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Explainer: अमेरिका-ईरान के समझौते के बाद इस्राइल क्या करेगा, कैसा है देश का माहौल; नेतन्याहू किस मुसीबत में?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 15 Jun 2026 03:10 PM IST
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सार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार देर रात ईरान के साथ समझौते का एलान किया। इस डील को लेकर बीते कुछ महीनों में जो बातचीत हुई, उससे अधिकांश समय इस्राइल को दूर ही रखा गया। हालांकि, इस डील में कुछ ऐसी शर्तें रखी गई हैं, जिनके जरिए इस्राइल पर सीधे तौर पर कुछ जिम्मेदारियां तय कर दी गईं। अमेरिका-ईरान की इन्हीं शर्तों और डोनाल्ड ट्रंप के रवैये को लेकर इस्राइल में मौजूदा समय में चिंताएं जताई गई हैं। 

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इस्राइल-ईरान के बीच समझौता तय। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

अमेरिका और ईरान के बीच 107 दिन तक चले युद्ध का आखिरकार अंत नजदीक आ गया है। रविवार देर रात अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एलान किया कि अब ईरान के साथ जंग खत्म होने जा रही है और जल्द ही अमेरिका होर्मुज के बाहर लगाई गई अपनी नौसैनिक नाकेबंदी को हटा देगा। इसी के साथ उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने का भी एलान किया और जल्द ही जंग के अंत के लिए विस्तृत ढांचा (फ्रेमवर्क) तैयार करने की बात कही। 


ट्रंप की तरफ से ईरान के साथ जिस समझौते की बात की गई है, उसमें 14 शर्तें तय की गई हैं। इनमें सहमति बनी है कि ईरान और लेबनान पर आगे हमले नहीं किए जाएंगे। इस शर्त में इस्राइल को भी एक पक्ष बनाया गया है, वह भी पूरी बातचीत में उसे कम से कम शामिल कर के। यानी ट्रंप प्रशासन और ईरान ने अपने समझौते को इस्राइल के लिए भी बाध्यकारी बनाया है। हालांकि, बिना अपनी मर्जी के इस्राइल इस समझौते को कितना मानेगा यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा। 
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इस बीच यह जानना अहम है कि आखिर अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते में इस्राइल का कहां-कहां जिक्र है और उसे किन शर्तों का हिस्सा बनाया गया है? इस डील को लेकर इस्राइल का क्या रुख सामने आया है? वहां अमेरिका को लेकर मौजूदा समय में माहौल कैसा है? बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह समझौता घरेलू स्तर पर क्या मायने रखता है? आइये जानते हैं...


अमेरिका-ईरान के समझौते में इस्राइल का कहां-कहां जिक्र? 

अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14-सूत्रीय समझौते में इस्राइल और उसकी सुरक्षा से जुड़े अहम बिंदुओं का प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जिक्र किया गया है।

लेबनान युद्धविराम की शर्त में: समझौते के मसौदे में स्पष्ट रूप से लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों की तत्काल और स्थायी समाप्ति की घोषणा की गई है। इस खंड के तहत इस्राइल और हिजबुल्लाह के बीच चल रहे युद्ध पर रोक लगाने का प्रयास किया गया है। 

दक्षिणी लेबनान से इस्राइली सेना की वापसी का प्रस्ताव: समझौते की व्यापक सहमतियों के हिस्से के रूप में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रस्ताव दिया था कि इस्राइल को दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना (आईडीएफ) को पूरी तरह वापस बुला लेना चाहिए। हालांकि, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया है कि इस्राइल इस क्लॉज को नहीं मानेगा और उसकी सेना लेबनान में अपनी मौजूदा स्थिति में बनी रहेगी।

परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता: समझौते के मसौदे में ईरान की तरफ से परमाणु हथियार न बनाने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराने का बिंदु शामिल है। इस्राइल के संदर्भ में राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि इस समझौते ने इस्राइल को बचाया है, क्योंकि अगर ईरान के पास परमाणु हथियार आ जाते, तो इस्राइल दो घंटे भी नहीं बच पाता।

इस्राइल की सबसे बड़ी चिंताओं का जिक्र न होना: समझौते में क्या शामिल नहीं है, यह भी इस्राइल के लिए बहुत मायने रखता है। इस्राइल की मांग थी कि समझौते में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को नष्ट करने और लेबनान में हिजबुल्ला, गाजा में हमास और यमन में हूती जैसे प्रॉक्सी गुटों को ईरानी समर्थन रोकने का स्पष्ट प्रावधान हो। लेकिन समझौते के सामने आए मसौदे में इन विषयों का कोई जिक्र नहीं है और प्रॉक्सी गुटों को रोकने के लिए कोई स्पष्ट तंत्र नहीं बनाया गया है।

कुल मिलाकर बात की जाए तो इस्राइल प्रत्यक्ष रूप से इस वार्ता का हिस्सा नहीं था, लेकिन समझौते का लेबनान खंड सीधे तौर पर इस्राइल के सैन्य अभियानों पर प्रतिबंध लगाता है, जिसका इस्राइल कड़ा विरोध कर रहा है।

अमेरिका-ईरान के समझौते को लेकर इस्राइल का क्या रुख सामने आया है?

