फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   PM Narendra Modi remembers Jawaharlal Nehru in Indonesia Sukarno Subianto Bandung Conference news and updates

Indonesia: PM मोदी ने जकार्ता में किया नेहरू को याद, पहले पीएम ने कैसे मजबूत किए थे इंडोनेशिया से रिश्ते?

Tue, 07 Jul 2026 04:43 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Tue, 07 Jul 2026 04:43 PM IST
सार

प्रधानमंत्री मोदी ने इंडोनेशिया की संसद को संबोधित करते हुए दोनों देशों की साझा विरासत और संस्कृति पर बात की। पीएम मोदी ने ये भी कहा कि दोनों देश इतिहास के अहम मोड़ पर खड़े हैं और साझा विकास कर सकते हैं। पीएम मोदी ने कहा कि दोनों देश रामायण काल से जुड़े हैं। इसी के साथ उन्होंने भारत के पहले पीएम जवाहरलाल नेहरू का भी जिक्र किया। 

विज्ञापन
PM Narendra Modi remembers Jawaharlal Nehru in Indonesia Sukarno Subianto Bandung Conference news and updates
पीएम मोदी ने इंडोनेशिया में किया जवाहरलाल नेहरू का जिक्र। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंडोनेशिया दौरे का आज दूसरा दिन है। इस दौरान राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने पीएम मोदी को इंडोनेशिया के सर्वोच्च सम्मान 'बिन्तांग आदिपूर्ण' देकर सम्मानित किया। पीएम ने इसके बाद इंडोनेशिया की संसद को भी संबोधित किया, जहां उन्होंने इस सम्मान के लिए इंडोनेशिया के राष्ट्रपति और देश की जनता का आभारत जताया। पीएम ने इस दौरान भारत-इंडोनेशिया के संबंधों के इतिहास पर भी बात की। इस बीच मोदी ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि बांदुंग कॉन्फ्रेंस (1955) में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो और भारत के प्रधानमंत्री नेहरू ने दुनिया को संदेश दिया कि स्वतंत्र देशों को अपने फैसले खुद लेने का पूरा अधिकार है। 
विज्ञापन


पीएम के इस संबोधन से ठीक पहले कांग्रेस ने भी एक बयान जारी किया। इसमें पार्टी ने बताया कि इंडोनेशिया का सर्वोच्च सम्मान इससे पहले नेहरू को मिल चुका है। वह भी मरणोपरांत। कांग्रेस ने एक्स पर इस पोस्ट के साथ ही प्रधानमंत्री मोदी पर तंज भी कसा। 
विज्ञापन


हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह चर्चाएं तेज हैं कि आखिर भारत की आजादी के बाद इंडोनेशिया से हमारे रिश्ते कैसे थे? दोनों देश ऐतिहासिक स्तर पर किस तरह जुड़े हैं? भारत के पहले पीएम की दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने में क्या भूमिका रही? पीएम मोदी ने जिस बांदुंग कॉन्फ्रेंस का जिक्र किया, वहां भारत और इंडोनेशिया के पहले राष्ट्राध्यक्षों ने क्या संदेश दिया था? आइये जानते हैं...  
विज्ञापन
विज्ञापन

क्या है भारत-इंडोनेशिया के रिश्तों का इतिहास?
भारत और इंडोनेशिया के रिश्तों का इतिहास करीब दो शताब्दियों से भी ज्यादा पुराना है। इंडोनेशिया में भारतीय दूतावास की वेबसाइट के मुताबिक, यह रिश्ते रामायण और महाभारत के काल से हैं। भारत की तरह ही इंडोनेशिया में लोक कला और नाट्यों में इन दोनों ग्रंथों से जुड़ी घटनाओं का जिक्र मिलता है। इतना ही नहीं इंडोनेशिया में हिंदुत्व, बौद्ध धर्म और बाद में इस्लाम धर्म का आगमन भी भारत से ही हुआ। इंडोनेशिया की बड़ी आबादी एक समय हिंदू-बौद्ध धर्म को मानती थी। हालांकि, समय के साथ इस्लाम धर्म पूरे इंडोनेशिया में प्रसारित हुआ।

किन भारतीय ग्रंथों का इंडोनेशिया में जिक्र मौजूद?
इंडोनेशिया की सरकारी यूनिवर्सिटी- यूनिवर्सिटास नेगेरी सेमारंग में 2018 में छपी एक रिसर्च के मुताबिक, भारत और इंडोनेशिया के रिश्ते रामायण और महाभारत काल से जुड़े होने के कई सबूत मिले हैं। खासकर इंडोनेशिया में मौजूद कलाकृतियां और आर्किटेक्चर, जिनमें भारत की पौराणिक काल के इतिहास का जिक्र मौजूद है। 

