एक्सप्लेनर: कौन हैं भारतीय मूल की पिया डांडिया, शिक्षिका से अमेरिकी सांसद बनने तक का सफर कैसे तय किया?
शिक्षा के क्षेत्र से शुरुआत कर भारतीय मूल की पिया डांडिया ने व्हाइट हाउस और एप्पल तक का सफर तय किया। अब उन्होंने अमेरिकी राजनीति में भी अपनी जगह बना ली है। आखिर कौन हैं पिया डांडिया और अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में उनकी जीत के पीछे की कहानी क्या है?
विस्तार
अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में भारतीय मूल की पिया डांडिया ने फ्लोरिडा से जीत दर्ज की है। पिया ने रिपब्लिकन उम्मीदवार को हराकर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में जगह बनाई है।
ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर कौन हैं पिया डांडिया? अभी क्यों चर्चा में है? राजनीति में कैसे आईं? उनकी जीत क्यों खास है?
कौन हैं पिया डांडिया?
पिया डांडिया भारतीय मूल की अमेरिकी नेता हैं। उनका का जन्म और पालन-पोषण अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य के पाम बीच काउंटी में हुआ। उनके माता-पिता भारत से अमेरिका गए थे। उनके पिता राजस्थान से ताल्लुक रखते हैं और पेशे से डॉक्टर हैं। पिया की उम्र 36 साल है और उनका एक बेटा भी है। पिया के इंस्टाग्राम पर करीब 8000 फॉलोअर्स हैं, फेसबुक पर 3000 और एक्स पर 2400 फॉलोअर्स हैं।
अभी क्यों चर्चा में हैं?
अमेरिका में 3 नवंबर को मध्यावधि चुनाव के लिए मतदान हुआ था और 4 नवंबर को इसके नतीजे आ रहे हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हर चार साल में होते हैं, जबकि राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच दो साल बाद मध्यावधि चुनाव कराए जाते हैं। इनमें प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 100 में से 35 सीटों पर चुनाव होता है। इसके अलावा कई राज्यों में गवर्नर भी चुने जाते हैं।
पिया ने फ्लोरिडा के 22वें संसदीय क्षेत्र से डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और रिपब्लिकन उम्मीदवार केसी असकर को हराया। पिया डांडिया को 51.9 फीसदी वोट मिले, जबकि केसी असकर को 48.1 फीसदी वोट मिले। पिया राजनीति में आने से पहले शिक्षिका, स्कूल की प्रधानाचार्या, व्हाइट हाउस फेलो और एप्पल में काम कर चुकी हैं।
हार्वर्ड में पढ़ाई के दौरान दिल्ली की झुग्गियों में बच्चों को पढ़ाया
पिया ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। कॉलेज के दौरान गर्मियों की छुट्टियों में वह दिल्ली आती थीं और यहां झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले बच्चों के साथ काम करती थीं।
18 साल की उम्र में उन्होंने कई बच्चों के साथ मिलकर एक नाटक तैयार कराया। इस नाटक के जरिए बच्चों और आसपास के समुदाय को एक साथ लाने की कोशिश की गई। उन्होंने बच्चों को अंग्रेजी भी पढ़ाई।
पिया के मुताबिक, इस अनुभव ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्हें महसूस हुआ कि शिक्षा बच्चों को उन संभावनाओं से परिचित करा सकती है, जिनके बारे में उन्होंने पहले कभी सोचा भी नहीं होता। इसी अनुभव ने उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के लिए प्रेरित किया।
शिक्षिका से शुरुआत, 28 साल की उम्र में बनीं प्रधानाचार्या
उनकी कैंपेन वेबसाइट के अनुसार, दिल्ली में बच्चों के साथ काम करने के बाद पिया ने अमेरिका में शिक्षा के क्षेत्र में करियर शुरू किया। उन्होंने 'टीच फॉर अमेरिका' प्रोग्राम के तहत शिक्षिका के रूप में काम किया। यह प्रोग्राम कम आय वाले इलाकों के स्कूलों में शिक्षकों को भेजता है।
इसके बाद उन्होंने न्यूयॉर्क के हार्लेम इलाके में एक उच्च माध्यमिक विद्यालय की स्थापना की और उसकी प्रधानाचार्या बनीं। उस समय उनकी उम्र महज 28 साल थी। इस तरह वह अमेरिका की सबसे कम उम्र की उच्च माध्यमिक विद्यालय की प्रधानाचार्यों में शामिल हुईं।
उनके विद्यालय के 86 फीसदी विद्यार्थी कम आय वाले परिवारों से आते थे। पिया के नेतृत्व में विद्यालय की पढ़ाई पूरी करने वाले 100 फीसदी विद्यार्थियों को कॉलेज में दाखिला मिला।
स्कूल से व्हाइट हाउस तक कैसे पहुंचीं?
शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के बाद पिया को प्रतिष्ठित व्हाइट हाउस फेलोशिप के लिए चुना गया। यह अमेरिकी सरकार का एक कार्यक्रम है, जिसके तहत प्रतिभाशाली युवाओं और पेशेवरों को वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के साथ काम करने का अवसर मिलता है।
पिया ने व्हाइट हाउस की घरेलू नीति परिषद और अमेरिकी शिक्षा विभाग में काम किया। उन्होंने डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों सरकारों के दौरान अपनी जिम्मेदारियां निभाईं।
इस दौरान उन्हें सरकारी नीतियों और प्रशासन को करीब से समझने का मौका मिला। उनका काम शिक्षा, रोजगार, बच्चों की देखभाल और सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं जैसे मुद्दों से भी जुड़ा रहा।
व्हाइट हाउस के बाद एप्पल में संभाली जिम्मेदारी
सरकारी सेवा के बाद पिया ने प्रौद्योगिकी कंपनी एप्पल में काम किया। यहां उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़े कामों का नेतृत्व किया। उनकी जिम्मेदारी राज्य सरकारों के साथ मिलकर शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी व्यवस्थाओं को आधुनिक बनाने की थी।
- विद्यालयों में आईपैड के इस्तेमाल से बच्चों को गणित जैसे विषय आसानी से सिखाने में मदद की।
- सामाजिक कार्यकर्ताओं और पुलिसकर्मियों जैसे सरकारी कर्मचारियों के काम को आसान बनाने के लिए तकनीकी समाधान तैयार करने में योगदान दिया।
- शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया।
इस तरह पिया ने शिक्षा, सरकारी प्रशासन और निजी क्षेत्र में काम करने का अनुभव हासिल किया।
राजनीति में आने का फैसला क्यों किया?
एप्पल में काम करने के बाद पिया अपने गृह क्षेत्र फ्लोरिडा लौट आईं। उनका कहना था कि वह उस समुदाय को कुछ वापस देना चाहती हैं, जिसने उन्हें आगे बढ़ने का अवसर दिया।
उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस का चुनाव लड़ने का फैसला किया। पिया के मुताबिक, वह देश के लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना और आम परिवारों के लिए बेहतर भविष्य तैयार करना चाहती हैं। उनके चुनावी अभियान में पांच प्रमुख प्राथमिकताएं शामिल थीं।
1. फ्लोरिडा के लोगों का खर्च कम करना
2. वॉशिंगटन की व्यवस्था में सुधार
3. अमेरिका के वादे की रक्षा
4. मजबूत स्कूल और बेहतर भविष्य
5. व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा
क्यों बदलना पड़ा चुनावी क्षेत्र?
पिया ने 2025 में चुनावी राजनीति में कदम रखा। शुरुआत में उन्होंने फ्लोरिडा के 21वें संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तैयारी की थी। यहां उनका मुकाबला रिपब्लिकन सांसद ब्रायन मास्ट से होना था।
हालांकि, 2026 में फ्लोरिडा की रिपब्लिकन बहुमत वाली विधानसभा ने राज्य के संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं का नया नक्शा तैयार किया। इसके बाद पिया को अपना चुनाव क्षेत्र बदलना पड़ा और उन्होंने नए 22वें संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ने का फैसला किया।
इस सीट का प्रतिनिधित्व पहले लंबे समय तक डेमोक्रेटिक सांसद लोइस फ्रेंकल करती थीं। नए परिसीमन के बाद वह पड़ोसी सीट से चुनाव लड़ने चली गईं। इससे 22वां संसदीय क्षेत्र चुनाव के लिए खाली हो गया।
18 अगस्त 2026 को पिया ने डेमोक्रेटिक पार्टी का प्राथमिक चुनाव जीता। इसके बाद 3 नवंबर को हुए आम चुनाव में उनका मुकाबला रिपब्लिकन उम्मीदवार और कारोबारी केसी असकर से हुआ।
चुनावी सीमाएं बदलने के बावजूद कैसे जीतीं पिया?
फ्लोरिडा में चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदलने का मुद्दा इस चुनाव में काफी अहम रहा। नए नक्शे के तहत 22वें संसदीय क्षेत्र में पाम बीच काउंटी और तीन अन्य काउंटियों के कुछ हिस्सों को शामिल किया गया। आरोप लगा कि इस बदलाव का उद्देश्य डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रभाव को कम करना और रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति मजबूत करना था।
नए चुनाव क्षेत्र में रिपब्लिकन पार्टी को बढ़त मिलने की उम्मीद थी। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में इस क्षेत्र में डोनाल्ड ट्रंप को करीब 11 प्रतिशत अंकों की बढ़त मिली थी, जबकि 2020 में जो बाइडन को करीब तीन प्रतिशत अंकों की बढ़त मिली थी।
चुनाव विश्लेषक संस्था कुक पॉलिटिकल रिपोर्ट ने भी शुरुआत में इस सीट को रिपब्लिकन के पक्ष में झुका हुआ बताया था। बाद में मुकाबले को कांटे की टक्कर वाला माना गया।
ऐसे में पिया की जीत डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए अहम रही। इसे ट्रंप की उस रणनीति के झटके के तौर पर भी देखा गया, जिसके तहत चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदलकर रिपब्लिकन पार्टी को फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई थी।
चुनाव प्रचार के लिए कहां से आया पैसा?
- पिया ने फेसबुक पर बताया था कि उनके चुनावी अभियान को 24 हजार लोगों से 39 लाख डॉलर का चंदा मिला।
- इनमें 93 फीसदी लोगों ने 100 डॉलर या उससे कम का योगदान दिया था।
- पिया ने छोटे-छोटे दान देने वाले समर्थकों की भागीदारी को अपने चुनावी अभियान का जमीनी समर्थन बताया था।
भारतीय मूल के अमेरिकियों के लिए क्यों अहम है यह जीत?
- पिया की जीत अमेरिकी संसद में भारतीय मूल के लोगों के प्रतिनिधित्व के लिहाज से अहम है।
- 1956 में दलिप सिंह सौंध अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के लिए चुने जाने वाले भारतीय मूल के पहले व्यक्ति बने थे। इसके बाद कई भारतीय मूल के अमेरिकी नेता संसद तक पहुंचे।
- पिया की जीत के साथ इस प्रतिनिधित्व में एक और नाम जुड़ गया है। उनकी जीत को भारतीय मूल के अमेरिकी समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।