अमेरिका-ईरान के बीच हुए समझौते को लेकर इस्राइल का रुख बेहद कड़ा रहा है। द टाइम्स ऑफ इस्राइल में छपे एक लेख के मुताबिक, नेतन्याहू सरकार इस समझौते को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़े झटके के रूप में देख रही है।
 

1. लेबनान पर शर्तों को मानने से साफ इनकार

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया है कि इस्राइल इस समझौते के लेबनान युद्धविराम खंड से खुद को बंधा हुआ नहीं मानता है। नेतन्याहू ने राष्ट्रपति ट्रंप को अवगत कराया है कि इस्राइली रक्षा बल (आईडीएफ) दक्षिणी लेबनान से पीछे नहीं हटेंगे और अगर हिजबुल्लाह खतरा पैदा करता है तो उसे खत्म करने के लिए अपनी कार्रवाई जारी रखेंगे। 

2. राजनीतिक हलकों में भारी आक्रोश

इस्राइल में पूरे राजनीतिक परिदृश्य में इस सौदे को लेकर व्यापक असंतोष है।

3. अमेरिकी दबाव से इस्राइली अधिकारी स्तब्ध

समझौते से ठीक पहले बेरूत में हिजबुल्ला के ठिकानों पर हुए इस्राइली हमले को लेकर ट्रंप की सार्वजनिक आलोचना से इस्राइली अधिकारी स्तब्ध हैं। ट्रंप की तरफ से नेतन्याहू के फैसले पर सवाल उठाने को एक वरिष्ठ इस्राइली अधिकारी ने चेहरे पर जोरदार तमाचा बताया है। उनका मानना है कि लेबनान में इस्राइल को कार्रवाई करने से रोकना एक रणनीतिक सहयोगी के व्यवहार से मेल नहीं खाता है।

4. ट्रंप के मनमाने फरमानों को लेकर नाराजगी

इस्राइली सुरक्षा कैबिनेट में अमेरिका की तरफ से थोपे जा रहे लेबनान युद्धविराम खंड का कड़ा विरोध हो रहा है। कैबिनेट बैठक में परिवहन मंत्री मिरी रेगेव ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस्राइल कोई संरक्षित राज्य नहीं है और उसे इस स्थिति से बाहर आना चाहिए। नेतन्याहू पर भी सरकार के अंदर और बाहर से भारी दबाव है कि वे ट्रंप के फरमानों के आगे न झुकें।

5. सैन्य स्वतंत्रता छिनने का डर

इस्राइल के राजनीतिक और सुरक्षा हलकों में यह गहरी चिंता फैल गई है कि वॉशिंगटन अब लेबनान में इस्राइल की सैन्य कार्रवाई की स्वतंत्रता को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर देगा। इस्राइल के लिए यह एक रेड लाइन है, और वह यह स्पष्ट कर चुका है कि वह हिजबुल्ला के खिलाफ अपनी रक्षा के अधिकार से समझौता नहीं करेगा।


अब आगे क्या होगा इस्राइल का रुख?

नेतन्याहू की ट्रंप के साथ आपात बैठक की मांग
इस समझौते और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर उठी चिंताओं के कारण नेतन्याहू जी-7 शिखर सम्मेलन के बाद डोनाल्ड ट्रंप के साथ एक तत्काल बैठक की मांग कर रहे हैं। इसका मकसद ईरान के साथ हो रही वार्ता में इस्राइल की स्थिति को स्पष्ट करना और लेबनान में इस्राइल के सैन्य अभियानों को लेकर आश्वासन प्राप्त करना है।

