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क्या है वॉर पावर्स एक्ट?: जो निक्सन से ओबामा तक के लिए बना चुनौती, अब 1 मई को ट्रंप करेंगे सामना
आईएएनएस, वॉशिंगटन
Published by: Rahul Kumar
Updated Thu, 30 Apr 2026 04:43 PM IST
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डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति
- फोटो : एक्स@WhiteHouse
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई क्या 1 मई 2026 के बाद जारी रहेगी? सवाल यह है कि क्या 1 मई के बाद भी अमेरिका यह कार्रवाई जारी रख सकता है या उसे रुकना होगा!
अमेरिका ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य हमला शुरू किया था, लेकिन इसकी अमेरिकी संसद को इसकी औपचारिक जानकारी 2 मार्च को दी गई। यही तारीख इस पूरे मामले में निर्णायक बनती है, क्योंकि इस आधार पर 60 दिन की समयसीमा तय होती है। यह समयसीमा अमेरिकी कानून 'वॉर पावर रेजोल्यूशन' के तहत आती है।
1973 में लागू इस कानून का उद्देश्य राष्ट्रपति की युद्ध संबंधी शक्तियों को सीमित करना और कांग्रेस की भूमिका को मजबूत करना था। इसके अनुसार, यदि राष्ट्रपति बिना संसद की मंजूरी के सेना का इस्तेमाल करते हैं, तो उन्हें 60 दिनों के भीतर कांग्रेस से इसकी अनुमति लेनी होती है। इस मामले में 2 मार्च से गिनती करने पर 1 मई वह अंतिम तारीख बनती है, जिसके भीतर ट्रंप प्रशासन को संसद की मंजूरी हासिल करनी होगी। अगर ऐसा नहीं होता, तो कानून के मुताबिक सैन्य कार्रवाई समाप्त करनी चाहिए।
मंजूरी हासिल करने के लिए अमेरिकी संसद—यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट—दोनों में साधारण बहुमत आवश्यक होता है। लेकिन, अब तक इस कार्रवाई को लेकर कोई औपचारिक मंजूरी नहीं मिली है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप की अपनी पार्टी के कम से कम 10 सांसद इस युद्ध के खिलाफ हैं, जिससे बहुमत जुटाना कठिन हो सकता है।
हालांकि कानून स्पष्ट रूप से 60 दिन की सीमा तय करता है, लेकिन व्यवहार में स्थिति इतनी सीधी नहीं रही है। कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने अतीत में वॉर पावल रेजोल्यूशन के प्रावधानों को पूरी तरह नहीं माना है। इनमें निक्सन, रोनाल्ड रीगन, जॉर्ज डब्ल्यू बुश, बिल क्लिंटन, ओबामा और खुद ट्रंप रहे हैं। उनका तर्क रहा है कि यह कानून राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों में हस्तक्षेप करता है, खासकर जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा और त्वरित सैन्य कार्रवाई की हो।
यदि कांग्रेस से मंजूरी नहीं मिलती, तो भी राष्ट्रपति किसी न किसी कानूनी व्याख्या या राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क के आधार पर सैन्य कार्रवाई जारी रखने की कोशिश कर सकते हैं। इससे कार्यपालिका और विधायिका के बीच टकराव की स्थिति भी बन सकती है।
1 मई की समयसीमा केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद अहम बन गई है। जिसमें ये देखना वाकई दिलचस्प होगा कि ट्रंप प्रशासन कांग्रेस से समर्थन हासिल करने में कामयाब रहता है या नहीं—और अगर नहीं, तो क्या वह कानून का पालन करेगा या फिर पहले की तरह परंपरा को चुनौती देने में यकीन रखेगा। क्या इस बार कांग्रेस और व्हाइट हाउस के बीच सहमति बनती है या फिर एक नया संवैधानिक विवाद खड़ा हो जाएगा?
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अमेरिका ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य हमला शुरू किया था, लेकिन इसकी अमेरिकी संसद को इसकी औपचारिक जानकारी 2 मार्च को दी गई। यही तारीख इस पूरे मामले में निर्णायक बनती है, क्योंकि इस आधार पर 60 दिन की समयसीमा तय होती है। यह समयसीमा अमेरिकी कानून 'वॉर पावर रेजोल्यूशन' के तहत आती है।
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1973 में लागू इस कानून का उद्देश्य राष्ट्रपति की युद्ध संबंधी शक्तियों को सीमित करना और कांग्रेस की भूमिका को मजबूत करना था। इसके अनुसार, यदि राष्ट्रपति बिना संसद की मंजूरी के सेना का इस्तेमाल करते हैं, तो उन्हें 60 दिनों के भीतर कांग्रेस से इसकी अनुमति लेनी होती है। इस मामले में 2 मार्च से गिनती करने पर 1 मई वह अंतिम तारीख बनती है, जिसके भीतर ट्रंप प्रशासन को संसद की मंजूरी हासिल करनी होगी। अगर ऐसा नहीं होता, तो कानून के मुताबिक सैन्य कार्रवाई समाप्त करनी चाहिए।
मंजूरी हासिल करने के लिए अमेरिकी संसद—यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट—दोनों में साधारण बहुमत आवश्यक होता है। लेकिन, अब तक इस कार्रवाई को लेकर कोई औपचारिक मंजूरी नहीं मिली है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप की अपनी पार्टी के कम से कम 10 सांसद इस युद्ध के खिलाफ हैं, जिससे बहुमत जुटाना कठिन हो सकता है।
हालांकि कानून स्पष्ट रूप से 60 दिन की सीमा तय करता है, लेकिन व्यवहार में स्थिति इतनी सीधी नहीं रही है। कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने अतीत में वॉर पावल रेजोल्यूशन के प्रावधानों को पूरी तरह नहीं माना है। इनमें निक्सन, रोनाल्ड रीगन, जॉर्ज डब्ल्यू बुश, बिल क्लिंटन, ओबामा और खुद ट्रंप रहे हैं। उनका तर्क रहा है कि यह कानून राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों में हस्तक्षेप करता है, खासकर जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा और त्वरित सैन्य कार्रवाई की हो।
यदि कांग्रेस से मंजूरी नहीं मिलती, तो भी राष्ट्रपति किसी न किसी कानूनी व्याख्या या राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क के आधार पर सैन्य कार्रवाई जारी रखने की कोशिश कर सकते हैं। इससे कार्यपालिका और विधायिका के बीच टकराव की स्थिति भी बन सकती है।
1 मई की समयसीमा केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद अहम बन गई है। जिसमें ये देखना वाकई दिलचस्प होगा कि ट्रंप प्रशासन कांग्रेस से समर्थन हासिल करने में कामयाब रहता है या नहीं—और अगर नहीं, तो क्या वह कानून का पालन करेगा या फिर पहले की तरह परंपरा को चुनौती देने में यकीन रखेगा। क्या इस बार कांग्रेस और व्हाइट हाउस के बीच सहमति बनती है या फिर एक नया संवैधानिक विवाद खड़ा हो जाएगा?
