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Uttarkashi News: रवांई घाटी में गूंजे लोकगीत, लाल धान की सामूहिक रोपाई शुरू
संवाद न्यूज एजेंसी, उत्तर काशी
Updated Fri, 19 Jun 2026 06:09 PM IST
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स्वील गांव से हर साल ज्येष्ठ माह की संक्रांति के दिन पूजा-अर्चना के साथ शुरू होती है रोपाई
पुरोला। रवांई घाटी के रामा और कमल सिरांई क्षेत्र में पारंपरिक पूजा-अर्चना एवं देवी-देवताओं के आह्वान के साथ लाल धान की सामूहिक रोपाई शुरू हो गई है। अपनी विशिष्ट गुणवत्ता और सांस्कृतिक पहचान के लिए प्रसिद्ध लाल धान की खेती को संरक्षित करने के लिए अब युवा पीढ़ी भी बढ़-चढ़कर आगे आ रही है।
कमल सिरांई क्षेत्र के स्वील गांव से प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ माह की संक्रांति के दिन विधिवत पूजा-अर्चना के साथ धान रोपाई का शुभारंभ होता है। इसके बाद रामा एवं कमल सिरांई पट्टी के अन्य गांवों में भी लाल धान की रोपाई शुरू हो जाती है। रोपाई से पहले गांव के स्याणे और बुजुर्ग तैयार खेतों में पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार क्षेत्र के देवी-देवताओं एवं मात्रियों का आह्वान कर दाणे-बुकाणे और श्रीफल अर्पित करते हैं। इसके बाद महिला और पुरुष सामूहिक रूप से खेतों में उतरकर लाल धान की रोपाई करते हैं।
रोपाई के दौरान पूरी रामा एवं कमल सिरांई पट्टी में ढोल-नगाड़ों की थाप, पारंपरिक लोकगीतों और सामूहिक श्रम की अनूठी संस्कृति देखने को मिलती है। पूरा क्षेत्र उत्सव के माहौल में रंग जाता है और आपसी सहयोग एवं भाईचारे की मिसाल प्रस्तुत करता है। रामा एवं कमल सिरांई क्षेत्र में उत्पादित लाल धान अपनी विशेष गुणवत्ता, स्वाद और पौष्टिकता के कारण उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भी पहचान रखता है।
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ग्रामीण बताते हैं कि पहले लगभग हर गांव में बड़े पैमाने पर लाल धान की खेती होती थी लेकिन समय के साथ आधुनिक खेती और बदलती परिस्थितियों के कारण इसका रकबा घटा है। हालांकि, अब युवा पीढ़ी अपनी पारंपरिक खेती और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने के लिए फिर से लाल धान की खेती की ओर आकर्षित हो रही है।
पुरोला। रवांई घाटी के रामा और कमल सिरांई क्षेत्र में पारंपरिक पूजा-अर्चना एवं देवी-देवताओं के आह्वान के साथ लाल धान की सामूहिक रोपाई शुरू हो गई है। अपनी विशिष्ट गुणवत्ता और सांस्कृतिक पहचान के लिए प्रसिद्ध लाल धान की खेती को संरक्षित करने के लिए अब युवा पीढ़ी भी बढ़-चढ़कर आगे आ रही है।
कमल सिरांई क्षेत्र के स्वील गांव से प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ माह की संक्रांति के दिन विधिवत पूजा-अर्चना के साथ धान रोपाई का शुभारंभ होता है। इसके बाद रामा एवं कमल सिरांई पट्टी के अन्य गांवों में भी लाल धान की रोपाई शुरू हो जाती है। रोपाई से पहले गांव के स्याणे और बुजुर्ग तैयार खेतों में पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार क्षेत्र के देवी-देवताओं एवं मात्रियों का आह्वान कर दाणे-बुकाणे और श्रीफल अर्पित करते हैं। इसके बाद महिला और पुरुष सामूहिक रूप से खेतों में उतरकर लाल धान की रोपाई करते हैं।
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रोपाई के दौरान पूरी रामा एवं कमल सिरांई पट्टी में ढोल-नगाड़ों की थाप, पारंपरिक लोकगीतों और सामूहिक श्रम की अनूठी संस्कृति देखने को मिलती है। पूरा क्षेत्र उत्सव के माहौल में रंग जाता है और आपसी सहयोग एवं भाईचारे की मिसाल प्रस्तुत करता है। रामा एवं कमल सिरांई क्षेत्र में उत्पादित लाल धान अपनी विशेष गुणवत्ता, स्वाद और पौष्टिकता के कारण उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भी पहचान रखता है।
ग्रामीण बताते हैं कि पहले लगभग हर गांव में बड़े पैमाने पर लाल धान की खेती होती थी लेकिन समय के साथ आधुनिक खेती और बदलती परिस्थितियों के कारण इसका रकबा घटा है। हालांकि, अब युवा पीढ़ी अपनी पारंपरिक खेती और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने के लिए फिर से लाल धान की खेती की ओर आकर्षित हो रही है।