Russia Ukraine War: जेलेंस्की लें पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह जनरल याह्या खान से सबक, जब महाशक्ति से मिला था धोखा!
ऐसी ही कठिन परिस्थितियों का सामना भारत ने भी आजादी के बाद दो बार किया, पहला मौका वह था जब अक्तूबर 1962 में सीमा विवाद को लेकर चीन ने देश पर एक बड़ा हमला कर दिया, वह शीतयुद्ध का चरम काल था और भारत किसी भी गुट में शामिल तो नहीं था, लेकिन वह सोवियत संघ के काफ़ी करीब था, हमने सोवियत संघ से मदद की आशा की, लेकिन उनका स्पष्ट जवाब था, "भारत मित्र है लेकिन चीन हमारा भाई है।"
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विस्तार
खबर है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की देश छोड़ कर पोलैंड भाग चुके हैं, हालांकि सामने आ रहे वीडियोज में उनकी लोकेशन यूक्रेन में होने का दावा किया जा रहा है। लेकिन यूक्रेन में युद्धजनित विनाशकारी विध्वंस व हजारों निर्दोष मानवीय हत्याएं देखकर आम जनमानस की संवेदनाएं राष्ट्रपति जेलेंस्की व यूक्रेन के पक्ष में हो चली हैं। फिर भी यह कहना आवश्यक होगा कि राष्ट्रपति जेलेंस्की ने विदेश नीति के उस शाश्वत नियम की घोर अवहेलना की है, जिसमें यह कहा जाता है, 'अंतरराष्ट्रीय संबंधों में न कोई स्थायी मित्र है, न कोई स्थायी शत्रु केवल आपके हित ही आपके स्थायी मित्र होते हैं।' अमेरिकी आश्वासनों के बावजूद जेलेंस्की यह भी भूल गए, 'शांति को पाने और शांति की मांग करने का अधिकारी वही है जो स्वयं शक्तिशाली है।'
तब रूस ने दिया था झटका
ऐसी ही कठिन परिस्थितियों का सामना भारत ने भी आजादी के बाद दो बार किया, पहला मौका वह था जब अक्तूबर 1962 में सीमा विवाद को लेकर चीन ने देश पर एक बड़ा हमला कर दिया, वह शीतयुद्ध का चरम काल था और भारत किसी भी गुट में शामिल तो नहीं था, लेकिन वह सोवियत संघ के काफ़ी करीब था, हमने सोवियत संघ से मदद की आशा की, लेकिन उनका स्पष्ट जवाब था, "भारत मित्र है लेकिन चीन हमारा भाई है।"
जाहिर था सोवियत संघ अपने साम्यवादी साथी चीन के साथ रहा और चीन ने इस युद्ध में भारत की प्रतिष्ठा धूल धूसरित कर दी, लेकिन हमने ये कड़वा सबक जरूर हासिल किया कि "सुरक्षा प्राप्त करने के लिए न सिर्फ़ अपने बल पर ही भरोसा करना चाहिए बल्कि ऐसी विदेश नीति किसी काम की नहीं, जो आड़े समय में साथ देने वाले साथी की खोज न कर सके।"
1971 का सबक
संभवतया इसी कड़वे सबक का परिणाम था कि जब मार्च 1971 में एक बार फिर पूर्वी पाकिस्तान में संकट के विषय पर पाकिस्तान, चीन और अमेरिका की जुगलबंदी भारत के विरुद्ध खुल कर सामने आने लगी, तो हमारा देश गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेता होते हुए भी अपनी सुरक्षा के लिए व्यवहारिक होने के लिए बाध्य हो गया। वास्तव में शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में तब के पूर्वी पाकिस्तान में अवामी लीग ने 169 में से 167 संसदीय सीटों पर विजय प्राप्त कर पाकिस्तान के लिए अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया था। पाकिस्तानी हुक्मरानों ने चुनाव के नतीजे मानने के स्थान पर पूर्वी पाकिस्तान में दमन के लिए मार्च 1971 में ही फौज उतार दी और देखते ही देखते उनसे बचने के लिए एक करोड़ से ज्यादा बंगाली शरणार्थी भारत की सीमा में दाख़िल हो चुके थे।
