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अंतर्कथा: सभ्यता मिटाने की धमकी से होर्मुज में फंसने तक, आखिर युद्ध से मिला क्या

न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: Nitin Gautam Updated Thu, 09 Apr 2026 04:49 AM IST
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सार

ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम हो गया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर इस युद्ध से क्या मिला क्योंकि अमेरिका और इस्राइल ने जिस उद्देश्य से ईरान पर हमला किया था, वे तो अभी भी पूरे नहीं हुए हैं। आइए जानते हैं कि इस युद्ध का क्या असर होगा। 

Iran israel war from civilization destruction to hormuz strait crisis output of west asia crisis
डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति - फोटो : ANI
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विस्तार

अमेरिका-इस्राइल युद्ध का एक भी मकसद पूरा करने में नाकाम रहे। तख्ता पलट नहीं हुआ। खामनेई की जगह बेटे मोजतबा ने ली। परमाणु कार्यक्रम नहीं रुका, न मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लग सकी। ईरान का दावा सही है, तो 15 हजार मिसाइलें अब भी उसके पास हैं। तमाम गाली-गलौज, धमकियों, सैन्य क्षमता खत्म करने से सभ्यता मिटाने की धमकियों के बावजूद ट्रंप ईरान की शर्तों पर होर्मुज के मुहाने आकर फंस गए।
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विजेता की तरह उभरा ईरान
ईरान इसलिए विजेता की तरह उभरा, क्योंकि उसने दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका और बड़ी सैन्यशक्ति इस्राइल के हमले झेल लिए। सर्वोच्च नेता समेत सरकार एवं सैन्य नेतृत्व की कई कतारें खो देने के बावजूद मजबूती से लड़ा। अंत में होर्मुज अपनी शर्तों पर खोलकर जंग रोकने के लिए माना। जो होर्मुज युद्ध के कारणों में कहीं नहीं था, ईरान ने उसे हथियार बनाया और अमेरिका को बेबस कर दिया। कई मोर्चों पर बड़े नुकसान के बाद भी, पश्चिम एशिया में ईरान बड़ी ताकत की तरह उभरा।  
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अमेरिका के दोस्त खाड़ी देशों को भी सबक
पश्चिम एशिया में अमेरिका के दोस्त खाड़ी देशों को महत्वपूर्ण ठिकानों को भी निशाना बनाकर ईरान ने ऐसा सबक सिखाया कि उनमें असुरक्षा का भाव घर कर गया। वहां अब हथियारों की नई होड़ शुरू होना तय है। अपनी सुरक्षा के लिए सभी देश नई रणनीति पर काम करेंगे। खुद ट्रंप को भी कहना पड़ा कि उन्हें शुरू में अंदाजा नहीं था कि ईरान खाड़ी देशों पर हमले करेगा।

हिजबुल्ला में ही उलझा इस्राइल
ईरान ने हिजबुल्ला और हूती विद्रोहियों को सक्रिय कर इस्राइल के खिलाफ नए मोर्चे खोल दिए। इस्राइल को लेबनान पर ज्यादा फोकस होना पड़ा। इस्राइल ने साफ भी कर दिया कि संघर्ष विराम में लेबनान शामिल नहीं है, उसके खिलाफ अभियान जारी रहेगा।

वैश्विक वर्चस्व को झटका, नाटो  से बिगड़े रिश्ते
युद्ध ने अमेरिका के वैश्विक वर्चस्व को भी बड़ा झटका दिया। होर्मुज के लिए नाटो देशों ने ट्रंप का साथ देने से खुलकर इन्कार किया, तो स्पेन-इटली ने उसके विमानों को उड़ान भरने तक की इजाजत नहीं दी। उनका कहना था, युद्ध से पहले होर्मुज खुला ही था, तो युद्ध शुरू ही क्यों किया? ईरानी प्रस्ताव को पहले वार्ता का आधार बताने, फिर मुकरने के पीछे इज्जत बचाने का दांव है।

पाकिस्तान को नई पहचान
अमेरिका ने पाकिस्तान के जरिये अपनी इज्जत बचाने का प्रयास किया। इज्जत तो नहीं बची, पर पाकिस्तान को नई जिओ-पॉलिटिकल पहचान मिल गई। प. एशिया के तमाम देश अमेरिका के साथ थे, लिहाजा ईरान ने भी मंजूर कर लिया। चीन व रूस की भूमिका इसलिए अहम रही कि उन्होंने सुरक्षा परिषद में बहरीन का होर्मुज खोलने का प्रस्ताव निरस्त कराया। पाकिस्तान यहां गैरहाजिर रहा।

शुरू की हिचकिचाहट के बाद भारत ने ईरान को साधा
भारत शुरुआत में असमंजस में रहा, लेकिन जल्दी ही कूटनीतिक तरीके से ईरान को साधा। इस्राइल और ईरान में संतुलन साधना, निश्चय ही बड़ी चुनौती थी। हालांकि, अमेरिका से दूरी बनाए रखी। लेकिन, होर्मुज से अपने जहाज निकलवाए, घरेलू मोर्चे पर हालात संभाले, विपक्ष को ज्यादा माैके नहीं दिए।


 
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