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Bio-Bitumen: भारत बायो-बिटुमेन बनाने वाला पहला देश बना, यह हरित तकनीक कैसे घटाएगी वायु प्रदूषण?
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमर शर्मा
Updated Fri, 09 Jan 2026 10:54 PM IST
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सार
भारत ने बायो-बिटुमेन का कमर्शियल उत्पादन करने वाला पहला देश बनकर इतिहास रच दिया है। यह एक जबरदस्त तरक्की है जिसका मकसद हवा में प्रदूषण को कम करना और इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाना है।
National Highway
- फोटो : X/@Nitin_Gadkari
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विस्तार
भारत ने एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि हासिल करते हुए दुनिया का पहला देश बनने का गौरव हासिल किया है, जिसने बायो-बिटुमेन का व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया है। यह पारंपरिक पेट्रोलियम आधारित बिटुमेन का एक टिकाऊ विकल्प है, जिसे कृषि अवशेषों, खासतौर पर धान की पराली से तैयार किया जाता है। इस पहल का उद्देश्य सड़क निर्माण को अधिक पर्यावरण-अनुकूल बनाना और वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से निपटना है।
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बायो-बिटुमेन क्या है और यह कैसे बनाया जाता है?
बायो-बिटुमेन सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाला एक बाइंडिंग मटेरियल है, जो पारंपरिक बिटुमेन का 20 से 30 प्रतिशत तक विकल्प बन सकता है, बिना गुणवत्ता या मजबूती से समझौता किए। इसे पायरोलिसिस प्रक्रिया के जरिए तैयार किया जाता है। जिसमें कृषि अपशिष्ट को ऑक्सीजन रहित वातावरण में गर्म किया जाता है। इससे बनने वाले बायो-ऑयल को आगे परिष्कृत कर बिटुमेन में मिलाया जाता है। यह प्रक्रिया न सिर्फ निर्माण लागत घटाती है, बल्कि फसल अवशेष जलाने से होने वाले प्रदूषण को भी कम करती है।
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बायो-बिटुमेन सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाला एक बाइंडिंग मटेरियल है, जो पारंपरिक बिटुमेन का 20 से 30 प्रतिशत तक विकल्प बन सकता है, बिना गुणवत्ता या मजबूती से समझौता किए। इसे पायरोलिसिस प्रक्रिया के जरिए तैयार किया जाता है। जिसमें कृषि अपशिष्ट को ऑक्सीजन रहित वातावरण में गर्म किया जाता है। इससे बनने वाले बायो-ऑयल को आगे परिष्कृत कर बिटुमेन में मिलाया जाता है। यह प्रक्रिया न सिर्फ निर्माण लागत घटाती है, बल्कि फसल अवशेष जलाने से होने वाले प्रदूषण को भी कम करती है।
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यह तकनीक वायु प्रदूषण को कैसे कम करेगी?
उत्तर भारत में हर साल पराली जलाने से हवा की गुणवत्ता गंभीर रूप से प्रभावित होती है। बायो-बिटुमेन इस समस्या का व्यावहारिक समाधान पेश करता है क्योंकि इसमें पराली को जलाने के बजाय उपयोग में लाया जाता है।
मुख्य प्रभाव इस प्रकार हैं:
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उत्तर भारत में हर साल पराली जलाने से हवा की गुणवत्ता गंभीर रूप से प्रभावित होती है। बायो-बिटुमेन इस समस्या का व्यावहारिक समाधान पेश करता है क्योंकि इसमें पराली को जलाने के बजाय उपयोग में लाया जाता है।
मुख्य प्रभाव इस प्रकार हैं:
- पराली जलाने की जरूरत घटेगी, जिससे स्मॉग और PM2.5 जैसे प्रदूषक कम होंगे।
- कृषि अपशिष्ट को आर्थिक संसाधन में बदला जा सकेगा।
- निर्माण और परिवहन से जुड़ी उत्सर्जन लागत में कमी आएगी।
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इस पहल के पीछे कौन है और सरकार क्या कहती है?
इस परियोजना का नेतृत्व वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) कर रही है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इसे भारत के "फॉसिल फ्यूल से बायो-आधारित समाधानों की ओर संक्रमण" का अहम कदम बताया है। यह पहल सर्कुलर इकोनॉमी और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्यों के अनुरूप है।
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इस परियोजना का नेतृत्व वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) कर रही है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इसे भारत के "फॉसिल फ्यूल से बायो-आधारित समाधानों की ओर संक्रमण" का अहम कदम बताया है। यह पहल सर्कुलर इकोनॉमी और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्यों के अनुरूप है।
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सड़क और बुनियादी ढांचे पर इसका क्या असर होगा?
बायो-बिटुमेन से बनी सड़कों की उम्र अधिक होने और रखरखाव लागत कम रहने की उम्मीद है। इसका पहला सफल प्रयोग जोराबाट-शिलांग एक्सप्रेसवे पर किया जा चुका है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के अनुसार, इस तकनीक से भारत हर साल करीब 25,000-30,000 करोड़ रुपये की बचत कर सकता है, क्योंकि आयातित बिटुमेन पर निर्भरता घटेगी।
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बायो-बिटुमेन से बनी सड़कों की उम्र अधिक होने और रखरखाव लागत कम रहने की उम्मीद है। इसका पहला सफल प्रयोग जोराबाट-शिलांग एक्सप्रेसवे पर किया जा चुका है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के अनुसार, इस तकनीक से भारत हर साल करीब 25,000-30,000 करोड़ रुपये की बचत कर सकता है, क्योंकि आयातित बिटुमेन पर निर्भरता घटेगी।
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आगे की राह क्या है?
कृषि अपशिष्ट को उपयोगी संसाधन में बदलने वाली यह पहल न सिर्फ पर्यावरणीय संकट का समाधान देती है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे और प्रदूषण नियंत्रण - तीनों मोर्चों पर लाभ पहुंचाती है। आने वाले वर्षों में बायो-बिटुमेन भारत की सड़कों के साथ-साथ स्वच्छ हवा की दिशा में भी एक मजबूत आधार बन सकता है।
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कृषि अपशिष्ट को उपयोगी संसाधन में बदलने वाली यह पहल न सिर्फ पर्यावरणीय संकट का समाधान देती है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे और प्रदूषण नियंत्रण - तीनों मोर्चों पर लाभ पहुंचाती है। आने वाले वर्षों में बायो-बिटुमेन भारत की सड़कों के साथ-साथ स्वच्छ हवा की दिशा में भी एक मजबूत आधार बन सकता है।
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