बताया जाता है कि भारत में प्रचलित त्रेता युग के ग्रंथ- रामायण में जावा का जिक्र मिलता है। रामायण में इस जगह को यवद्वीप के नाम से जाना गया है। यहां प्रभु राम की सेना के प्रमुख सुग्रीव ने माता सीता की खोज के लिए अपनी एक टुकड़ी भेजी थी। 



 

इंडोनेशिया नाम में भी भारत की छाप
इसी रिसर्च में कहा गया है कि हिंदू और बौद्ध धर्म भारत से ही इंडोनेशिया में फैले। इन्हीं के जरिए भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा रही संस्कृत और ब्राह्मी लिपियों ने भी इंडोनेशिया में जगह बनाई। आज भी इंडोनेशिया में प्रचलित भाषाओं में भारत की संस्कृत से लेकर तमिल शब्दों की झलक तक दिख जाती है। 

इस देश में भारत का प्रभाव कितना ज्यादा था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विदेशी यात्रियों ने इंडोनेशिया का नाम भारत के जरिए ही पहचाना गया। इंडोनेशिया नाम लातिन शब्द इंडस (यानी भारत) और ग्रीक शब्द नेसोस (यानी द्वीप) को मिला कर बना। 18वीं सदी से इंडोनेशिया का नाम पूरी दुनिया में चलन में रहा है। 

इंडोनेशिया के मंदिरों, कलाओं और नाट्यों में भारतीय संस्कृति की झलक
पुरातनकाल के भारतीय संस्कृत और ब्राह्मी अभिलेखों को इंडोनेशिया ले गए। इसी के जरिए रामायाण और महाभारत जैसे ग्रंथों को इंडोनेशिया में प्रचार मिला। आज भी इंडोनेशिया के जावा में नाटकों में कई ओपन थिएटर बने हैं, जहां इंडोनेशिया के मुस्लिम समुदाय के लोग पूर्णिमा पर रामायण से जुड़े नृत्य में हिस्सा लेते हैं। इसके अलावा इंडोनेशिया में कई मंदिर भी हैं, जिनकी कलाकृतियों में भारतीय संस्कृति की झलक साफ दिखती है। 

नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ने आते थे इंडोनेशिया के लोग
एक और स्टडी के मुताबिक, इंडोनेशिया में जब हिंदू-बौद्ध धर्म पूरी तरह फैला था, तब कई इंडोनेशियाई नागरिक भारत में नालंदा यूनिवर्सिटी में पढ़ने पहुंचते थे। इसी दौरान भारत का प्रभाव भी इंडोनेशिया पर तेजी से बढ़ा था। बताया जाता है कि इंडोनेशिया में प्राचीन समय में हिंदुत्व, मध्यकाल में बौद्ध धर्म और 12वीं सदी के बाद इस्लाम धर्म तेजी से फैला।

इस्लाम धर्म भारत के गुजरात से इंडोनेशिया के सुमात्रा पहुंचा। 15वीं सदी तक यह धर्म पूरे जावा में फैल गया। हालांकि, भारत और इंडोनेशिया का यह जुड़ाव सिर्फ धर्म और कला के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहा। व्यापार के मामले में भी दोनों देशों ने संपर्क जारी रखा। इसके बाद 15वीं सदी से 20वीं सदी का समय ऐसा रहा, जब दोनों देशों के रिश्तों में ठहराव आ गया। इस दौरान संपर्क बरकरार तो रहे, लेकिन यह स्थिर थे। 

रविंद्रनाथ टैगोर ने की संस्कृति की तारीफ और फिर बढ़ निकला करीबी संबंधों का कारवां
  • 20वीं सदी में एक बार फिर भारत और इंडोनेशिया के संबंधों में सुधार की शुरुआत हुई। यही वह दौर था, जब रविंद्रनाथ टैगोर बाली पहुंचे थे और उन्होंने यहां भारतीय संस्कृति की झलक देख इसकी जबरदस्त तारीफ की थी। 
  • भारत की आजादी के बाद दोनों देशों के रिश्ते तेजी से बढ़े और पहले गणतंत्र दिवस में भारत ने इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति सुकर्णो को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया। 1951 में भारत और इंडोनेशिया ने दोस्ती की संधि पर हस्ताक्षर किए। 
  • 1955 में भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो गुट-निरपेक्ष आंदोलन (नॉन-अलाइंड मूवमेंट) के पांच संस्थापकों में शामिल रहे थे। 
  • 2011 में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुसिलो बामबांग युधोयोनो गणतंत्र दिवस पर भारत के मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किए गए थे। 

आजादी के बाद कैसे बढ़े भारत-इंडोनेशिया के रिश्ते?