पाकिस्तान, अमेरिका और चीन की शह पर भारत से युद्ध पर आमादा था। कहते हैं तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने पाकिस्तान होते हुए चीन की गुप्त यात्रा की और इस तरह पाकिस्तान के पक्ष में भावी युद्ध की भूमिका तैयार कर दी।
तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने अमेरिकी समकक्ष रिचर्ड निक्सन से मदद की आशा जताते हुए उनका पक्ष जानने का प्रयास किया तो निक्सन का जवाब सुनकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस विषय पर बेशर्मी से कहा कि "संभावित भारत-पाकिस्तान युद्ध में अमेरिका पाकिस्तान की ओर से हस्तक्षेप करेगा।"
सामने आई भारत-सोवियत मैत्री व सहयोग संधि
इससे बड़ी चेतावनी और संकट भारत के लिए दूसरा कोई नहीं हो सकता था। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा सुनुश्चित करने के लिए हमारी विदेश नीति को व्यवहारिकता के धरातल पर खड़ा कर दिया, पूर्व राजदूत डीपी धर को तत्काल अगस्त में मॉस्को भेजा गया और उसके तुरंत बाद एक उच्चस्तरीय सोवियत प्रतिनिधिमंडल नई दिल्ली आया और नौ अगस्त 1971 को '21 वर्षीय भारत-सोवियत मैत्री व सहयोग संधि' अस्तित्व में आई, जिस पर भारत की ओर से तत्कालीन विदेशमंत्री सरदार स्वर्ण सिंह व सोवियत संघ की ओर से उनके समकक्ष मिस्टर ग्रोमिको ने हस्ताक्षर किए।
इस संधि की धारा-9 में स्पष्ट रूप से व्यवस्था की गई थी कि किसी संकट के समय दोनों मित्र राष्ट्र एक दूसरे की सुरक्षा के लिए एक दूसरे की हर संभव सहायता करेंगे, यह एक ऐसी व्यवस्था थी जिसने भारत की सुरक्षा की गारंटी तय कर दी और भावी युद्ध में पाकिस्तान की दशा भी।
ये था अमेरिका का रुख
शेष इतिहास है कि जब चार दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी तानाशाह जनरल याह्या खान की फौजों ने भारत पर हमला किया और भारत ने उन्हें कड़ा प्रत्युत्तर देना शुरू किया तो पाकिस्तान की सहायता के लिए रिचर्ड निक्सन ने USS इंटरप्राइज के नेतृत्व में परमाणु हथियारों से लैस अपना सातवां नौसैनिक बेड़ा बंगाल की खाड़ी में उतार दिया, भारत को यह धमकी मिली कि पाकिस्तान के विरुद्ध हमला रोके अन्यथा अंजाम बहुत बुरा होगा।
इसी समय भारत के आग्रह पर सोवियत रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस सातवें बेड़े को चेतावनी दी कि यदि भारत पर हमला हुआ तो सोवियत संघ की परमाणु मिसाइलें सातवें जहाजी बेड़े को बंगाल की खाड़ी में ही डुबो देंगी, परिणाम यह हुआ कि 14 दिनों तक चली इस लड़ाई में सातवां जहाजी बेड़ा अपनी जगह पर ही खड़ा रह गया और भारत ने 16 दिसंबर तक पाकिस्तान को परास्त कर के विश्व मानचित्र पर नए राष्ट्र बांग्लादेश का निर्माण कर दिया।
पाकिस्तान के हुक्मरान जनरल याह्या ख़ान को बिल्कुल वही सबक मिला, जो आज यूक्रेन में मिस्टर जेलेंस्की को मिला है, जबकि इंदिरा गांधी ने देश पर आजादी के बाद आज तक के सबसे गंभीर संकट से निकलने के बाद 18 मई 1974 को पोखरण में प्रथम परमाणु परीक्षण करके सुरक्षा संबंधी अपनी क्षमताएं और इरादे जाहिर कर दिए और उस दिन के बाद फिर भारत को कभी हमले की धमकी नहीं मिली।
(लेखक मेरठ कॉलेज में रक्षा अध्ययन विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है)

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