Nvidia H200: अमेरिका का 25% टैक्स, चीन की मजबूरी और बीच में फंसी दुनिया की सबसे पावरफुल चिप!
ट्रंप प्रशासन ने सेमीकंडक्टर्स पर टैरिफ लगाने को लेकर चल रही अफवाहों पर विराम लगाते हुए आधिकारिक घोषणा कर दी है। नए नियम के तहत अमेरिका के बाहर बने कुछ एडवांस्ड एआई सेमीकंडक्टर्स पर 25% टैरिफ लगेगा।
विस्तार
सेमीकंडक्टर्स पर टैरिफ लगाने को लेकर कई महीनों से अफवाहें चल रही थीं। अब ट्रंप प्रशासन ने इसकी आधिकारिक घोषणा कर दी है। इस नए नियम के तहत कुछ चुनिंदा चिप्स पर टैक्स लगेगा। इसमें एनवीडिया की H200 जैसी एडवांस्ड एआई चिप्स भी शामिल हैं, जिन्हें चीन को निर्यात किया जाता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके अनुसार, उन एडवांस्ड एआई सेमीकंडक्टर्स पर 25% टैरिफ लगाया जाएगा जो अमेरिका के बाहर बनाए जाते हैं, लेकिन दूसरे देशों को भेजे जाने से पहले अमेरिका से होकर गुजरते हैं।
एनवीडिया H200 आखिर है क्या?
एनवीडिया H200, कंपनी की मशहूर 'हॉपर' आर्किटेक्चर पर बनी एक ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (जीपीयू) है। यह H100 का अपग्रेडेड वर्जन है। इसकी तीन बड़ी खासियतें हैं जो इसे 'सुपरचिप' बनाती हैं-
HBM3e मेमोरी: यह दुनिया का पहला ऐसा जीपीयू है जिसमें HBM3e (हाई बैंडविथ मेमोरी 3e) का इस्तेमाल हुआ है। इसमें 141GB की मेमोरी है, जो H100 से लगभग दो गुना ज्यादा तेज है।
रफ्तार: यह डाटा को 4.8 टेराबाइट्स प्रति सेकंड की रफ्तार से प्रोसेस कर सकता है। इसका मतलब है कि यह एआई मॉडल्स को बहुत तेजी से 'सोचने' और जवाब देने में मदद करता है।
जेनरेटिव एआई के लिए खास: इसे विशेष रूप से चैटजीपीटी, जेमिनी, या लामा जैसे बड़े लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) को चलाने के लिए डिजाइन किया गया है।
चीन के लिए यह 'करो या मरो' वाली स्थिति क्यों है?
चीन के लिए H200 सिर्फ एक चिप नहीं, बल्कि ग्लोबल एआई रेस में बने रहने का एक हथियार है। इसके पीछे मुख्य कारण ये हैं:
एआई मॉडल्स की ट्रेनिंग: चीन अपनी खुद की एआई तकनीक (जैसे बाइडू का एर्नी बॉट या अलीबाबा के मॉडल्स) विकसित कर रहा है। इन मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए भारी कंप्यूटिंग पावर की जरूरत होती है। एनवीडिया की चिप्स के बिना, ट्रेनिंग में कई महीने ज्यादा लग सकते हैं।
घरेलू तकनीक का कमजोर होना: हालांकि चीन की कंपनी हुआवेई(असेंड 910B चिप के साथ) कोशिश कर रही है, लेकिन अभी भी उनकी तकनीक एनवीडिया की H200 के मुकाबले परफॉर्मेंस और एफिशिएंसी में पीछे है।
लागत और बिजली: H200 चिप कम बिजली में ज्यादा काम करती है। अगर चीन पुरानी चिप्स का इस्तेमाल करता है, तो उसे वही काम करने के लिए हजारों ज्यादा चिप्स और बहुत ज्यादा बिजली की जरूरत होगी, जो आर्थिक रूप से महंगा पड़ेगा।
जवाब देने की क्षमता: H200 की सबसे बड़ी ताकत 'इंटरफेरेंस' है (यानी जब आप एआई से सवाल पूछते हैं और वह जवाब देता है)। H200 यह काम H100 के मुकाबले 2 गुना तेज करता है। चीन अपनी टेक कंपनियों को धीमा नहीं देखना चाहता।