भारत और इंडोनेशिया के बीच संबंधों का सफर आजादी के बाद से लेकर अब तक कई ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव से गुजरा है। हालांकि, आजादी के ठीक बाद दोनों देश गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अहम आवाज बनकर मजबूत दोस्त के तौर पर उभरे थे। 

1. स्वतंत्रता के शुरुआती वर्ष और गहरी मित्रता (1940 और 1950 का दशक)
भारत और इंडोनेशिया दोनों ने उपनिवेशवाद का सामना किया था, जिसके कारण दोनों के बीच स्वतंत्रता के बाद एक स्वाभाविक एकजुटता थी। भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इंडोनेशिया के स्वतंत्रता संग्राम का पुरजोर समर्थन किया और 1947 में डच विमानों के भारत के ऊपर से उड़ान भरने पर प्रतिबंध लगा दिया था। उन्होंने युवा बीजू पटनायक को डच हमलों के बीच इंडोनेशियाई नेताओं, सुतन सजहरीर और मोहम्मद हट्टा, को सुरक्षित निकालने के लिए जकार्ता भेजा था। 

इस समर्थन के प्रति आभार व्यक्त करते हुए, इंडोनेशिया के पहले राष्ट्रपति सुकर्णो 1950 में भारत के पहले गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि बने। इसके बाद, 1951 में दोनों देशों के बीच मैत्री संधि पर हस्ताक्षर हुए। दोनों देशों ने 1955 के ऐतिहासिक बांदुंग सम्मेलन और 1961 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन (एनएएम) की स्थापना में भी मिलकर अग्रणी भूमिका निभाई।

2. संबंधों में तनाव और गिरावट (1960 का दशक)
1960 के दशक में इन मजबूत संबंधों में भारी गिरावट आई। इसका मुख्य कारण चीन के प्रति दोनों देशों का अलग-अलग दृष्टिकोण था। जहां 1962 में भारत पर चीन के आक्रमण के दौरान इंडोनेशिया ने भारत के प्रति कोई एकजुटता नहीं दिखाई, वहीं वह चीन के करीब बना रहा। दूसरे बांदुंग सम्मेलन के आयोजन को लेकर नेहरू और सुकर्णो के बीच व्यक्तिगत मतभेद भी पैदा हो गए थे। इसके अलावा, 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान इंडोनेशिया ने पाकिस्तान को हथियारों की आपूर्ति की और इंडोनेशिया में भारत-विरोधी भावनाएं भड़काई गईं। इसका अंत जकार्ता में भारतीय दूतावास पर हमले के रूप में हुआ।

3. संबंधों में क्रमिक सुधार और ठहराव (1965-1980)
1966 में जब जनरल सुहार्तो ने इंडोनेशिया की सत्ता संभाली, तो उन्होंने भारत के साथ बिगड़े संबंधों को सुधारने की पहल की और 1967 में कई व्यापारिक समझौते किए गए। 1977 में दोनों देशों के बीच एक अहम समुद्री सीमा समझौता भी हुआ। हालांकि, शीत युद्ध के कारण दोनों देशों के संबंध अपने पुराने चरम पर नहीं पहुंच पाए, क्योंकि इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत सोवियत संघ के करीब था और सुहार्तो का इंडोनेशिया अमेरिका के समर्थन में था।

4. 'लुक ईस्ट' नीति से आई नई ऊर्जा (1990 का दशक)
1990 के दशक में प्रधानमंत्री पीवी. नरसिम्हा राव की तरफ से लुक ईस्ट नीति की शुरुआत के बाद दोनों देशों के संबंध वास्तव में फिर से गहरे होने लगे। भारत के आर्थिक उदारीकरण के साथ दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक सहयोग के नए अवसर खुले।

5. 'एक्ट ईस्ट' नीति और आधुनिक युग के मजबूत संबंध (2014 से अब तक)
2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबंधों को और अधिक बेहतर करने के लिए एक्ट ईस्ट नीति की शुरुआत की। रक्षा, सुरक्षा और व्यापार के क्षेत्र में द्विपक्षीय संबंध तेजी से बढ़े हैं। आज इंडोनेशिया, सिंगापुर के बाद आसियान क्षेत्र में भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। हाल ही में, इंडोनेशिया के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति प्रबोवो सुबिआंतो ने भारत का दौरा किया, जहां दोनों देशों ने समुद्री सुरक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति और डिजिटल सहयोग पर अहम समझौते किए।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed