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India’s EV Sector: भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी पर संकट? चीन के नए नियमों से बढ़ सकती है टेंशन
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Suyash Pandey
Updated Thu, 19 Mar 2026 05:21 PM IST
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सार
China Lithium Export Restrictions: भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की डिमांड तेजी से बढ़ रही है लेकिन बैटरी के लिए जरूरी 'लिथियम' के लिए देश आज भी 100 प्रतिशत आयात पर निर्भर है। चीन के नए निर्यात प्रतिबंधों ने भारतीय ईवी कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है। जानिए क्या आने वाले समय में इलेक्ट्रिक गाड़ियां महंगी हो जाएंगी और इस संकट से निपटने का क्या उपाय है।
जरूरी लिथियम और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के लिए भारत अभी भी पूरी तरह से दूसरे देशों पर निर्भर है
- फोटो : एआई
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विस्तार
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है लेकिन इस बढ़ती रफ्तार के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी है। देश में ईवी बैटरी बनाने के लिए जरूरी लिथियम और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के लिए भारत अभी भी पूरी तरह से दूसरे देशों पर निर्भर है। हाल ही में संसद में भारी उद्योग राज्य मंत्री भूपतिराजू श्रीनिवास वर्मा ने एक लिखित जवाब में बताया कि देश में लिथियम-आयन बैटरी के कच्चे माल की 100% मांग आयात के जरिए ही पूरी की जा रही है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर ग्लोबल मार्केट में कोई भी हलचल होती है तो इसका सीधा असर भारत के ईवी सेक्टर पर पड़ेगा।
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चीन के नए नियमों से क्यों बढ़ी चिंता?
सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) की जानकारी का हवाला देते हुए मंत्री ने बताया कि भारत लिथियम जैसे अहम खनिजों के लिए आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर है। हाल ही में चीन ने एक बड़ा फैसला लेते हुए हाई-परफॉर्मेंस लिथियम-आयन बैटरी, कैथोड मटेरियल, और इससे जुड़ी मैन्युफैक्चरिंग तकनीक के निर्यात पर कड़े कंट्रोल और लाइसेंसिंग नियम लगा दिए हैं। चूंकि भारत की कई ईवी कंपनियां बैटरी से जुड़े कच्चे माल की प्रोसेसिंग के लिए चीन पर काफी हद तक निर्भर हैं, इसलिए चीन के इस कदम से भारतीय कंपनियों के लिए कच्चे माल की सप्लाई चेन बिगड़ सकती है।
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क्या महंगी हो जाएंगी इलेक्ट्रिक गाड़ियां?
बैटरी में इस्तेमाल होने वाला लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे अहम खनिज ग्लोबल मार्केट में ट्रेड होते हैं और इनकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डिमांड-सप्लाई से ही तय होती हैं। ऐसे में अगर चीन के नए प्रतिबंधों के कारण इनकी सप्लाई में थोड़ी भी रुकावट आती है तो कच्चे माल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। कच्चे माल के महंगा होने का सीधा मतलब है कि भारतीय ईवी कंपनियों की मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट (लागत) बढ़ जाएगी। जाहिर है, कंपनियां इस बढ़ी हुई लागत का बोझ खुद नहीं उठाएंगी। इसका सीधा असर ग्राहकों की जेब पर पड़ेगा और आने वाले समय में इलेक्ट्रिक गाड़ियां महंगी हो सकती हैं।क्या है राहत की बात?
हालांकि, राहत की बात यह है कि स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। मंत्री ने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में बैटरी की कीमतें सिर्फ कच्चे माल के आयात पर निर्भर नहीं करेंगी। अगर देश में बैटरी बनाने की नई और बेहतर तकनीक विकसित होती है, बहुत बड़े पैमाने पर इनका प्रोडक्शन शुरू होता है और भारत में ही बैटरी बनाने की दिशा में तेजी से काम किया जाता है तो इन बाहरी चुनौतियों से आसानी से निपटा जा सकता है। इन स्वदेशी प्रयासों से बैटरी की कीमतों को भी भविष्य में कंट्रोल में रखा जा सकेगा। कुल मिलाकर निष्कर्ष यही निकलता है कि मौजूदा हालात को देखते हुए भारत को जल्द से जल्द ईवी बैटरी के मामले में आत्मनिर्भर बनने की सख्त जरूरत है।
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