कंट्रोल करते हुए अपनी सुरक्षा नीतियों में कुछ बड़े बदलाव करने का एलान किया है। कंपनी का कहना है कि अब पुलिस अधिकारियों को सिस्टम में कोई भी गाड़ी या नंबर प्लेट सर्च करने से पहले एक क्रिमिनल केस नंबर दर्ज करना होगा।
अगर कोई अधिकारी असामान्य तरीके से सिस्टम का इस्तेमाल करता है, तो उसका अकाउंट तुरंत लॉक कर दिया जाएगा और उस एक्टिविटी की ऑटोमैटिक जांच होगी। वहीं, अब सर्वर पर गाड़ियों का डेटा केवल 7 दिन तक के लिए रहेगा, जो पहले 30 दिनों तक रहता था। अब शहर खुद यह तय कर सकेंगे कि उनके कैमरे का डेटा दूसरी एजेंसियों के साथ किस तरह के अपराधों के लिए शेयर किया जाए।
कई शहरों ने हटाए फ्लॉक कैमरे
विवाद शुरू होने के बाद कई शहरों और स्थानीय प्रशासन ने इन कैमरों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, 50 से ज्यादा स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों ने फ्लॉक के साथ अपने कॉन्ट्रैक्ट रद्द किए, रोक दिए या नए कॉन्ट्रैक्ट को मंजूरी नहीं दी। वहीं, वॉशिंगटन स्टेट के रेंटन शहर में 1.70 लाख डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने पर उसे दोबारा मंजूरी नहीं दी गई।
तकनीक और प्राइवेसी के बीच चल रही यह जंग तकनीक की दुनिया के लिए एक बड़ा सबक है। सुरक्षा तकनीक तभी तक कारगर है, जब तक वह आम इंसान की निजता का सम्मान करे।