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Pakistan: अमेरिका की मदद से क्या अब लीबिया में सुलह करा रहा पाकिस्तान, भारत के लिए ये क्यों है चिंताजनक बात?
Tue, 07 Jul 2026 01:09 PM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: नितिन गौतम
Updated Tue, 07 Jul 2026 01:09 PM IST
सार
अमेरिका की चापलूसी कर पाकिस्तान अपनी कूटनीतिक पहुंच को मजबूत करने में जुटा है। ईरान युद्ध में मध्यस्थता के बाद अब पाकिस्तान के लीबिया गृहयुद्ध में भी मध्यस्थता की कोशिश करने की रिपोर्ट है। आखिर इससे भारत को क्या नुकसान है और ये कैसे पाकिस्तान को फायदा पहुंचा सकता है? आइए जानें
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पाकिस्तान करा रहा लीबिया में मध्यस्थता।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अमेरिका की सरपरस्ती में पाकिस्तान लगातार अपनी कूटनीतिक प्रोफाइल को मजबूत करने में जुटा है। पहले अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता कराकर पाकिस्तान पहले ही दुनिया की नजरों में आ गया है और अब कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तान लंबे समय से हिंसाग्रस्त लीबिया में भी विद्रोही गुटों के बीच मध्यस्थता कराने की कोशिश कर रहा है। खास बात ये है कि यहां भी पाकिस्तान को अमेरिका का समर्थन मिला हुआ है।
अमेरिका कर रहा पाकिस्तान की मदद?
रायटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान चुपचाप लीबिया के प्रतिद्वंद्वी पूर्वी और पश्चिमी सत्ता केंद्रों के बीच मध्यस्थता कराने की कोशिश कर रहा है। मामले से जुड़े दो पाकिस्तानी सूत्रों के हवाले से यह दावा किया गया है। अगर पाकिस्तान की यह पहल सफल होती है तो वैश्विक कूटनीति में पाकिस्तान की भूमिका और प्रभाव को नई मजबूती मिल सकती है।
पिछले कई महीनों से अमेरिका के नेतृत्व में लीबिया संकट का कूटनीतिक समाधान तलाशने की कोशिशें जारी हैं। साल 2011 में नाटो समर्थित ऑपरेशन के दौरान तत्कालीन शासक मुअम्मर गद्दाफी के सत्ता से बेदखल होने के बाद से लीबिया में गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है और देश पूर्वी और पश्चिमी प्रशासन में बंटा हुआ है।
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ईरान युद्ध में मध्यस्थता के बाद से बढ़े पाकिस्तान के भाव
ये भारत के लिए चिंताजनक क्यों?
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अमेरिका कर रहा पाकिस्तान की मदद?
रायटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान चुपचाप लीबिया के प्रतिद्वंद्वी पूर्वी और पश्चिमी सत्ता केंद्रों के बीच मध्यस्थता कराने की कोशिश कर रहा है। मामले से जुड़े दो पाकिस्तानी सूत्रों के हवाले से यह दावा किया गया है। अगर पाकिस्तान की यह पहल सफल होती है तो वैश्विक कूटनीति में पाकिस्तान की भूमिका और प्रभाव को नई मजबूती मिल सकती है।
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पिछले कई महीनों से अमेरिका के नेतृत्व में लीबिया संकट का कूटनीतिक समाधान तलाशने की कोशिशें जारी हैं। साल 2011 में नाटो समर्थित ऑपरेशन के दौरान तत्कालीन शासक मुअम्मर गद्दाफी के सत्ता से बेदखल होने के बाद से लीबिया में गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है और देश पूर्वी और पश्चिमी प्रशासन में बंटा हुआ है।
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ईरान युद्ध में मध्यस्थता के बाद से बढ़े पाकिस्तान के भाव
- इस साल पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसकी सार्वजनिक तौर पर ट्रंप प्रशासन ने भी तारीफ की थी। एक पाकिस्तानी सूत्र ने दावा किया कि लीबिया को लेकर पाकिस्तान की पहल के बारे में अमेरिका जानता है और वह भी इसमें शामिल है।
- रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इस कोशिश को सऊदी अरब का भी समर्थन मिला हुआ है। पिछले साल पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा समझौता हुआ था। सऊदी अरब लंबे समय से लीबिया में अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
- रिपोर्ट के अनुसार, यह मध्यस्थता पिछले साल के आखिर में शुरू हुई थी। हालांकि इस मामले पर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय, सेना की मीडिया शाखा, लीबिया के पूर्वी और पश्चिमी प्रशासन तथा कतर, तुर्किए, सऊदी अरब और अमेरिका के विदेश मंत्रालयों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।
ये भारत के लिए चिंताजनक क्यों?
