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क्या है 82वीं एयरबोर्न डिवीजन: ईरान में उतर सकती है ये टुकड़ी, दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका की जीत में भूमिका

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Thu, 26 Mar 2026 12:09 PM IST
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सार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक तरफ तो ईरान के साथ बातचीत होने तक उसके प्रमुख ऊर्जा संयंत्रों को निशाना न बनाने की बात कही है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका तेजी से पश्चिम एशिया में में अपनी सैन्य टुकड़ियों की तैनाती बढ़ा रहा है। ईरान युद्ध में अमेरिका की इस दोतरफा नीति के बीच उसकी 82वीं एयरबोर्न डिवीजन की चर्चाएं सबसे ज्यादा हैं, जो कि सामान्य सेना की तरह युद्ध में नहीं उतरती, बल्कि यह बल अपने कौशल के जरिए संघर्ष का रुख बदलने की क्षमता रखता है। 

What is 82nd Airborne Division Troops that US is moving into Gulf alongside Marines Donald Trump Move Iran War
अमेरिका-ईरान संघर्ष में हो सकती है 82वीं एयरबोर्न डिवीजन की एंट्री। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

अमेरिका-इस्राइल की तरफ से ईरान के खिलाफ किए गए हमले और इसके बाद तेहरान की तरफ से किए गए पलटवार का दौर लगातार 26वें दिन भी जारी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एलान किया था कि उनके कुछ अधिकारी ईरानी शासन के साथ संपर्क में हैं और अगले पांच दिन बातचीत पर जोर देंगे। 
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इस बीच सामने आया कि ट्रंप ने कुछ समय पहले ही जिन 5000 मरीन्स को ईरान के आसपास तैनाती के लिए भेजने की बात कही थी, वह कुछ समय में ही पश्चिम एशिया में मौजूद होंगे। ऐसे में ईरान से जुड़े विश्लेषकों ने कहा कि ट्रंप पांच दिन बातचीत का बहाना बना रहे हैं, ताकि वह अपनी नई सैन्य टुकड़ियों के जरिए ईरान के खिलाफ नई रणनीति को अंजाम दे पाएं। खबरें आईं कि अमेरिका अपनी 82वीं एयरबोर्न डिवीजन को भी ईरान में उतारने की तैयारी कर रहा है, ताकि संघर्ष में अपने कुछ लक्ष्यों को तुरंत पूरा किया जा सके।
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह 82वीं एयरबोर्न डिवीजन क्या है? इसके गठन से लेकर इसके संघर्षों में उतारने का इतिहास क्या रहा है? इस डिवीजन को ईरान युद्ध में किस तरह उतारने की चर्चाएं हैं? आइये जानते हैं...

82वीं एयरबोर्न डिवीजन क्या है?

1. क्या है इस डिवीजन के गठन का इतिहास

2. किन अभियानों से मिली पहचान

इस डिवीजन की असली पहचान दूसरे विश्व युद्ध में इसके साहसिक अभियानों से मिली। 6 जून 1944 को डी-डे (ऑपरेशन ओवरलॉर्ड) के दौरान, इसके लगभग 6,400 पैराट्रूपर्स को नाजी-कब्जे वाले फ्रांस के नॉरमैंडी में दुश्मन की सीमा के पीछे पैराशूट से उतारा गया था। इस रणनीति का असर यह हुआ कि जो जर्मन सेना अमेरिका के मित्र देशों की सेना (अलायड फोर्सेज) का सामना करने के लिए बढ़ रही थी, उसके लिए पीछे अमेरिकी सैनिकों का खतरा भी बढ़ गया। ऐसे में जर्मनी के लिए यह दो दिशाओं वाला युद्ध बन गया। दूसरी तरफ अमेरिका ने दुश्मन की धरती पर सैनिक उतारकर अहम पुलों पर कब्जा किया। साथ ही अहम रास्तों को सुरक्षित किया और जर्मन सेना को होने वाली रसद और गोला-बारूद की सप्लाई में बड़ा रोड़ा लगा दिया। 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के सैनिकों ने इस दौरान 33 दिन तक बिना किसी राहत सामग्री के युद्ध किया और जर्मन सेना को उलझाए रखा। 

डी-डे के अलावा इस डिवीजन ने इटली के सिसिली में ऑपरेशन हस्की, ऑपरेशन मार्केट गार्डन और बैटल ऑफ द बल्ज जैसे प्रमुख अभियानों में भी हिस्सा लिया, जिसने दूसरे विश्व युद्ध की दिशा गठबंधन बलों के रुख में मोड़ने में काफी मदद की। इसकी बहादुरी के लिए इसे प्रेसिडेंशियल यूनिट साइटेशन से भी सम्मानित किया गया।

3. कोरिया से लेकर अफगानिस्तान तक के युद्ध में शामिल रही यह डिवीजन

दूसरे विश्व युद्ध के बाद से यह डिवीजन अमेरिका के सबसे प्रमुख सैन्य बल के तौर पर काम कर रही है। इसकी पहचान रैपिड डिप्लॉयमेंट फोर्स की है, यानी इसे बेहद कम समय में किसी भी परिस्थिति के लिए तैनात किया जा सकता है। इस डिवीजन ने कोरिया (अविभाजित), वियतनाम, ग्रेनाडा, खाड़ी युद्ध (ऑपरेशन डेजर्ट शील्ड और डेजर्ट स्टॉर्म), इराक युद्ध और अफगानिस्तान संघर्ष समेत कई प्रमुख सैन्य अभियानों में हिस्सा लिया है। 

1990 के दशक में जब सद्दाम हुसैन ने अचानक कुवैत पर हमला कर उसे कब्जे में करने की कोशिश की थी तो अमेरिका की 82वीं एयरबोर्न डिवीजन ही इराकी सेना के खिलाफ संघर्ष में उतारी गई थी। अपने इस अनुभव और तेज प्रतिक्रिया की क्षमता की वजह से 82वीं एयरबोर्न डिवीजन को दुनिया के सबसे तेज और आधुनिक फर्स्ट-इन स्ट्राइक फोर्स माना जाता है। 

क्यों खास है 82वीं एयरबोर्न डिवीजन?

