Sri Lanka Election: श्रीलंका में निर्वाचन आयोग ने स्थानीय चुनाव टाल कर राष्ट्रपति को दी बड़ी राहत
स्थानीय चुनावों के लिए मतदान नौ मार्च को होना तय था। लेकिन अब निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि उसके पास मतदान कराने के लिए जरूरी धन नहीं है। पैसा ना होने के कारण आयोग मतपत्रों की छपाई नहीं करवा पाया है...
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श्रीलंका के निर्वाचन आयोग ने राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे को एक बड़ी राहत दी है। उसने तय समय पर स्थानीय चुनाव कराने से इनकार कर दिया है। आयोग ने सोमवार को श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह निर्धारित तारीख पर मतदान कराने की स्थिति में नहीं है। इससे विक्रमसिंघे को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की शर्तों के मुताबिक आर्थिक सुधारों को लागू करने का और समय मिल गया है।
आम राय थी कि स्थानीय चुनावों में विक्रमसिंघे की पार्टी की बहुत बुरी हार होगी। ऐसे चुनाव नतीजे आने के बाद राष्ट्रपति की साख में गहरा सूराख हो जाता। वैसे कई विश्लेषकों की राय है कि देश में विक्रमसिंघे सरकार को लेकर जैसा जनाक्रोश है, उसके बीच उसके लिए सख्त आर्थिक उपायों को लागू करना अभी भी बहुत मुश्किल साबित होगा। कुछ समय पहले सरकार ने निजी आय कर की दर बढ़ा कर 36 फीसदी कर दी थी। इसके अलावा बिजली शुल्क में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई। इन दोनों कदमों के बाद विक्रमसिंघे की लोकप्रियता में और भी भारी गिरावट आई है।
स्थानीय चुनावों के लिए मतदान नौ मार्च को होना तय था। लेकिन अब निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि उसके पास मतदान कराने के लिए जरूरी धन नहीं है। पैसा ना होने के कारण आयोग मतपत्रों की छपाई नहीं करवा पाया है। इस चुनाव के लिए विक्रमसिंघे की यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) ने पूर्व प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के नेतृत्व वाली श्रीलंका पोडुजना पेरेमुना (एसएलपीपी) के साथ गठबंधन बनाया था। राजपक्षे परिवार भी देश में लगातार जन आक्रोश के निशाने पर है। इसलिए इस गठबंधन की हार तय मानी जा रही थी।
राजनीतिक विश्लेषक कुसाल परेरा ने वेबसाइट इकॉनमीनेक्स्ट.कॉम से कहा है- ‘विपक्षी दल राजपक्षे विरोधी भावना का लाभ उठाना चाह रहे थे। वे यह भी दिखाना चाहते थे कि मौजूदा सरकार के साथ जनादेश नहीं है। लोगों को इस समय अपनी जिंदगी में संघर्ष करना पड़ रहा है। वैसे इस चुनाव से नीतियों में बदलाव की कोई संभावना नहीं बनने वाली थी।’
विक्रमसिंघे ने पिछले हफ्ते संकेत दिया था कि अर्थव्यवस्था संभलने के बाद अगले साल चुनाव कराए जाएंगे। शनिवार को एक सभा में उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था संभलने के बाद देश मतपत्रों के जरिए निर्णय करने की स्थिति में होगा कि वह कैसा भविष्य चाहता है। आरोप है कि निर्वाचन आयोग ने राष्ट्रपति की मंशा के मुताबिक फैसला लिया है। अधिवक्ता मिगारा डॉस ने कहा है- ‘यह कदम संविधान के खिलाफ है। राष्ट्रपति लोगों से मतदान का उनका अधिकार नहीं छीन सकते। निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संस्था है। यह उसका कर्त्तव्य है कि वह चुनाव कराने के लिए वह वित्त मंत्रालय से धन मांगे और सरकार पर मतपत्रों को छपवाने के लिए दबाव डाले। लेकिन ऐसा लगता है कि आयोग सरकार के दबाव में आ गया है।’
इस बीच देश के अलग-अलग हिस्सों में सरकार विरोधी प्रदर्शन लगातार जारी हैं। विपक्षी पार्टियां, ट्रेड यूनियनें और बैंकिंग सेक्टर कर्मचारी रोजमर्रा के स्तर पर विरोध जता रहे हैं। सोमवार को प्रमुख विपक्षी पार्टी समगी जना बलावेगया (एसजेबी) के एक प्रदर्शन पर पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछारें छोड़ीं।