फैसले के मुख्य बिंदु
यह खबर अमेरिका के वाणिज्य विभाग के उस फैसले को आधिकारिक रूप देती है, जिसमें दिसंबर में एनवीडिया को चीन के कुछ चुने हुए और वेरिफाइड ग्राहकों को अपनी H200 एडवांस्ड एआई चिप्स भेजने की अनुमति दी गई थी। इस नियम के दायरे में सिर्फ एनवीडिया ही नहीं बल्कि AMD की MI325X जैसी दूसरी कंपनियों की चिप्स भी आती हैं। दिलचस्प बात यह है कि टैरिफ लगने के बावजूद एनवीडिया ने इस फैसले का खुलकर स्वागत किया है। इसकी वजह यह है कि अब कंपनी के लिए अपने मंजूर ग्राहकों को चिप्स बेचने का रास्ता साफ हो गया है।
एनवीडिया की प्रतिक्रिया
एनवीडिया के एक प्रवक्ता ने कहा, "हम राष्ट्रपति ट्रंप के उस फैसले की तारीफ करते हैं, जिससे अमेरिका की चिप इंडस्ट्री को दुनिया में मुकाबला करने में मदद मिलेगी। इससे अमेरिका में अच्छी सैलरी वाली नौकरियों और मैन्युफैक्चरिंग को भी समर्थन मिलेगा। वाणिज्य विभाग के जरिए जांचे-परखे कमर्शियल ग्राहकों को H200 चिप देना एक सोच-समझकर लिया गया कदम है, जो अमेरिका के लिए फायदेमंद है।"
चीन में भारी मांग और सरकार की दुविधा
H200 सेमीकंडक्टर्स की बाजार में बहुत ज्यादा मांग है। खबरों के मुताबिक, चीन की कंपनियों से शुरुआती ऑर्डर्स तेजी से बढ़ रहे थे इसलिए एनवीडिया इन चिप्स का उत्पादन बढ़ाने के बारे में सोच रही थी। लेकिन बात सिर्फ मांग की नहीं है। एक और अहम सवाल यह है कि चीन सरकार इन चिप्स के आयात को किस तरह नियंत्रित करती है। चिप बनाने और दुनिया की एआई रेस में आगे रहने को लेकर चीन की स्थिति भी अमेरिका जैसी ही जटिल है। चीन चाहता है कि उसका अपना सेमीकंडक्टर उद्योग तेजी से बढ़े। लेकिन वह यह भी नहीं चाहता कि जब तक उसकी खुद की तकनीक पूरी तरह तैयार हो तब तक वह विदेशी कंपनियों से पीछे रह जाए।
निक्केई एशिया की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन सरकार इस समय ऐसे नियम और दिशा-निर्देश बना रही है, जिनसे तय होगा कि चीनी कंपनियां विदेश से कितने सेमीकंडक्टर्स खरीद सकती हैं। इससे संभव है कि एनवीडिया जैसी कंपनियों की चिप्स खरीदने की कुछ हद तक अनुमति मिल जाए। अगर ऐसा होता है, तो यह चिप आयात को लेकर चीन के अब तक के सख्त रुख में बदलाव माना जाएगा।
अमेरिका की निर्भरता और सुरक्षा जोखिम
बुधवार को जारी यह कार्यकारी आदेश उन चिप्स पर लागू नहीं होगा जो अमेरिका में आयात होकर देश के अंदर रिसर्च, डिफेंस या बिजनेस जैसे कामों में इस्तेमाल की जाती हैं। घोषणा पत्र में साफ कहा गया है कि अमेरिका अभी अपनी जरूरत की सिर्फ करीब 10% चिप्स ही खुद पूरी तरह बनाता है। बाकी के लिए उसे दूसरे देशों की सप्लाई चेन पर बहुत ज्यादा निर्भर रहना पड़ता है। अमेरिका के मुताबिक, विदेशों पर इतनी निर्भरता आर्थिक रूप से भी खतरा है और देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बड़ा जोखिम बन सकती है।