कैबिनेट में वैकल्पिक सैन्य रणनीति पर चर्चा
इस्राइली सुरक्षा कैबिनेट में इस बात पर जोर दिया गया है कि लेबनान उनका तात्कालिक सुरक्षा क्षेत्र है और वहां उन्हें 7 अक्तूबर से पहले की स्थिति स्वीकार्य नहीं है। वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच ने सुझाव दिया है कि अगर ईरान भविष्य में इस्राइल पर हमला करता है, तो इस्राइल को सीधे ईरान पर पलटवार करने से बचना चाहिए, ताकि ट्रंप के समझौते में बाधा न आए। इसके बजाय, इस्राइल को लेबनान (हिजबुल्ला) में अपनी जवाबी कार्रवाई तेज करनी चाहिए, जो सस्ता और अधिक प्रभावी होगा।

अमेरिकी सैन्य सहायता से मुक्त होने की इस्राइल की तैयारी
अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव और इस्राइल की स्वायत्तता पर उठ रहे सवालों के बीच नेतन्याहू ने अगले एक दशक में इस्राइल को अमेरिकी सैन्य सहायता से पूरी तरह मुक्त करने का संकल्प लिया है। इसके लिए वर्तमान वित्तीय सहायता मॉडल को हथियारों की संयुक्त तकनीकी परियोजनाओं में बदलने पर विचार किया जा रहा है। 

यूं तो यह समझौता ईरान के मुख्य खतरों (परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल और प्रॉक्सी) को खत्म करने के उसके लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रहा है। इसके बावजूद नेतन्याहू अब तक ट्रंप से सीधे टकराव से बच रहे हैं। हालांकिस वे लेबनान में इस्राइल की रक्षात्मक स्वतंत्रता से कोई समझौता करने को तैयार नहीं दिख रहे।


खुद नेतन्याहू के लिए अमेरिका-ईरान समझौते के क्या मायने?

अमेरिका-ईरान का यह शांति समझौता बेंजामिन नेतन्याहू के लिए घरेलू स्तर पर एक बड़ा राजनीतिक संकट और चुनौती बनकर उभरा है। 

नेतन्याहू पर चुनाव का भारी दबाव
इस्राइल में अक्तूबर के अंत तक संसदीय चुनाव होने की उम्मीद है। इसके चलते नेतन्याहू पर राजनीतिक दबाव काफी ज्यादा है। चुनाव से ठीक पहले इस समझौते का होना उनके लिए एक मुश्किल स्थिति पैदा कर रहा है। खासकर इस्राइल की मंजूरी और उसे बातचीत में शामिल किए बिना ही उस पर ईरान और लेबनान पर कार्रवाई से रोक लगाना नेतन्याहू के लिए निजी तौर पर नुकसानदेह है। इस्राइली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इससे जनता के बीच यह संदेश गया है कि नेतन्याहू का ट्रंप से प्रभाव पूरी तरह खत्म हो चुका है और वे इस्राइल की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सफल नहीं हो पाए।

सहयोगियों-विपक्ष के कड़े तेवर के बीच घिरे पीएम
इस्राइली विपक्ष इस समझौते को नेतन्याहू की सरकार की नाकामी के रूप में पेश कर रहा है। विपक्षी नेता यायिर लापिड ने इसे से लेकर पूर्व रक्षा मंत्री एविग्डोर लिबरमैन ने इसे इस्राइल के लिए बड़ी नाकामी करार दिया है। इतना ही नहीं नेतन्याहू अपनी ही सरकार के मंत्रियों और कट्टरपंथी सहयोगियों के भारी दबाव में हैं, जो चाहते हैं कि वे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव के आगे न झुकें। 
 

  • वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच और राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इटमार बेन-गवीर जैसे नेता लेबनान में बिना किसी समझौते के बेहद कड़ी सैन्य कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। 
  • परिवहन मंत्री मिरी रेगेव ने स्पष्ट किया है कि इस्राइल अमेरिका का संरक्षित राज्य नहीं है और उसे कड़े फैसले लेने चाहिए।
  • नेतन्याहू ने हमेशा ट्रंप के साथ अपने व्यक्तिगत और मजबूत संबंधों को अपनी प्रमुख राजनीतिक उपलब्धियों में से एक के रूप में प्रचारित किया है। इसलिए वे सार्वजनिक रूप से ट्रंप का कड़ा विरोध करने से हिचकिचा रहे हैं, लेकिन लेबनान और ईरान समझौते की शर्तें उन्हें घरेलू स्तर पर कड़ा रुख अपनाने पर मजबूर कर रही हैं।
अमेरिकी सहायता से दूरी का दांव 
घरेलू स्तर पर खुद को एक स्वतंत्र और मजबूत नेता के रूप में पेश करने के लिए, नेतन्याहू ने हाल ही में यह रणनीतिक संकल्प लिया था कि वे अगले एक दशक में इस्राइल को अमेरिकी सैन्य सहायता से पूरी तरह मुक्त कर देंगे। 
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