EV: फास्ट चार्जिंग या बैटरी स्वैपिंग, इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए कौन सा विकल्प है ज्यादा व्यवहारिक?
Battery Swapping vs Fast Charging: इलेक्ट्रिक वाहनों में अब सबसे बड़ी चिंता रेंज नहीं बल्कि चार्जिंग टाइम है। बैटरी स्वैपिंग मॉडल 3-4 मिनट में बैटरी बदलने का विकल्प देता है लेकिन इसमें ज्यादा लागत, कम रेंज और नेटवर्क पर निर्भरता जैसी चुनौतियां हैं। वहीं फास्ट चार्जिंग तकनीक 15 मिनट में चार्जिंग संभव बना रही है और चार्जिंग नेटवर्क भी तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार आम इस्तेमाल के लिए फास्ट चार्जिंग ज्यादा व्यावहारिक और भविष्य का बेहतर विकल्प साबित हो सकती है।
विस्तार
इलेक्ट्रिक गाड़ियों को लेकर लोगों की सबसे बड़ी चिंता अब रेंज नहीं बल्कि चार्जिंग टाइम है। यानी गाड़ी कितनी दूर जाएगी से बड़ा सवाल ये है कि उसे जल्दी और आसानी से चार्ज कैसे किया जाए। कुछ साल पहले जब फास्ट चार्जिंग में कई घंटे लगते थे तब बैटरी स्वैपिंग को एक अच्छा समाधान माना गया। लेकिन आज तकनीक बदल चुकी है। इसे परिस्थिती को चार्जिंग एंग्जायटी कहते हैं। यानी गाड़ी कितनी चलेगी से ज्यादा चिंता इस बात की है कि उसे जल्दी और आसानी से चार्ज कैसे किया जाए। तो आज के समय में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या स्वैपेबल बैटरी अब भी सही रास्ता है?
बैटरी स्वैपिंग कैसे काम करती है?
बैटरी स्वैपिंग मॉडल में गाड़ी की बैटरी फिक्स नहीं होती। ड्राइवर खाली बैटरी निकालकर स्टेशन पर देता है और बदले में चार्ज की हुई बैटरी ले लेता है। ये प्रक्रिया 3-4 मिनट में पूरी हो सकती है इसलिए पहली नजर में यह बहुत सुविधाजनक लगती है। लेकिन असली समस्या यहां से शुरू होती है। जो खाली बैटरियां स्टेशन पर जमा होती हैं उन्हें फिर से चार्ज करने में 2-3 घंटे लगते हैं। अगर एक ही समय में कई गाड़ियां आ जाएं तो चार्ज बैटरियां खत्म हो सकती हैं और लोगों को इंतजार करना पड़ सकता है। यानी यह समाधान असली चार्जिंग टाइम को कम नहीं करता बल्कि बस सामने से समय बचाने जैसा लगता है।
खर्च ज्यादा क्यों पड़ता है?
इस मॉडल में बैटरी वाहन मालिक की नहीं बल्कि नेटवर्क कंपनी की होती है। कंपनी को हर गाड़ी के लिए एक बैटरी अंदर और कई अतिरिक्त बैटरियां स्टॉक में रखनी पड़ती हैं। इससे निवेश बढ़ता है और वही खर्च बाद में ग्राहकों से वसूला जाता है। शुरुआत में गाड़ी सस्ती लग सकती है क्योंकि बैटरी नहीं खरीदनी पड़ती लेकिन हर महीने का स्वैप खर्च आम चार्जिंग से ज्यादा हो सकता है।
रेंज कम क्यों मिलती है?
एक और बड़ी समस्या रेंज की है। बैटरी को ऐसा बनाना पड़ता है कि ड्राइवर उसे हाथ से निकाल सके इसलिए उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा जाता है। इससे ज्यादा केसिंग और पार्ट्स लगते हैं, जगह भी ज्यादा घिरती है और कुल क्षमता कम हो जाती है। जहां फिक्स्ड बैटरी वाले थ्री-व्हीलर में 10-12 kWh बैटरी मिलती है वहीं स्वैप मॉडल में आमतौर पर 4.5-6 kWh तक सीमित रहती है। इसका मतलब है कम रेंज और स्टेशन के ज्यादा चक्कर लगाने की मजबूरी बनी रहती है।
बड़ी गाड़ियों में क्यों मुश्किल?
बड़ी गाड़ियों जैसे कार, बस या ट्रक में बैटरी बहुत भारी होती है। उन्हें हाथ से बदलना संभव नहीं है इसलिए महंगे ऑटोमेटेड सिस्टम की जरूरत पड़ती है। इसके मुकाबले फास्ट चार्जिंग में सिर्फ प्लग लगाना होता है जो ज्यादा आसान और कम खर्चीला है। इसके अलावा स्वैपिंग मॉडल में ड्राइवर अक्सर एक ही कंपनी के नेटवर्क पर निर्भर हो जाता है। वह दूसरी कंपनी के स्टेशन का इस्तेमाल नहीं कर सकता और घर पर चार्जिंग का विकल्प भी सीमित हो सकता है। जबकि फास्ट चार्जिंग वाली गाड़ी अलग-अलग नेटवर्क और स्टैंडर्ड पोर्ट का फायदा उठा सकती है।
कंपनियां क्यों नहीं अपनातीं बैटरी स्वैपिंग?
इसी वजह से बहुत कम कंपनियों ने बड़े स्तर पर बैटरी स्वैपिंग को अपनाया है। चीन की नियो और ताइवान की गोगोरो जैसी कंपनियों ने अपने इंटीग्रेटेड मॉडल में इसे लागू किया है। लेकिन ज्यादातर ईवी अब भी फिक्स्ड बैटरी के साथ आते हैं।
तो सही चुनाव क्या है?
आज जब 15 मिनट में रैपिड चार्जिंग संभव हो रही है और चार्जिंग नेटवर्क तेजी से बढ़ रहा है। तो साफ दिखता है कि असली समाधान बेहतर बैटरी तकनीक और तेज चार्जिंग में है। बैटरी स्वैपिंग कुछ खास जरूरतों के लिए ठीक हो सकती है लेकिन आम उपयोग के लिए फास्ट चार्जिंग ही ज्यादा व्यावहारिक और भविष्य का रास्ता नजर आती है।