तेजी से तैनाती की खूबी: 82वीं एयरबोर्न डिवीजन को दुनियाभर में अपनी तेजी के लिए जाना जाता है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, आदेश मिलने के महज 18 घंटे के अंदर यह डिवीजन अपने लगभग 3,000 सैनिकों यानी एक पूरी ब्रिगेड को दुनिया में कहीं भी तैनात करने में सक्षम है। इसकी भूमिका पारंपरिक सैन्य बलों से भी अलग होती है और आमतौर पर आपात स्थिति में ही इन्हें तैनात किया जाता है। 

दुश्मन के इलाके में पैराशूट ड्रॉप: इन सैनिकों को दुश्मन की सीमा के पीछे उन इलाकों में पैराशूट से उतरने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, जहां विमानों के लिए कोई सुरक्षित लैंडिंग जोन नहीं होता। इनका प्राथमिक लक्ष्य रणनीतिक बिंदुओं, प्रमुख क्षेत्रों, पुलों और हवाई अड्डों पर तेजी से कब्जा करना होता है। 

ऑपरेशन्स को आकार देने में भूमिका: 82वीं एयरबोर्न डिवीजन लंबे और भारी युद्ध अकेले लड़ने के लिए नहीं बनाई गई है। इनका काम सबसे पहले घुसकर शुरुआती अनिश्चित माहौल को स्थिर करना और पीछे से आ रही भारी सेना (जैसे मरीन या बख्तरबंद बल) के लिए सुरक्षित रास्ता बनाना होता है। 

कम हथियारों वाले पैदल सैनिक, चौंकाने की क्षमता: 82वीं एयरबोर्न डिवीजन की एक खास बात यह है कि यह भारी टैंकों या हथियारों पर निर्भर नहीं रहती। इसके सैनिक पैदल सेना को मिलने वाले मानक हथियारों, टैंक-रोधी प्रणाली और पोर्टेबल संचार उपकरणों से लैस होते हैं। इनकी असली ताकत भारी गोलाबारी में नहीं, बल्कि तेजी और दुश्मन को चौंकाने लचीली गतिशीलता है।

मानवरहित तकनीक और ड्रोन्स का इस्तेमाल: आधुनिक युद्ध के लिए यह बल स्मार्ट मशीनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहा है, जिससे इनकी मारक क्षमता आम सेनाओं से 300% दर्ज की गई है। अमेरिकी मीडिया ग्रुप एक्सियोस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुश्मन की टोह लेने और उन पर सटीक हमले करने के लिए वे लंबी दूरी के ड्रोन्स और स्विचब्लेड ड्रोन्स का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें एक बैग में भी रखा जा सकता है।

इसके अलावा रसद की आपूर्ति के लिए यह डिवीजन अल्ट्राज नाम के ऑटोमैटिक जमीनी वाहनों का इस्तेमाल करती है। ये रोबोटिक वाहन 1,000 पाउंड तक का वजन उठा सकते हैं, 100 मील तक चल सकते हैं और नाइटविजन जैसी तकनीक की वजह से रात के अंधेरे में होने वाली रसद आपूर्ति को और तेजी से पूरा करते हैं।

आजाद निर्णय क्षमता और मानसिक मजबूती: इस डिवीजन के सैनिकों का प्रशिक्षण शारीरिक और मानसिक रूप से बेहद कठोर होता है। युद्ध के मैदान में छितरे हुए माहौल और सीमित संचार के बीच, इन पैराट्रूपर्स को बेहद दबाव में स्वतंत्र रूप से और वास्तविक समय में त्वरित निर्णय लेने के लिए तैयार किया जाता है।

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ईरान से युद्ध में किस तरह तैनाती की तैयारी कर रहा अमेरिका?

हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका एक तरफ तो ईरान के साथ बातचीत की कोशिश दिखा रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह तनाव के बीच पश्चिम एशिया में 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के 2,000 से 3,000 सैनिकों को तैनात कर रहा है। द वॉल स्ट्रीट जर्नल और न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध की स्थिति में इस सैन्य बल का इस्तेमाल खर्ग द्वीप, जो ईरान के तेल निर्यात के लिए बेहद अहम है और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील और रणनीतिक स्थलों को सुरक्षित करने के लिए किया जा सकता है।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की पश्चिम एशिया में यह नई तैनाती ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह ध्वस्त करने और संवर्धित परमाणु पदार्थों को कब्जे में लेने के लिए हो सकती है। आशंका जताई गई है कि अगर यह युद्ध जारी रहता है तो 82वीं एयरबोर्न डिवीजन क्षेत्र में भेजे जा रहे मरीन बलों के साथ बेहतरीन तालमेल बिठा सकती है। 

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