- पाकिस्तान लंबे समय से हाशिए पर था और आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चे पर भारत ने उसे दुनियाभर में अलग-थलग करने में सफलता हासिल कर ली थी। हालांकि ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने ट्रंप की चापलूसी कर उनका समर्थन हासिल कर लिया। उसके बाद से कूटनीतिक स्तर पर पाकिस्तान को फिर से संजीवनी मिली है। यही वजह रही कि अमेरिका के समर्थन से पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान युद्ध में मध्यस्थता की।
- अब पाकिस्तान के लीबिया गृहयुद्ध में भी मध्यस्थता की कोशिश करने की रिपोर्ट आई है। इससे यकीनन पाकिस्तान की सॉफ्ट पावर में इजाफा होगा।
- इनके अलावा पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ अहम रक्षा समझौता किया है और वह अन्य मुस्लिम देशों के साथ मिलकर इस्लामिक नाटो जैसा संगठन बनाने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान खुद को इस्लामिक दुनिया का एकमात्र परमाणु संपन्न ताकत बताकर पहले ही खुद को इस्लामिक दुनिया में अहम बनाने की कोशिश कर रहा है।
- चीन का समर्थन पहले से ही पाकिस्तान को मिला हुआ है और पाकिस्तान को सैन्य रूप से मजबूत करने में चीन की भूमिका किसी से छिपी नहीं है।
- आशंका है कि पाकिस्तान इस सॉफ्ट पावर का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर सकता है और जम्मू कश्मीर मुद्दे को फिर से जिंदा करने की कोशिश कर सकता है, जो अनुच्छेद 370 हटने के बाद से मरणासन्न स्थिति में है। यही वजह है कि पाकिस्तान का कूटनीति स्तर पर बढ़ता प्रभाव कहीं न कहीं भारत के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
- रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित 'लीबिया पुनर्एकीकरण योजना' के अनुसार, 36 महीने की सत्ता-साझेदारी व्यवस्था का प्रस्ताव है। इसके तहत 'गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कंसेंसस एंड प्रेसिडेंशियल काउंसिल' नामक एक नई व्यवस्था बनाई जाएगी।
- प्रस्ताव के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र समर्थित पश्चिमी लीबिया की गवर्नमेंट ऑफ नेशनल यूनिटी के प्रमुख अब्दुलहमीद दबीबह को प्रधानमंत्री बनाया जाएगा, जबकि पूर्वी लीबिया की लीबियन नेशनल आर्मी के उप-कमांडर सद्दाम हफ्तार को राष्ट्रपति परिषद का अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव है।
- वहीं, लीबिया नेशनल आर्मी के प्रमुख खलीफा हफ्तार, जिनके नियंत्रण में लीबिया के कई बड़े तेल क्षेत्र और अहम रणनीतिक ढांचे हैं, उन्हें प्रस्तावित योजना के तहत बजट पर अधिकार देने की बात कही गई है।
- रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरी व्यवस्था को लागू कराने और बनाए रखने में पाकिस्तान सक्रिय भूमिका निभा रहा है। हालांकि, अभी कुछ भी अंतिम तौर पर तय नहीं हुआ है।
- रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले महीने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने रावलपिंडी में सद्दाम हफ्तार से मुलाकात भी की थी। इसके कुछ दिनों बाद हफ्तार ने वॉशिंगटन का दौरा किया, जहां उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मुलाकात की।
- विश्लेषकों का मानना है कि लीबिया में अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, तुर्किये और मिस्र जैसे देशों की तुलना में पाकिस्तान छोटा खिलाड़ी है, लेकिन उसके पक्ष में जो बात जाती है, वो ये है कि उसके दोनों प्रतिद्वंद्वी पक्षों से संपर्क बने हुए हैं।
- रॉयटर्स ने पिछले साल अपनी रिपोर्ट में बताया था कि पाकिस्तान पूर्वी लीबिया स्थित एलएनए के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है। इसमें JF-17 लड़ाकू विमान और कुछ प्रशिक्षण विमान की संभावित बिक्री भी शामिल है, जबकि लीबिया पर संयुक्त राष्ट्र का हथियार प्रतिबंध लागू है।
- दूसरी ओर, पश्चिमी लीबिया के प्रशासन ने भी हाल ही में पाकिस्तान के साथ सीधे संवाद की इच्छा जताई है। कतर और तुर्किए भी लीबिया में पाकिस्तान की मध्यस्थता का समर्थन कर रहे हैं।