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तकनीक: अब चांद की जानलेवा धूल नहीं बनेगी अंतरिक्ष यात्रियों के लिए समस्या, नासा ने विकसित की नई प्रणाली
अमर उजाला नेटवर्क
Published by: लव गौर
Updated Tue, 20 Jan 2026 05:32 AM IST
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सार
अपोलो मिशन के दौर में स्पेससूट खराब करने, उपकरणों को जाम करने और फेफड़ों तक को नुकसान पहुंचाने वाली चंद्र धूल से निपटने के लिए नासा ने एक नई, अत्याधुनिक तकनीक विकसित कर ली है।
फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
चांद पर कदम रखते ही जो धूल कभी अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सबसे बड़ा खतरा मानी जाती थी, अब वही धूल जल्द ही अतीत बन सकती है। अपोलो मिशन के दौर में स्पेससूट खराब करने, उपकरणों को जाम करने और फेफड़ों तक को नुकसान पहुंचाने वाली चंद्र धूल से निपटने के लिए नासा ने एक नई, अत्याधुनिक तकनीक विकसित कर ली है। यह तकनीक बिजली की मदद से धूल को सतहों से दूर उड़ा देती है।
नासा अब इस प्रणाली को और बेहतर बनाने में जुटा है, ताकि आर्टेमिस मिशन के तहत चांद पर लंबे समय तक रहने, अधिक वैज्ञानिक प्रयोग करने और स्थायी मौजूदगी की राह आसान हो सके। नासा की ओर से शनिवार को दी गई जानकारी के अनुसार चांद की सतह पर मौजूद धूल साधारण मिट्टी नहीं है। यह अरबों साल पुराने ज्वालामुखीय पत्थरों और कांच के बेहद महीन, नुकीले कणों से बनी है, जो माइक्रो मीटियोराइट टक्करों से टूट-टूटकर तैयार हुए हैं। यह धूल हल्की सी हलचल या विकिरण मिलने पर विद्युत आवेशित हो जाती है और हवा में तैरने लगती है।यही कारण है कि यह अंतरिक्ष यात्रियों के स्पेससूट, औजारों और उपकरणों से गोंद की तरह चिपक जाती है।
अपोलो मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों ने इस धूल को सांस के साथ अंदर लिया, जिससे उन्हें सांस संबंधी गंभीर दिक्कतें हुईं, जिन्हें ‘लूनर हे फीवर’ कहा गया। नासा के रिकॉर्ड के अनुसार, यह धूल वैक्यूम सील, स्पेससूट के जूते और अन्य जरूरी उपकरणों को तेजी से खराब कर देती थी। सफाई के लिए इस्तेमाल किए गए ब्रश भी बेअसर साबित हुए, क्योंकि धूल और ज्यादा चिपक जाती थी।
विज्ञान कैसे करता है काम
ईडीएस दो भौतिक बलों का इस्तेमाल करती है। एक बल समान विद्युत आवेश वाले कणों को एक-दूसरे से दूर धकेलता है, जबकि दूसरा बल धूल के कणों के भीतर अस्थायी ध्रुव बनाकर उन्हें विद्युत क्षेत्र से बाहर निकाल देता है। इन दोनों के संयुक्त प्रभाव से सतह लगभग खुद-ब-खुद साफ हो जाती है। नासा के परीक्षणों में यह तकनीक 99 प्रतिशत तक धूल हटाने में सफल रही है।
आर्टेमिस मिशन और नई चुनौती
नेशनल ज्योग्राफिक में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसारअब नासा आर्टेमिस कार्यक्रम के तहत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर स्थायी मौजूदगी की योजना बना रहा है। ऐसे में धूल की समस्या और भी गंभीर हो जाती है। लंबे समय तक वहां रहने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सोलर पैनल, तार, मून रोवर और स्पेससूट का सुरक्षित रहना बेहद जरूरी है। बिना प्रभावी समाधान के, यह धूल मिशन को विफल तक कर सकती है।
ये भी पढ़ें: Moon: जीवन की उत्पत्ति से लेकर जलवायु परिवर्तन तक धरती के हर पहलू को प्रभावित करता है चांद, पढ़ें पूरी खबर
