Sri Lanka: कर्ज राहत के मुद्दे पर चीन से टकराने के मूड में हैं श्रीलंका के राष्ट्रपति विक्रमसिंघे?
टोक्यो में आयोजित फ्यूचर ऑफ एशिया फोरम में भाग लेने वहां गए विक्रमसिंघे ने गुरुवार को दिए एक इंटरव्यू में कहा- ‘हम चाहते थे कि चीन साझा मंच पर आए। लेकिन चीन ने इनकार कर दिया। उसने कहा कि वह अलग से बातचीत करना पसंद करेगा।’
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क्या श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे अब चीन से टकराव के मूड में आ रहे हैं? गुरुवार को दिए उनके एक बयान से यहां कूटनीतिक हलकों में यह सवाल उठा है। विक्रमसिंघे ने कहा कि कर्ज घटाने के लिए श्रीलंका सरकार विभिन्न देशों से जो बातचीत चला रही है, उसमें चीन को ‘अपवाद’ नहीं माना जाएगा। उन्होंने कहा कि चीन को बहुराष्ट्रीय ढांचे का हिस्सा बनना पड़ेगा। द्विपक्षीय ऋण के लिहाज से श्रीलंका को सबसे कर्ज चीन ने ही दिया है।
इस महीने की शुरुआत में श्रीलंका सरकार ने द्विपक्षीय कर्ज राहत के लिए विभिन्न देशों से बातचीत की थी। इन देशों में भारत, जापान और फ्रांस भी शामिल थे। लेकिन चीन ने इस वार्ता में शामिल होने से इनकार कर दिया। टोक्यो में आयोजित फ्यूचर ऑफ एशिया फोरम में भाग लेने वहां गए विक्रमसिंघे ने गुरुवार को दिए एक इंटरव्यू में कहा- ‘हम चाहते थे कि चीन साझा मंच पर आए। लेकिन चीन ने इनकार कर दिया। उसने कहा कि वह अलग से बातचीत करना पसंद करेगा।’
वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम को दिए इंटरव्यू में विक्रमसिंघे ने इस संभावना का खंडन किया कि चीन के साथ उनकी सरकार अलग तरह का कोई ऐसा करार करेगी, जो चीन के फायदे में हो। उन्होंने दो टूक कहा- ‘हम अलग से कोई करार नहीं करेंगे। किसी एक पक्ष को लाभ नहीं देंगे। हम समान सिद्धांतों के आधार पर काम करेंगे।’
श्रीलंका पर अभी 80.7 बिलियन डॉलर का कुल विदेशी कर्ज है। इसमें द्विपक्षीय कर्ज का हिस्सा सिर्फ 11.1 बिलियन डॉलर है। द्विपक्षीय ऋण के भीतर चीन का हिस्सा लगभग 40 फीसदी है। इसके बावजूद चीन ने मई के आरंभ में हुई वार्ता में भाग नहीं लिया। हालांकि वहां उसकी पर्यवेक्षक के रूप में मौजूदगी रही। वैसे कई विशेषज्ञों की राय है कि श्रीलंका की असली मुसीबत द्विपक्षीय ऋण नहीं, बल्कि वह व्यापारिक (कॉमर्शियल) ऋण है, जो उनसे पश्चिम के प्राइवेट सेक्टर के कर्जदाताओं से ऊंची ब्याज दर पर लिए गए हैं। ये कर्जदाता किसी तरह की रियायत देंगे, इस बात के अभी तक कोई संकेत नहीं हैं।
आर्थिक हालात बिगड़ने के बाद साल भर से कुछ अधिक समय पहले श्रीलंका सरकार कर्ज चुकाने में अक्षम हो गई थी। अमेरिका में बढ़ी ब्याज दरों के कारण डॉलर में लिए गए ज्यादातर कर्ज की मात्रा तब बढ़ने लगी थी, जिससे कर्ज चुकाना उसके लिए मुश्किल हो गया। इसके अलावा चीन से इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण के सिलसिले में लिए गए कर्जों को चुकाने में भी श्रीलंका अक्षम हो गया।
श्रीलंका में महंगाई की दर अभी भी बहुत ऊंची है और यह वहां के लोगों की परेशानी का एक बड़ा कारण बनी हुई है। बीते मार्च में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में 49.2 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई थी। विक्रमसिंघे ने कहा- ‘श्रीलंका के सेंट्रल बैंक ने मुझे आश्वासन दिया है कि मुद्रास्फीति की दर इस साल के अंत तक एक अंक में (यानी दस प्रतिशत से कम) आ जाएगी।’ उन्होंने भरोसा जताया कि इस लक्ष्य को हासिल कर लिया जाएगा।
विक्रमसिंघे ने यह विश्वास भी जताया कि घरेलू और विदेशी दोनों कर्जों में रियायत के लिए अगले सितंबर तक बातचीत पूरी हो जाएगी। उन्होंने कहा- ‘हमारी दो मांगें हैः कर्जदाता हमारी देनदारी में कटौती करें और बचे कर्ज को चुकाने के लिए हमें अधिक समय दें।’
