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सुपरकार का सौदा और कानूनी जंग: कर्नाटक हाई कोर्ट ने RTO की कार्यप्रणाली पर जताई कड़ी आपत्ति

ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amar Sharma Updated Thu, 14 May 2026 09:08 PM IST
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सार

जो बात एक रियायती सुपरकार की खरीद के तौर पर शुरू हुई थी, वह जल्द ही एक कानूनी लड़ाई में बदल गई। जिसमें जालसाजी, टैक्स चोरी और FIR के आरोप शामिल थे। और फिर कर्नाटक हाई कोर्ट ने दखल देते हुए, गाड़ी जब्त करने के दौरान एक RTO अधिकारी के रवैये पर सवाल उठाए।

Demo Supercar Dispute High Court Rebukes Bengaluru RTO for Seizing Vehicle from Owner’s Home Without Authority
Supercar Legal Battle Court Justice - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

बंगलूरू में एक 'डेमो सुपरकार' की खरीद से शुरू हुआ मामला जालसाजी, टैक्स चोरी के आरोपों और एफआईआर तक पहुंच गया। आखिरकार कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए आरटीओ (RTO) अधिकारी द्वारा वाहन जब्त करने के तरीके पर कड़े सवाल खड़े किए और एफआईआर को रद्द कर दिया।

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यह विवाद कैसे शुरू हुआ?

मामले की शुरुआत एक सुपरकार की खरीद-बिक्री से हुई, जिसके बाद कानूनी पेच फंस गए:

  • कार की खरीद: बंगलूरू निवासी रामा ने 1 सितंबर, 2025 को एक डिस्काउंट पर उपलब्ध डेमो सुपरकार खरीदी थी। यह कार 2021 में बनी थी और 2022 में इसका संक्षिप्त पंजीकरण हुआ था, जिसके बाद पहले मालिक ने इसे वापस कर दिया था।

  • अचानक जब्ती: 7 फरवरी, 2026 को बंगलूरू के एक वरिष्ठ आरटीओ अधिकारी ने अन्य अधिकारियों के साथ रामा की अनुपस्थिति में उनके परिसर में प्रवेश किया और वाहन को जब्त कर लिया। कार को यलहंका न्यू टाउन पुलिस स्टेशन ले जाया गया।

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Demo Supercar Dispute High Court Rebukes Bengaluru RTO for Seizing Vehicle from Owner’s Home Without Authority
कर्नाटक उच्च न्यायालय - फोटो : एएनआई (फाइल)

कार मालिक पर क्या आरोप लगाए गए थे?

जब रामा घर लौटे, तो उन्हें पता चला कि उनके खिलाफ 'जीरो एफआईआर' और आपराधिक मामला दर्ज किया गया है:

  • कानूनी धाराएं: उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4) और 336(3) के तहत धोखाधड़ी, जालसाजी और दस्तावेजों के फर्जीवाड़े के आरोप लगाए गए।

  • टैक्स चोरी का दावा: सरकारी अभियोजक ने तर्क दिया कि फर्जी इनवॉइस और हेरफेर किए गए पंजीकरण रिकॉर्ड के कारण सरकारी खजाने को वित्तीय नुकसान हुआ है।

  • रिकॉर्ड में हेरफेर: आरोप था कि आरटीओ डेटाबेस में बदलाव कर कार को नया दिखाने की कोशिश की गई। जबकि वह लगभग चार साल से बिना पंजीकरण के थी।

कोर्ट में मालिक के वकील ने क्या दलीलें दीं?

रामा के वकील वेंकटेश एस. अरबत्ती ने आरटीओ और पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए:

  • सूचना का अभाव: उन्होंने कहा कि कार ले जाने के बाद उनके मुवक्किल को यह नहीं बताया गया कि उसे कहां ले जाया गया है, जिससे उन्हें दर-दर भटकना पड़ा।

  • वाहन की रिहाई: इसके बाद बीएनएसएस (BNSS) के प्रावधानों के तहत वाहन को छोड़ने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया गया।

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कर्नाटक उच्च न्यायालय - फोटो : karnataka high court

कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस मामले पर क्या टिप्पणी की?

जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए अधिकारियों के व्यवहार की आलोचना की:

  • अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन: कोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि अधिकारियों के पास बिना उचित कानूनी अधिकार के किसी के घर में घुसने और वाहन ले जाने का कोई "जनादेश" (मैंडेट) नहीं है।

  • जब्ती पर सवाल: हाई कोर्ट ने कहा कि सरकारी अभियोजक भी इस तरह की जब्ती के लिए इस्तेमाल की गई शक्ति को उचित नहीं ठहरा सके।

  • कड़ी चेतावनी: अदालत ने आरटीओ रिकॉर्ड में कथित हेरफेर की जांच की अनुमति तो दी। लेकिन वाहन को जब्त करने के तरीके पर सख्त आपत्ति जताई और चेतावनी दी कि ऐसी हरकत दोबारा नहीं होनी चाहिए।


कर्नाटक हाई कोर्ट ने आखिरकार एफआईआर को रद्द कर दिया और स्पष्ट किया कि कानून लागू करने वाले अधिकारियों को अपनी शक्तियों का उपयोग कानूनी दायरे में रहकर ही करना चाहिए। यह फैसला व्यक्तिगत संपत्ति और कानूनी प्रक्रियाओं के सम्मान के महत्व को रेखांकित करता है। 

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