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Ujjain: शिप्रा नदी को प्रवाहमान और प्रदूषण मुक्त बनाने संत करेंगे बड़ा आंदोलन, रणनीति बनाने जल्द होगी बैठक
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन Published by: अंकिता विश्वकर्मा Updated Tue, 25 Apr 2023 03:30 PM IST
धार्मिक नगरी उज्जैन में 12 वर्षों में एक बार लगने वाला सिंहस्थ महापर्व 2028 में आयोजित होगा, लेकिन इसके पूर्व मां शिप्रा की दुर्दशा को देखकर साधु संतों ने एक बड़ा आंदोलन करने का बिगुल फूंक दिया है। जिसको लेकर एक बैठक आयोजित होने वाली है, जिसमें साधु संतों के साथ ही शहर के सामाजिक संगठन, समाजसेवी, पंडित और पुजारी मिलकर एक ऐसी योजना तैयार करेंगे, जिससे कि मां शिप्रा प्रदूषण मुक्त, प्रवाहमान हो सकें। मां शिप्रा का वही स्वरूप सभी को नजर आये जिसके बारे में वह अब तक पढ़ते और सुनते आए हैं।
मां शिप्रा को प्रवाहमान व प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए चारधाम मंदिर के पीठाधीश्वर शांतिस्वरूपानंद गिरि महाराज ने यह पहल की है, जिसको लेकर उन्होंने कहा है कि मां शिप्रा कोई प्रवचन करने का विषय नहीं हैं। शिप्रा प्रदूषण मुक्त हो, प्रवाहमान हो। मां शिप्रा में अमृत की बूंदे गिरी थी, इसलिए सभी को सिंहस्थ महाकुंभ में मां शिप्रा में ही स्नान हो ऐसी हमारी कामना है। लेकिन सरकार के करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद भी अब तक मां शिप्रा प्रदूषित ही हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत 600 करोड़ रुपये खर्च कर इस पानी को शुद्ध करने का प्लांट लगाया जाने वाला है, लेकिन इस प्रोजेक्ट के तहत कितनी ईमानदारी से काम होगा यह सभी जानते हैं। पूर्व में कई ऐसी योजनाएं आई और शिप्रा नदी को प्रवाहमान व प्रदूषण मुक्त करने के लिए कई कार्य किए गए। लेकिन फिर भी आज मां शिप्रा प्रदूषित ही हैं। उन्होंने कहा कि मां शिप्रा के उत्थान के लिए किसी को भागीरथ बनने की आवश्यकता है, लेकिन हिंदू समाज सोया हुआ है। शिप्रा के पुजारी सोए हुए हैं। वह सिर्फ मां शिप्रा की आरती कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर रहे हैं, लेकिन ऐसे नहीं चलेगा। पंडे, पुजारी संत और पूरे नगर को मां शिप्रा को प्रवाहमान करने के लिए एक साथ जोड़ना होगा और नगर के लिए एक आंदोलन करना होगा। जिससे कि सरकार बाध्य हो और मां शिप्रा को प्रवाहमान करे। उन्होंने ये भी कहा कि मां शिप्रा के लिए सरकार से अपनी मांगे मनवाकर बड़ा आंदोलन करने की रूपरेखा तैयार की जा रही है, जिसके लिए जल्द ही एक बैठक भी आयोजित की जाएगी। सरकार शिप्रा को प्रवाहमान करने के लिए अपने मुताबिक कार्य करवाती है, लेकिन यह कार्य ठीक से नहीं हो पाता, इसलिए इस बार एक समिति बनाई जाए जो कि इन कार्यों को गुणवत्ता पूर्ण तरीके से पूर्ण करवाएं।
वहीं, महामंडलेश्वर शैलेशानंद ने बताया कि समाज का प्रत्येक वर्ग मां शिप्रा को प्रभावित करने के लिए भागीदारी करे। यह हम सभी का दायित्व है कि मां शिप्रा उज्जैन की जीवनदायिनी हैं और यह नगरी सबसे प्राचीनतम नगरी है। शिप्रा के लिए एक आंदोलन जल्द ही होगा, जिसके लिए प्रत्येक धर्म व संस्था के लोग शामिल होंगे। आपने कहा कि यह आंदोलन पहले निवेदन के रूप में होगा लेकिन धीरे-धीरे यह उग्र होता जाएगा। आपने यह भी बताया कि धर्म नगरी उज्जैन पर्यटन नहीं, देशाटन के लिए है। आदि गुरु शंकराचार्य ने भी देशाटन किया था, पर्यटन नहीं, जहां से कोई वैचारिक अनुभूति उन्हें प्राप्त हुई थी। धार्मिक नगरी उज्जैन को भी आध्यात्मिक नगरी के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। पर्यटन नगरी के रूप में नहीं। यहां के मंदिर व्यापारिक केंद्र के लिए नहीं है, जहां से शासन रुपये अर्जित करने में लगा हुआ है।
वहीं, महामंडलेश्वर ज्ञानदास महाराज ने कहा कि जिस तरह गंभीर डैम के पानी को फिल्टर कर शहरवासियों को पीने के लिए छोड़ा जाता है। उसी तरह मां शिप्रा के जल को नदी में भी प्रवाहमान करना चाहिए, जिससे कि श्रद्धालु इस जल का उपयोग आचमन के रूप में कर सकें। अभी मां शिप्रा की स्थिति काफी दयनीय है, जिसमें वर्तमान में कई नाले मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि मेरे द्वारा मां शिप्रा को प्रवाहमान और प्रदूषण मुक्त करने के लिए पूर्व में भी आंदोलन किया गया था।
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