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BMC Election: 25 साल में कितने बदले मराठी माणुस के हालात, जमीन पर हुआ काम या सिर्फ भावनात्मक नारों तक रही बात

Media Marketing Initiatives Published by: मार्केटिंग डेस्क Updated Fri, 09 Jan 2026 05:08 PM IST
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BMC Election How much lives of the Marathi people changed in 25 years Was any work done on the ground
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस - फोटो : PTI
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मुंबई, जिसे देश की आर्थिक राजधानी भी कहते हैं, 106 वीरों के बलिदान से यह शहर अस्तित्व में आया। ये मराठी लोग संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में शहीद हुए थे। आज इसी मुंबई के बीएमसी चुनाव में मराठी अस्मिता एक बड़ा मुद्दा बन गया है। 

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मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी)  पर पिछले करीब तीन दशक से शिवसेना का कब्जा रहा है। इस वक्त भी उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) सत्ता में है। सवाल यह है कि बीते तीन दशक में मराठी समुदाय आगे बढ़ा या उसकी स्थिति बदतर हुई?  

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कितनी बदली मुंबई की सूरत?

लालबाग, परेल, शिवड़ी, दादर और गिरगांव कभी मुंबई का दिल माने जाते थे। मराठी संस्कृति की जड़ों से विकसित इन इलाकों का पिछले ढाई दशकों में तेजी शहरीकरण हुआ है। मिलों की चिमनियां खामोश होकर कांच के विशाल टॉवरों में बदल गई हैं। इन टॉवरों के निर्माण की अनुमति देते वक्त यह वादा किया था कि "मराठी लोगों को वहीं घर मिलेंगे।" हालांकि, ऐसा हुआ नहीं। इसके चलते इन इलाकों में रहने वाले मूल मराठी लोगों को दक्षिण और मध्य मुंबई से विस्थापित होकर विरार, कर्जत, कसारा और बदलापुर जैसे शहर के बाहरी इलाकों में बसना पड़ा।  

सबसे अमीर ठेकेदारों में कितने मराठी? 

बीएमसी का सालाना बजट ₹50,000 करोड़ से अधिक है। आरोप है कि मुंबई में सड़क, नाला सफाई या पुल निर्माण जैसी निविदा प्रक्रियाओं में मराठी युवाओं या स्थानीय ठेकेदारों को प्राथमिकता नहीं दी गई। उनकी जगह धनाढ्य समूहों के हित साधने पर ध्यान केंद्रित किया गया। इसके चलते मुंबई के सबसे अमीर ठेकेदारों की सूची में आज मराठी नाम ढूंढने पर भी नहीं मिलते। कई लोगों का मत है कि आज के मुंबई में मराठी समुदाय 'वड़ापाव' और 'भजी' जैसे छोटे धंधों तक सीमित रह गया है, क्योंकि बड़े आर्थिक नियंत्रण प्रभावशाली लोगों ने अपने पास रखे हैं।

मराठी शिक्षा की हालत कैसी?

बीते तीन दशक में मराठी स्कूलों की स्थिति दयनीय हो गई है। मनपा के मराठी विद्यालय बंद हुए और उनकी छात्र संख्या घटी हैं। वहीं, निजी अंग्रेजी माध्यम के स्कूल तेजी से फले-फूले। आरोप है कि मराठी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिलाने के बजाय, इसे सिर्फ चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया।

चुनावी माहौल और बदले हुए समीकरण 

मुंबई के इस बार के महानगरपालिका चुनाव में एक बार फिर 'मराठी माणुस के संरक्षक' होने की बातें की जा रही हैं, लेकिन इस बार मतदाता इन आश्वासनों से कितने प्रभावित होंगे? यह एक बड़ा सवाल है। राजनीतिक जानकार कहते हैं कि इस बार मराठी युवा खुलकर कह रहे हैं कि केवल भावनात्मक भाषणों से पेट नहीं भरता।

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