CAFE 3: क्या पीएमओ ने कैफे-3 नियम पर नए सिरे से चर्चा का दिया आदेश? उत्सर्जन मानकों पर ऑटो इंडस्ट्री में मतभेद
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) से कहा है कि वह प्रस्तावित 'कॉर्पोरेट औसत ईंधन दक्षता' (CAFE-III) मानदंडों पर ऑटो उद्योग के साथ परामर्श फिर से शुरू करे। क्योंकि प्रमुख मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच गहरे मतभेद हैं।
विस्तार
प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (ब्यूरो ऑफ इनर्जी एफिशिएंसी) (BEE) को निर्देश दिया है कि वह CAFE-III (कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी) नियमों पर ऑटो इंडस्ट्री के साथ दोबारा चर्चा शुरू करे। यह फैसला इसलिए लिया गया है क्योंकि इंडस्ट्री के भीतर कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए हैं।
दोबारा चर्चा की जरूरत क्यों पड़ी?
CAFE-III के मौजूदा ड्राफ्ट पर कंपनियों के बीच गंभीर असहमति है।
मुख्य विवाद के मुद्दे हैं:
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छोटी कारों को मिलने वाली छूट
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एसयूवी के लिए कड़े उत्सर्जन लक्ष्य
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ईवी, हाइब्रिड और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए इंसेंटिव
पीएमओ चाहता है कि नया प्रस्ताव संतुलित हो और किसी एक सेगमेंट पर ज्यादा दबाव न पड़े।
पीएमओ में हुई उच्च-स्तरीय बैठक
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पीएमओ में बुधवार को हुई एक उच्च-स्तरीय बैठक के दौरान, बिजली मंत्रालय की संस्था, BEE को ये निर्देश जारी किए गए। पीएमओ ने एक ज्यादा मजबूत और संतुलित प्रस्ताव की मांग की, जो वैश्विक उत्सर्जन मानकों के अनुरूप हो। और साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी वाहन श्रेणी को असमान रूप से दंडित न किया जाए। इस कदम से CAFE-III नीति प्रक्रिया के फिर से शुरू होने का संकेत मिलता है, और आने वाले हफ्तों में हितधारकों के साथ नए सिरे से परामर्श होने की उम्मीद है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि "BEE और ऊर्जा मंत्रालय को अहम मुद्दों पर इंडस्ट्री के बंटे हुए विचारों को सुलझाने के लिए नए सिरे से बातचीत करनी होगी। ये चर्चाएं जल्द ही होने की उम्मीद है, और संशोधित प्रस्ताव जल्द ही पीएमओ को सौंपा जाएगा।"
छोटी कारों को लेकर क्या विवाद है?
कुछ कंपनियां चाहती हैं कि छोटी कारों के लिए उत्सर्जन लक्ष्य थोड़े आसान किए जाएं, ताकि उनकी लागत ज्यादा न बढ़े।
लेकिन दूसरी कंपनियों का मानना है कि इससे बाजार में असंतुलन पैदा होगा और एक वर्ग को ज्यादा फायदा मिलेगा।
SUV निर्माताओं की क्या चिंता है?
एसयूवी बनाने वाली कंपनियों का कहना है कि उनके लिए तय किए गए उत्सर्जन लक्ष्य बहुत सख्त हैं।
उन्हें पूरा करने के लिए ईवी बिक्री तेजी से बढ़ानी होगी, जो फिलहाल मुश्किल है क्योंकि:
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चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर सीमित है
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ईवी की कीमत ज्यादा है
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बाजार अभी शुरुआती दौर में है
इसलिए उन्होंने उत्सर्जन लक्ष्यों में कुछ राहत की मांग की है।
क्या कंपनियों पर भारी जुर्माना लग सकता है?
हां, अगर कंपनियां तय मानकों को पूरा नहीं कर पातीं, तो उन्हें भारी पेनल्टी देनी पड़ सकती है।
अनुमान के मुताबिक यह रकम हजारों करोड़ रुपये तक हो सकती है।
टेक्नोलॉजी को लेकर क्या विवाद है?
एक बड़ा मुद्दा यह भी है कि अलग-अलग तकनीकों को लेकर क्या नजरिया हो:
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जापानी कंपनियां हाइब्रिड कारों के लिए ज्यादा इंसेंटिव चाहती हैं
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भारतीय कंपनियां चाहती हैं कि फोकस पूरी तरह ईवी (BEV) पर हो
उनका मानना है कि हाइब्रिड को ज्यादा बढ़ावा देने से ईवी अपनाने की रफ्तार धीमी हो सकती है।
EV को लेकर क्या बदलाव सुझाए गए हैं?
इंडस्ट्री ने सुझाव दिया है:
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ईवी के लिए “सुपर क्रेडिट” बढ़ाया जाए
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ईवी को पूरी तरह शून्य उत्सर्जन माना जाए
इससे कंपनियों को उत्सर्जन लक्ष्य हासिल करने में मदद मिल सकती है।
क्या इसमें कोई समस्या भी है?
कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर ईवी को ज्यादा क्रेडिट दिया गया, तो कंपनियां कम ईवी बेचकर भी लक्ष्य हासिल कर लेंगी।
इससे ईवी की वास्तविक बिक्री धीमी रह सकती है।
अब BEE और पावर मंत्रालय सभी पक्षों के साथ नई चर्चा करेंगे।
इसके बाद एक संशोधित प्रस्ताव तैयार कर पीएमओ को सौंपा जाएगा।
कुल मिलाकर क्या संकेत हैं?
CAFE-III नियमों पर यह नया कदम दिखाता है कि सरकार पर्यावरण लक्ष्यों और उद्योग की चुनौतियों के बीच संतुलन बनाना चाहती है।
आने वाले समय में जो भी फैसला होगा, वह भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर की दिशा तय करेगा।