Middle East Tension: कार कंपनियों की बढ़ी टेंशन, गैस की कमी से गाड़ियों का प्रोडक्शन हो सकता है प्रभावित
India Auto Sector Gas Shortage Impact: पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण भारत में 'इंडस्ट्रियल गैस' की किल्लत हो गई है। इसका सीधा असर ऑटोमोबाइल सेक्टर पर पड़ रहा है। गैस की कमी और महंगे ईंधनों के इस्तेमाल से गाड़ियों का प्रोडक्शन धीमा हो सकता है और इन्हें बनाने की लागत भी बढ़ सकती है। इस स्थिति से निपटने के लिए कंपनियों के पास कितना स्टॉक है और क्या ग्राहकों को गाड़ियों की डिलीवरी में परेशानी का सामना करना पड़ेगा? आइए जानते हैं....
विस्तार
मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव का असर अब भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर पर भी दिखने लगा है। एक्सिस डायरेक्ट की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लोबल एनर्जी मार्केट में मची उथल-पुथल के कारण भारत में इंडस्ट्रियल गैस की सप्लाई घट गई है। इसका सीधा असर आने वाले समय में गाड़ियों के उत्पादन पर पड़ सकता है। आइए इसे समझते हैं कि पूरा मामला क्या है और इसका ऑटो सेक्टर और ग्राहकों पर क्या असर पड़ेगा:
कार बनाने में गैस का क्या काम है?
गाड़ियां बनाने की प्रक्रिया में गैस का बहुत अहम रोल होता है। विशेष रूप से पेंट शॉप और फोर्जिंग जैसे काम पूरी तरह गैस-आधारित हीटिंग सिस्टम पर टिके होते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, गैस की कमी की वजह से कुछ कार निर्माता कंपनियों को अभी से हल्की-फुल्की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। अगर गैस की सप्लाई और कम की गई तो ये समस्या बढ़ सकती है।
क्या आपको कार डिलीवरी के लिए ज्यादा इंतजार करना होगा?
हालांकि, राहत की बात ये है कि फिलहाल बहुत ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है। दरअसल, ज्यादातर कार कंपनियों के पास अभी 3 से 5 हफ्ते का स्टॉक बैकअप के तौर पर मौजूद है, जो इस शुरुआती झटके को सहने में काफी मदद करेगा। इसके अलावा, चूंकि गैस सप्लाई की यह परेशानी किसी एक विशेष कंपनी की नहीं बल्कि पूरी ऑटो इंडस्ट्री की है। इसलिए माना जा रहा है कि ग्राहक अपनी कारों की बुकिंग कैंसिल करने के बजाय डिलीवरी में होने वाली मामूली देरी को आसानी से समझकर स्वीकार कर लेंगे।
गाड़ियां बनाना हो जाएगा महंगा
गैस की सप्लाई घटने का सबसे बड़ा असर कार कंपनियों की जेब पर पड़ेगा। दरअसल, सस्ती पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) पर्याप्त मात्रा में न मिल पाने के कारण कंपनियों को मजबूरन 'स्पॉट एलएनजी' या अन्य महंगे ईंधनों का इस्तेमाल करना पड़ेगा। इससे गाड़ियां बनाने की लागत 15 से 25 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। उत्पादन लागत बढ़ने का सीधा असर मुनाफे पर भी पड़ेगा। इसके चलते वित्तीय वर्ष 2026 की चौथी तिमाही (Q4FY26) में गैस पर निर्भर ऑटो कंपनियों के मुनाफे (EBITDA मार्जिन) में थोड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है। इतना ही नहीं, इस पूरी स्थिति के कारण ऑटो पार्ट्स बनाने वाली छोटी कंपनियों पर भी खर्च का दबाव काफी बढ़ जाएगा।
सरकार ने गैस सप्लाई पर क्यों लगाई है लिमिट?
मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव के कारण ग्लोबल सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसी को देखते हुए भारत सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 'आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955' का इस्तेमाल करते हुए 9 मार्च 2026 को गैस सप्लाई पर कुछ नई पाबंदियां लगाई हैं। इन नियमों के तहत मैन्युफैक्चरिंग, चाय उद्योग और नेशनल गैस ग्रिड या सिटी गैस नेटवर्क से जुड़े अन्य कारखानों को अब उनकी पुरानी औसत खपत की केवल 80 प्रतिशत गैस ही दी जाएगी। वहीं, खाद बनाने वाले प्लांट्स के लिए यह लिमिट 70 प्रतिशत तय की गई है। इसके साथ यह सख्त निर्देश भी दिया गया है कि वे इस गैस का इस्तेमाल सिर्फ खाद बनाने के लिए ही कर सकेंगे।
आगे क्या होगा?
अब ऑटो सेक्टर की नजर इस बात पर टिकी है कि गैस सप्लाई की यह परेशानी कितने दिनों तक चलती है और क्या सरकार आने वाले समय में औद्योगिक गैस के बंटवारे पर कोई और नई पाबंदी लगाती है या नहीं।