नासा का नया समाधान: बिजली से चलने वाली ढाल
इसी चुनौती से निपटने के लिए नासा ने ‘इलेक्ट्रोडायनामिक डस्ट शील्ड’ यानी ईडीएस विकसित किया है। यह एक पारदर्शी परत होती है, जिसमें बेहद पतले इलेक्ट्रोड लगे होते हैं। इन्हें कैमरा लेंस, सोलर पैनल, थर्मल रेडिएटर या स्पेससूट के कपड़े तक में जोड़ा जा सकता है। स्विच ऑन करते ही यह प्रणाली विद्युत क्षेत्र बनाती है, जो चिपकी हुई धूल को सतह से दूर उड़ा देती है।
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नासा अब इस प्रणाली को और बेहतर बनाने में जुटा है, ताकि आर्टेमिस मिशन के तहत चांद पर लंबे समय तक रहने, अधिक वैज्ञानिक प्रयोग करने और स्थायी मौजूदगी की राह आसान हो सके। नासा की ओर से शनिवार को दी गई जानकारी के अनुसार चांद की सतह पर मौजूद धूल साधारण मिट्टी नहीं है। यह अरबों साल पुराने ज्वालामुखीय पत्थरों और कांच के बेहद महीन, नुकीले कणों से बनी है, जो माइक्रो मीटियोराइट टक्करों से टूट-टूटकर तैयार हुए हैं। यह धूल हल्की सी हलचल या विकिरण मिलने पर विद्युत आवेशित हो जाती है और हवा में तैरने लगती है।यही कारण है कि यह अंतरिक्ष यात्रियों के स्पेससूट, औजारों और उपकरणों से गोंद की तरह चिपक जाती है।
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अपोलो मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों ने इस धूल को सांस के साथ अंदर लिया, जिससे उन्हें सांस संबंधी गंभीर दिक्कतें हुईं, जिन्हें ‘लूनर हे फीवर’ कहा गया। नासा के रिकॉर्ड के अनुसार, यह धूल वैक्यूम सील, स्पेससूट के जूते और अन्य जरूरी उपकरणों को तेजी से खराब कर देती थी। सफाई के लिए इस्तेमाल किए गए ब्रश भी बेअसर साबित हुए, क्योंकि धूल और ज्यादा चिपक जाती थी।
विज्ञान कैसे करता है काम
ईडीएस दो भौतिक बलों का इस्तेमाल करती है। एक बल समान विद्युत आवेश वाले कणों को एक-दूसरे से दूर धकेलता है, जबकि दूसरा बल धूल के कणों के भीतर अस्थायी ध्रुव बनाकर उन्हें विद्युत क्षेत्र से बाहर निकाल देता है। इन दोनों के संयुक्त प्रभाव से सतह लगभग खुद-ब-खुद साफ हो जाती है। नासा के परीक्षणों में यह तकनीक 99 प्रतिशत तक धूल हटाने में सफल रही है।
आर्टेमिस मिशन और नई चुनौती
नेशनल ज्योग्राफिक में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसारअब नासा आर्टेमिस कार्यक्रम के तहत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर स्थायी मौजूदगी की योजना बना रहा है। ऐसे में धूल की समस्या और भी गंभीर हो जाती है। लंबे समय तक वहां रहने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सोलर पैनल, तार, मून रोवर और स्पेससूट का सुरक्षित रहना बेहद जरूरी है। बिना प्रभावी समाधान के, यह धूल मिशन को विफल तक कर सकती है।
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नासा का नया समाधान: बिजली से चलने वाली ढाल
इसी चुनौती से निपटने के लिए नासा ने ‘इलेक्ट्रोडायनामिक डस्ट शील्ड’ यानी ईडीएस विकसित किया है। यह एक पारदर्शी परत होती है, जिसमें बेहद पतले इलेक्ट्रोड लगे होते हैं। इन्हें कैमरा लेंस, सोलर पैनल, थर्मल रेडिएटर या स्पेससूट के कपड़े तक में जोड़ा जा सकता है। स्विच ऑन करते ही यह प्रणाली विद्युत क्षेत्र बनाती है, जो चिपकी हुई धूल को सतह से दूर उड़ा देती है।