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Auto Component: ऑटो कंपोनेंट सेक्टर में स्थिर बढ़त, लेकिन स्थानीयकरण की चुनौती बरकरार

ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अमर शर्मा Updated Sat, 24 Jan 2026 09:11 PM IST
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सार

भारत की ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री ने FY26 की पहली छमाही में मजबूत ग्रोथ दी। लेकिन बढ़ते आयात से आगे आने वाली स्ट्रक्चरल चुनौतियों का पता चलता है।

India’s Auto Component Industry Grows 6.8% Despite Rising Imports
Indian Auto Industry - फोटो : X
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विस्तार
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भारत के ऑटो कंपोनेंट उद्योग ने FY26 की पहली छमाही में वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद संतुलित प्रदर्शन किया है। घरेलू मांग और निर्यात से मजबूती मिली, लेकिन तेजी से बढ़ते आयात ने यह साफ कर दिया कि सेक्टर के सामने लोकलाइजेशन (स्थानीय निर्माण) से जुड़ी संरचनात्मक चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं।
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ACMA के आंकड़े क्या कहते हैं?
उद्योग संगठन ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ACMA) के मुताबिक, ऑटो कंपोनेंट सेक्टर ने H1 FY26 में 6.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। यह बढ़त ऐसे समय आई है, जब वैश्विक मांग में सुस्ती और सप्लाई-चेन दबाव बने हुए हैं।
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इस ग्रोथ को घरेलू बाजार से मजबूत सपोर्ट मिला, वहीं निर्यात ने भी स्थिर रफ्तार बनाए रखी, जिससे भारत की ग्लोबल OEM सोर्सिंग हब के रूप में भूमिका और मजबूत हुई।

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OEM सप्लाई और आफ्टरमार्केट की स्थिति
OEM को सप्लाई में 7.3 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। इसमें पैसेंजर व्हीकल और लाइट कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट की मांग का बड़ा योगदान रहा।

आफ्टरमार्केट ने 9 प्रतिशत की मजबूत ग्रोथ दिखाई। इसका कारण नेटवर्क विस्तार, बेहतर क्षमता उपयोग और सर्विस व रिप्लेसमेंट चैनलों में बढ़ती औपचारिकता रहा।

निर्यात बना बड़ी ताकत
H1 FY26 में ऑटो कंपोनेंट निर्यात 9.3 प्रतिशत बढ़कर 12.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह तब हुआ, जब कुछ विदेशी बाजारों में मांग कमजोर बनी हुई थी।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, जाटो डायनैमिक्स के रवि भाटिया का कहना है कि यह प्रदर्शन बताता है कि वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत की कॉस्ट और क्वालिटी प्रतिस्पर्धा बेहतर हुई है। हालांकि उन्होंने चेताया कि आयात में बढ़ोतरी और ट्रेड डेफिसिट की वापसी रणनीतिक फोकस की जरूरत को उजागर करती है।

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ट्रेड पैराडॉक्स: निर्यात बढ़ा, आयात भी तेज
इस अवधि में आयात 12.5 प्रतिशत बढ़ा, जिससे उद्योग फिर से हल्के ट्रेड डेफिसिट में चला गया। इससे खास तौर पर हाई-वैल्यू और टेक्नोलॉजी-इंटेंसिव कंपोनेंट्स में लोकलाइजेशन की कमी सामने आई है।

उद्योग से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि अब:
  • गहरी लोकलाइजेशन रणनीति
  • स्मार्ट प्रोडक्ट पोर्टफोलियो
  • और चुनिंदा निर्यात बाजारों पर फोकस
अत्यंत जरूरी हो गया है।

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इलेक्ट्रिफिकेशन की धीमी लेकिन स्थिर प्रगति
इलेक्ट्रिक वाहनों से जुड़े कंपोनेंट्स का योगदान OEM सप्लाई में 4.6 प्रतिशत रहा। यह संकेत देता है कि ईवी की ओर संक्रमण जारी है, लेकिन सप्लायर्स अभी ICE प्लेटफॉर्म और नई इलेक्ट्रिक तकनीक, दोनों में निवेश का संतुलन बना रहे हैं।

आगे क्या बदलेगा तस्वीर?
FY26 की दूसरी छमाही में कई नीतिगत कारक असर दिखा सकते हैं, जिनमें:
  • पिछले साल घोषित GST रेशनलाइजेशन
  • और फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTA) का प्रभाव
शामिल है।

विश्लेषकों का कहना है कि जो सप्लायर्स डेटा-आधारित मार्केट प्रायोरिटाइजेशन और रीजनल टेक्नोलॉजी ट्रेंड्स के हिसाब से रणनीति बनाएंगे, उन्हें आने वाले महीनों में सबसे ज्यादा फायदा मिल सकता है।

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