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क्या ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है उद्धव ठाकरे की शिवसेना, बाला साहेब ठाकरे और उनकी विचारधारा में कितना फर्क?
मुंबई
Published by: मार्केटिंग डेस्क
Updated Sun, 11 Jan 2026 05:11 PM IST
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सार
महाराष्ट्र की राजनीति में ‘ठाकरे’ नाम केवल एक उपनाम नहीं, बल्कि एक विशिष्ट राजनीतिक सोच, पहचान और प्रभाव का प्रतीक रहा है। दशकों से यह नाम राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है।
उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक साथ (फाइल फोटो)
- फोटो : manifesto
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विस्तार
शिवसेना की स्थापना बालासाहेब ठाकरे ने की थी और समय के साथ यह पार्टी महाराष्ट्र की राजनीति की एक प्रमुख शक्ति बनी। आज यह पार्टी उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में एक ऐसे दौर से गुजर रही है जिसे कई लोग निर्णायक मानते हैं। हाल के वर्षों में उद्धव ठाकरे के राजनीतिक फैसलों को अलग-अलग नजरिए से देखा गया है और इन पर व्यापक चर्चा होती रही है।
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बालासाहेब ठाकरे के राजनीतिक जीवन में कांग्रेस और राकांपा का विरोध उनकी पहचान का अहम हिस्सा था। हालांकि, राजनीति में परिस्थितियां और समीकरण बदलते रहते हैं। इसी क्रम में 2019 में उद्धव ठाकरे ने इन्हीं दलों के साथ ‘महाविकास आघाड़ी’ गठबंधन बनाया। कुछ विश्लेषक इसे समय की मांग मानते हैं, जबकि कुछ इसे शिवसेना की पुरानी राजनीतिक लाइन से अलग कदम के रूप में देखते हैं।
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बालासाहेब ठाकरे का एक प्रसिद्ध कथन अक्सर इस संदर्भ में उद्धृत किया जाता है, “मैं शिवसेना का कांग्रेस में विलय करने के बजाय अपनी दुकान बंद करना पसंद करूंगा।” आज बदले हुए राजनीतिक हालात में शिवसेना कांग्रेस के साथ मिलकर काम कर रही है, जिसे राजनीतिक बदलावों और व्यावहारिक जरूरतों के संदर्भ में भी देखा जाता है।
कुछ आलोचक मानते हैं कि सत्ता संतुलन और संगठनात्मक नियंत्रण बनाए रखने की कोशिशों ने पार्टी की पारंपरिक पहचान को प्रभावित किया, जिससे पार्टी के भीतर असंतोष और मतभेद बढ़े। वहीं, समर्थकों का तर्क है कि बदलते समय के साथ राजनीतिक रणनीतियों में लचीलापन जरूरी होता है।
सत्ता का समीकरण
बालासाहेब ठाकरे को ‘हिंदू हृदय सम्राट’ के नाम से जाना जाता था, जिनका हिंदुत्व आक्रामक और स्पष्ट था। जब उद्धव ठाकरे ने सत्ता के लिए कांग्रेस से हाथ मिलाया, तो उन पर “भगवा रंग फीका पड़ने” का आरोप लगा। हालांकि, सत्ता में आने के बाद उद्धव ठाकरे ने अलग-अलग मुद्दों पर सतर्क रुख अपनाया।
उनके समर्थकों का दावा है कि उनका हिंदुत्व ‘मानवीय मूल्यों’ पर आधारित है, जो नफरत फैलाने वाला नहीं है। उनके समर्थकों का कहना है कि उनका दृष्टिकोण सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों पर आधारित है।
नेतृत्व शैली में अंतर
बालासाहेब ठाकरे का नेतृत्व शैली सीधी और निर्णायक मानी जाती थी। इसके विपरीत, उद्धव ठाकरे को गठबंधन राजनीति के दौर में विभिन्न दलों के साथ समन्वय बनाकर चलना पड़ा। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए विभाजन और उससे जुड़ी कानूनी व राजनीतिक प्रक्रिया ने भी शिवसेना की दिशा और पहचान को लेकर बहस को और तेज किया। शिंदे गुट का दावा रहा कि वह बालासाहेब की मूल विचारधारा को आगे बढ़ा रहा है, जबकि उद्धव ठाकरे पक्ष इसे अपनी राजनीतिक यात्रा का हिस्सा मानता है। चुनाव आयोग के फैसले के बाद यह विवाद और औपचारिक रूप से सामने आया, जिसने पार्टी के भविष्य और नेतृत्व को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए।
बदलता समय और शिवसेना का भविष्य
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना गठबंधन-आधारित राजनीतिक मॉडल की ओर बढ़ती दिखाई देती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव समय, परिस्थितियों और मतदाता अपेक्षाओं के अनुरूप ढलने की कोशिश का हिस्सा हो सकता है। वे मानते हैं कि यदि बालासाहेब की वास्तविक विरासत सिर्फ आक्रामकता और कट्टरता ही थी, तो उद्धव ठाकरे अभी उससे अलग खड़े दिखाई देते हैं।