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संयुक्त राष्ट्र: आपदाओं की तबाही में 43% घर शामिल, हर साल करोड़ों की चपत; लाखों लोगों की जिंदगी भी प्रभावित

Tue, 27 Oct 2026 07:09 AM IST
शिवम गर्ग अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: शिवम गर्ग Updated Tue, 27 Oct 2026 07:09 AM IST
सार

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान में घरों की हिस्सेदारी 43 प्रतिशत है। घरों के उजड़ने से परिवारों को विस्थापन, रोजगार और शिक्षा से जुड़ी समस्याएं झेलनी पड़ती हैं। ऐसे में घरों को सुरक्षित बनाना क्यों जरूरी है? जानिए...

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Natural Disasters: Homes Account for 43% of Direct Economic Losses, Annual Damage Worth $228 Billion
प्राकृतिक आपदाओं की मार - फोटो : Amar Ujala Graphics

विस्तार

बाढ़, भूकंप, चक्रवात और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं में सबसे बड़ी कीमत लोगों को अपने घरों के उजड़ने के रूप में चुकानी पड़ती है। घरों को नुकसान का मतलब सिर्फ संपत्ति का नष्ट होना नहीं, बल्कि परिवारों की जमा-पूंजी, आजीविका और बच्चों की पढ़ाई पर संकट आना भी है।

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संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, आपदाओं से होने वाले दर्ज प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान में 43 फीसदी हिस्सा घरों को हुए नुकसान का है। वहीं, बाढ़, चक्रवात, भूकंप और सुनामी से दुनिया भर में आवासीय इमारतों को हर साल औसतन करीब 22,800 करोड़ डॉलर (2.16 लाख करोड़ रुपये) का नुकसान होने का अनुमान है।
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संयुक्त राष्ट्र के अनुसार इन चार आपदाओं से इमारतों को होने वाले कुल अनुमानित सालाना नुकसान में आवासीय भवनों की हिस्सेदारी करीब 53 फीसदी है। ये आंकड़े बताते हैं कि आपदा से होने वाली तबाही कम करने के लिए घरों को सुरक्षित बनाना और परिवारों को संभावित खतरों से निपटने के लिए तैयार करना कितना जरूरी है।
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झेलना पड़ता है विस्थापन का दंश
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक आपदाओं से प्रभावित बताए गए लोगों में करीब आधे ऐसे थे, जिनके घर क्षतिग्रस्त हुए या पूरी तरह तबाह हो गए। घर नष्ट होने के बाद परिवारों को विस्थापन, रोजगार के नुकसान और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बच्चों की शिक्षा बाधित होती है और अस्थायी ठिकानों पर लंबे समय तक रहने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है।

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